लोकसभा और विधानसभा का अगला चुनाव नायडू अकेले अपने दम पर लड़ेंगे। अपनी आगे की रणनीति को अंजाम देने के लिए नायडू ने रविवार 4 फरवरी को आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में अपने सांसदों की अहम बैठक बुलाई है। तेदपा सांसद टीजी वेंकटेश ने भाजपा के खिलाफ युद्ध का ऐलान करते हुए अमर उजाला से कहा है कि रविवार को होने वाली सांसदों की बैठक में चंद्र बाबू नायडू को केंद्र सरकार में शामिल तेदपा मंत्रियों के त्यागपत्र, सांसदों के इस्तीफे और राजग से तेदपा के अलग होने सरीखे तीन मुद्दों में से एक पर फैसला करना है। उन्होंने कहा कि यदि केंद्र सरकार आंध्र प्रदेश के पैकेज देने के वायदे को पूरा नहीं करती है। तो हम राजग का साथ छोड़ सकते हैं।
तेदपा को भाव देने के मूड में नहीं भाजपा
तेदपा ने आम बजट में आंध्र प्रदेश को कुछ न मिलने का आरोप लगाते हुए बेशक भाजपा के खिलाफ हमलावर रूख अपना लिया है। मगर भाजपा आलाकमान तेदपा को ज्यादा भाव देने के मूड में नहीं है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को चंद्रबाबू की बयानबाजी रास नहीं आई है। हालांकि भाजपा ने आंध््रा प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी से भी अंदर खाने हाथ मिला रखा है। वह अगला चुनाव तेदपा के बजाय जगन के साथ मिलकर लडऩे के मूड में है।
तेदपा की भाजपा से दूरी बनाने के लिए शायद यह भी एक बड़ी वजह मानी जा रही है। वैसे तेदपा ने केंद्र पर राज्य की अनदेखी का आरोप लगाया है। तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने गुरूवार को आंध्र भाजपा नेताओं की बैठक कर उन्हें जमीन पर पार्टी को मजबूत बनाने का निर्देश दिया है। भाजपा के रूख और तेदपा की रणनीति से स्पष्ट है कि चंद्र बाबू भी जल्द ही राजग से बाहर की राह पकड़ सकते हैं। क्योंकि दोनों दलों की ओर से तल्लख बयानबाजी का दौर तेज है। तेदपा के एक शीर्ष नेता के अनुसार भाजपा की ओर से किसी नेता ने भी वर्तमान सियासी हालातों पर नायडू से चर्चा नहीं की है। यदि आंध्र पद्रेश के लिए किए गए राहत पैकेज के आश्वासन को केंद्र पूरा नहीं करता है तो तेदपा प्रमुख चंद्रबाबू नायडू रविवार को बड़ा फैसला ले सकते हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर पहले भी बड़ी भूमिका निभा चुके हैं नायडू
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू वैसे तो खांटी रूप से गैर कांग्रेस की राजनीति करते हैं। यूनाईटेड फ्रंट की सरकार से लेकर केंद्र की अटल बिहारी वाजपेई की सरकार तक में वे अहम भूमिका निभा चुके हैं। उनके करीबियों के अनुसार मुस्लिम के रूप में अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति बनाने की सलाह नायडू की ही थी। परदे के पिछे नायडू भाजपा के अन्य सहयोगी दलों के संपर्क में भी हैं। अगर वे भाजपा से अलग होते हैं तो उनकी तैयारी भगवा परिवार को बड़ी चोट देने की है।
उनके सामने मजबूरी बस एक ही है कि वे कांग्रेस विरोध की राजनीति भी करते हैं। यही वजह है कि उन्होंने राजग में आकर मोदी सरकार में शामिल होने का निर्णय लिया। मगर राजग के जरिए भाव न दिए जाने से नायडू के मन में नाराजगी है। जबकि देवगौड़ा से लेकर अटल बिहारी वाजपेई तक की सरकार में नायडू की तूती बोलती थी। लेकिन वर्तमान सरकार में अन्य सहयोगी दलों की तरह नायडू को भी वजन नहीं मिल रहा है।
तो राजस्थान उपचुनाव के नतीजों के बाद सहयोगी दलों को भाजपा की सियासी जमीन भी कमजोर होती दिख रही है। यहि वजह है कि केंद्र पर आंध्र की उपेक्ष का आरोप लगाते हुए तेदपा की रणनीति भाजपा से दूरी बनाने की है। ताकि अगले चुनाव के लिए सूबे में वह अपनी जमीन बचा सके। ऐसा करके तेदपा जगन को भी सियासी नुकशान देना चाहती है।
यदि भाजपा से वे जुड़ते भी हैं तो केंद्र की सत्ता विरोधी रूझान की चपेट उनपर पड़े। तेदपा को जगन-भाजपा की दोस्ती में भी फायदा नजर आ रहा है। एक वरिष्ठ तेदपा नेता के अनुसार यदि जगन और भाजपा का मिलन आंध्र प्रदेश में होता है तो तेदपा के खाते में बैठे-बिठाए मुस्लिम और ईसाई समुदाय का वोट जुड़ जाएगा। जोकि मुख्य रूप से जगन के समर्थक माने जाते हैं। तेदपा नेता के अनुसार आंध्र की राजनीति में कांग्रेस पार्टी अब भी शून्य है। इसलिए उनका मुकाबला जगन की पार्टी से होगा। ऐसे में भाजपा से दूरी बरत कर तेदपा राज्य में दोबारा से परचम लहरा सकती है। वरना केंद्र के सत्ता विरोधी रूझान का असर तेदपा के मंसूबों पर पानी फेर सकते हैं।