शनिवार को हो रही शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक के इतर दुनिया की निगाहें फिलहाल चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और पीएम नरेंद्र मोदी के बीच होने वाली द्विपक्षीय वार्ता पर है। दो महीने के अंदर दोनों शासानाध्यक्षों की मुलाकात चूंकि बदली फिजा और सकारात्मक माहौल में हो रही है। ऐसे में भारत को उम्मीद है कि एससीओ बैठक सहित इन द्विपक्षीय वार्ता में उसे आतंकवाद के मामले में बड़ी सफलता हाथ लग सकती है।
दरअसल जिनपिंग और पीएम मोदी के बीच दो महीने पूर्व हुई अनौपचारिक शिखर वार्ता के बाद दोनों देशों के बीच तनाव में काफी कमी आई है। चीन ने फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की रिपोर्ट में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को ग्रे लिस्ट में शामिल करने का विरोध नहीं किया है। इस बीच दोनों देशों ने अहम मुद्दों पर कूटनीतिक माध्यम से एक दूसरे की थाह ली है।
चीन ने जहां भारत से वन चाइना पॉलिसी पर समर्थन मांगा है तो भारत ने चीन से पाक अधिकृत कश्मीर में अपनी गतिविधियां बंद करने की मांग की है। गौरतलब है कि भारत पीओके से होकर गुजरने वाले चीन पाकिस्तान इकॉनोमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) का विरोध करता रहा है। जाहिर तौर पर मोदी जिनपिंग के बीच इन मुद्दों के अलावा परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह और संयुक्त राष्ट्र में बतौर स्थाई सदस्य भारत के प्रवेश पर भी बातचीत होगी, जिस पर चीन के अड़ंगे के कारण बात नहीं बन रही।
पूर्व राजदूत जी पार्थसारथी एससीओ सम्मेलन को भी बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं। उनके मुताबिक बातचीत का एजेंडा आतंकवाद है जिसमें एससीओ में पहली बार शामिल होने वाले दोनों देश भारत और पाकिस्तान शिरकत करेंगे। ऐसे में इस मंच पर भी भारत पाक प्रायोजित आतंकवाद का मामला उठाने से नहीं चूकेगा। भारत की कोशिश इसके घोषणा पत्र में आतंकवाद मामले में पाकिस्तान को परोक्ष या सीधे नसीहत देने की होगी। ऐसे में जाहिर तौर पर चीन और रूस की भूमिका बेहद अहम होगी।