उत्तराखंड में हालिया जल आपदा का कारण बनी ऋषिगंगा में मलबे के कारण बनी नई झील की केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) जांच करेगा। इस जांच के दौरान यह संभावना देखी जाएगी कि झील का पानी नियंत्रित विस्फोट के जरिये बाहर निकाला जा सकता है या नहीं।
15 फरवरी को क्षेत्र में एक सेंटीमीटर बारिश की संभावना के चलते आंकेगा खतरा
सीडब्ल्यूसी चेयरमैन सौमित्र हलधर ने शनिवार को कहा कि आयोग ने भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) की तरफ से इस क्षेत्र में 15 और 16 फरवरी को एक सेंटीमीटर बारिश और 10 सेंटीमीटर बर्फबारी की संभावना जताए जाने के कारण झील टूटने के संभावित खतरे को ध्यान में रखकर यह निर्णय लिया है।
हलधर ने कहा, सीडब्ल्यूसी इस संभावना की भी जांच करेगाकि यदि जल स्तर खतरनाक बिंदु से ऊपर चढ़ जाता है तो क्या किया जा सकता है। हम जांच करेंगे कि आईएमडी की भविष्यवाणी के अनुसार बर्फबारी और बारिश होने पर जल स्तर के चढ़ने का क्या प्रभाव हो सकता है। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि यदि झील टूटती है तो कितनी मात्रा में पानी बाढ़ के तौर पर बाहर निकलेगा और नीचे तक पहुंचने में उसे कितना समय लगेगा।
नियंत्रित विस्फोट से तोड़ी जा सकती है झील
उन्होंने कहा, अस्थायी झील 400 मीटर लंबी, 25 मीटर चौड़ी और 60 मीटर गहरी है। यह 10 डिग्री की ढलान पर है। हम झील का आकार और ज्यादा नहीं बढ़ने देना चाहते हैं। हम सभी तरह की संभावनाओं की जांच करेंगे, जिनमें झील को नियंत्रित विस्फोट से तोड़ना भी शामिल है।
तय नहीं कौन सी एजेंसी देगी विस्फोट को अंजाम
सीडब्ल्यूसी चेयरमैन ने कहा कि अभी तक यह तय नहीं हुआ है कि झील को नियंत्रित विस्फोट से तोड़ने की स्थिति आने पर कौन सी एजेंसी इस काम को अंजाम देगी। उन्होंने यह भी कहा कि झील के बनने की जगह तक पहुंच आसान नहीं है।
इसके चलते यदि नियंत्रित विस्फोट संभव नहीं हुआ तो हम हालात से निपटने के अन्य रास्ते भी तलाशेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल जोशीमठ से हरिद्वार तक जल स्तर में कोई बढ़ोतरी नहीं है, लेकिन हम नदी के जलस्तर पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
477 ग्लेशियर झीलों पर नजर रखती है सीडब्ल्यूसी
हिमालय में 10 हेक्टेयर या ज्यादा आकार वाली 2000 से ज्यादा ग्लेशियर झीलें हैं। सीडब्ल्यूसी इनमें से 477 ऐसी ग्लेशियर झीलों पर नजर रखती है, जिनका आकार 50 हेक्टेयर या उससे ज्यादा है। ये झीलें हिमालयी नदियों को मिलने वाले पानी के लिए जिम्मेदार हैं।