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बदलता मौसम त्वचा के लिए चुनौती: संक्रमण और सूजन संबंधी बीमारियों पर बढ़ी चिंता, 42.6% देशों ने दर्ज किया असर

अमर उजाला नेटवर्क Published by: डॉ. संजय पांडेय Updated Fri, 16 Oct 2026 08:03 AM IST

सार

जलवायु परिवर्तन अब त्वचा की सेहत को भी प्रभावित कर रहा है। एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के मुताबिक, 42.6 प्रतिशत देशों ने त्वचा रोगों में बदलाव की जानकारी दी। गर्मी से घमौरियां, चकत्ते, सूजन और संक्रमण बढ़ने की चिंता है। कम आय वाले देशों में इसका असर ज्यादा दर्ज हुआ।
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जलवायु परिवर्तन से त्वचा रोगों पर असर - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स


यह अध्ययन यूरोपियन एकेडमी ऑफ डर्मेटोलॉजी एंड वेनेरियोलॉजी (ईएडीवी) की 2026 की कांग्रेस में प्रस्तुत किया गया। ग्लोबल एक्सेस टू स्किन हेल्थ ऑब्जर्वेटरी के इस अध्ययन के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के 194 सदस्य देशों को आमंत्रित किया गया था, जिनमें से 136 देशों ने आंकड़े उपलब्ध कराए। अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन के स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों का आकलन करते समय त्वचा रोगों को भी प्राथमिकता देने की जरूरत है।


अध्ययन में आय के आधार पर देशों की स्थिति में स्पष्ट अंतर सामने आया। कम आय वाले 55.6 प्रतिशत देशों ने जलवायु परिवर्तन से जुड़ी त्वचा संबंधी समस्याओं में बदलाव की जानकारी दी। निम्न-मध्यम आय वाले देशों में यह आंकड़ा 52.5 प्रतिशत, उच्च-मध्यम आय वाले देशों में 43.8 प्रतिशत और उच्च आय वाले देशों में 28.3 प्रतिशत रहा।


ये आंकड़े संकेत देते हैं कि कम संसाधनों वाले देशों में त्वचा संबंधी समस्याओं की पहचान, निगरानी और उपचार की व्यवस्था मजबूत करना जरूरी है। हालांकि, देशों की ओर से दी गई जानकारी के आधार पर मिले इन परिणामों को हर मामले में जलवायु परिवर्तन और किसी बीमारी के बीच सीधे कारण-परिणाम का प्रमाण नहीं माना जा सकता।


घमौरियों और चकत्तों में बढ़ोतरी

त्वचा रोगों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से संबंधित जानकारी देने वाले 58 देशों के आंकड़ों का अलग से विश्लेषण किया गया। इनमें से 81 प्रतिशत देशों ने गर्मी से होने वाली घमौरियों और त्वचा पर चकत्तों में वृद्धि की सूचना दी। वहीं, 75.9 प्रतिशत देशों ने सूजन संबंधी त्वचा रोगों में बदलाव दर्ज किया।इसके अलावा, 62.1 प्रतिशत देशों ने संक्रामक त्वचा रोगों में बदलाव की जानकारी दी, जबकि 50 प्रतिशत देशों ने मच्छरों और किलनी जैसे जीवों से फैलने वाली बीमारियों में बदलाव की बात कही।तेज गर्मी और उमस के दौरान पसीना बढ़ने से त्वचा में जलन, खुजली और घमौरियों की समस्या बढ़ रही है। गर्मी, वायु प्रदूषण और अन्य पर्यावरणीय कारक पहले से मौजूद कुछ सूजन संबंधी त्वचा रोगों को भी बढ़ा सकते हैं। हालांकि, अलग-अलग बीमारियों पर इन कारकों का प्रभाव व्यक्ति, स्थानीय परिस्थितियों और स्वास्थ्य संबंधी स्थिति के अनुसार अलग हो सकता है।


बदलते मौसम से संक्रमण का खतरा

जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान और बारिश के पैटर्न में बदलाव मच्छरों, किलनी और दूसरे रोग फैलाने वाले जीवों के रहने तथा फैलने के क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है। इससे कुछ इलाकों में ऐसे जीवों की मौजूदगी बढ़ रही है, जहां पहले उनका प्रसार सीमित था।बाढ़ और अत्यधिक बारिश के दौरान दूषित पानी तथा त्वचा को प्रभावित करने वाले पर्यावरणीय तत्वों के संपर्क में आने की आशंका भी बढ़ती है। ऐसे हालात त्वचा में जलन और कुछ संक्रमणों का जोखिम बढ़ रहा हैं। इसलिए बदलते मौसम के साथ स्थानीय स्वास्थ्य जोखिमों की निगरानी भी जरूरी है।


पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में ज्यादा असर

अध्ययन में क्षेत्रों के बीच भी अंतर सामने आया। पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र के 64.7 प्रतिशत देशों ने त्वचा रोगों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव की जानकारी दी। पूर्वी भूमध्यसागरीय और दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्रों में यह आंकड़ा 60 प्रतिशत रहा, जबकि यूरोपीय क्षेत्र में 16.1 प्रतिशत देशों ने ऐसे बदलावों की सूचना दी।अफ्रीकी क्षेत्र में 42.9 प्रतिशत प्रतिभागियों ने जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को लेकर अनिश्चितता जताई। यह स्थिति बताती है कि कई क्षेत्रों में त्वचा रोगों से संबंधित आंकड़े जुटाने और बीमारी के बदलते स्वरूप को समझने के लिए निगरानी व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है।
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स्वास्थ्य योजनाओं में त्वचा की सेहत भी जरूरी

अध्ययन से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने वाली स्वास्थ्य योजनाओं में त्वचा संबंधी बीमारियों को भी शामिल करना जरूरी है।बढ़ती गर्मी के दौरान त्वचा को साफ और सूखा रखना, पसीने से भीगे कपड़े बदलना, पर्याप्त पानी पीना और तेज धूप से बचाव करना उपयोगी हो सकता है। त्वचा पर लगातार खुजली, सूजन, चकत्ते या संक्रमण के लक्षण दिखाई देने पर चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। विशेषज्ञों के मुताबिक, समय पर पहचान, बेहतर निगरानी और सुलभ उपचार से जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ने वाली त्वचा संबंधी स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने में मदद मिल सकती है।

 
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