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60 साल पुरानी बीमारी का मिला इलाज: चांदीपुरा वायरस की दवा तैयार, 1965 में पहली बार महाराष्ट्र में मिला था मरीज

Mon, 23 Jun 2025 06:53 AM IST
दीपक कुमार शर्मा परीक्षित निर्भय

सार

भारत के वैज्ञानिकों ने चांदीपुरा वायरस की दवा की खोज कर ली है जिसके जरिये मरीज की जान का जोखिम कम किया जा सकता है। चांदीपुरा वायरस एक रैब्डोवायरस है, जिसकी खोज सबसे पहले 1965 में महाराष्ट्र के नागपुर जिले के चांदीपुरा गांव में हुई थी। इसलिए इसका नाम चांदीपुरा रखा गया।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
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कोरोना महामारी और निपाह जैसे जानलेवा वायरस से जारी लड़ाई के बीच भारत ने एक ऐसे घातक वायरस का तोड़ निकाला है, जिसे कोरोना की तरह लोग काफी कम जानते हैं, लेकिन यह अब तक सबसे बड़ा जानलेवा संक्रमण भी रहा है। इस चांदीपुरा वायरस के चलते भारत के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में अब तक सबसे ज्यादा बच्चों की मौत हुई है। करीब 60 साल पुरानी इस जानलेवा बीमारी का अब इलाज मिल गया है।

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भारत के वैज्ञानिकों ने चांदीपुरा वायरस की दवा की खोज कर ली है जिसके जरिये मरीज की जान का जोखिम कम किया जा सकता है। चांदीपुरा वायरस एक रैब्डोवायरस है, जिसकी खोज सबसे पहले 1965 में महाराष्ट्र के नागपुर जिले के चांदीपुरा गांव में हुई थी। इसलिए इसका नाम चांदीपुरा रखा गया। यह वायरस बालू मक्खी के काटने से फैलता है और बच्चों में तेजी से मस्तिष्क को प्रभावित करने वाले एन्सेफलाइटिस का कारण बनता है जिसे सामान्य भाषा में दिमागी बुखार कहते हैं। पांच से 15 साल तक के बच्चों को यह सबसे ज्यादा निशाना बनाता है। बुखार, उल्टी, बेहोशी जैसे लक्षण मिलने के साथ ही 24 से 48 घंटे के भीतर मरीज की मौत हो जाती है।

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पहली बार प्रभावी दवा की पुष्टि: आईसीएमआर
नई दिल्ली स्थित भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के वैज्ञानिकों का कहना है कि यह वायरस वर्षों से भारत में एक ‘खामोश हत्यारा’ बना हुआ है। इसके खिलाफ संभावित एंटीवायरल उपचार की तलाश पूरी हुई। आईसीएमआर के पुणे स्थित राष्ट्रीय वायरोलॉजी संस्थान (एनआईवी) ने अपने सेल और एनिमल मॉडल प्रयोगों में फेविपिराविर नामक दवा को इस घातक वायरस की वृद्धि को रोकने में सक्षम पाया है। यह पहली बार है जब इस जानलेवा वायरस के लिए किसी दवा के प्रभावी होने की पुष्टि वैज्ञानिक रूप से भारत में की गई है।

वैज्ञानिक जल्द शुरू करेंगे मानव परीक्षण
वर्ष 2024 में गुजरात में चांदीपुर वायरस का प्रकोप सामने आया जो बीते 20 वर्ष में सबसे बड़ा रहा। इस दौरान जून से अगस्त 2024 के बीच गुजरात सहित कई राज्यों में 82 लोगों की मौत हुई जबकि 245 से ज्यादा चपेट में आए। वैज्ञानिकों का कहना है कि अब फेविपिराविर दवा पर मानव परीक्षण जल्द ही शुरू किए जा सकते हैं।

सैकड़ों मरीजों की हो चुकी है मौत
2003 से 2004 के बीच इस प्रकोप में आंध्र प्रदेश में 329 लोग चपेट में आए जिनमें 183 लोगों की मौत हुई। वहीं महाराष्ट्र में 114 और गुजरात में 24 लोगों की मौत हुई। साल 2004 से 2011 के बीच गुजरात में 31 लोगों की मौत हुई जबकि 100 से भी ज्यादा लोग चपेट में आए। 2009 से 2011 के बीच अन्य राज्यों में 16 मौत हुईं।
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इन 10 राज्यों में वायरस सबसे ज्यादा
महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना के सीमावर्ती क्षेत्र, ओडिशा, बिहार और झारखंड के अलावा उत्तर प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र को एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) बेल्ट कहा जाता है जहां हर साल बच्चों में दिमागी बुखार के मामले मिलते हैं।

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