24 साल बाद ऐसा हुआ है, जब कांग्रेस को गैर गांधी परिवार से कोई अध्यक्ष मिला है। इस चुनाव के 9,497 कांग्रेस नेताओं ने वोट किया था। आज हुई मतगणना में खरगे ने शशि थरूर को भारी मतों से हरा दिया। मल्लिकार्जुन खरगे को 7897 वोट मिले, जबकि शशि थरूर को महज 1072 वोट मिले।
24 साल बाद कांग्रेस को गैर गांधी परिवार का कोई अध्यक्ष मिला है। मल्लिकार्जुन खरगे ने अध्यक्ष पद के चुनाव में अपने प्रतिद्वंदी शशि थरूर को छह हजार से भी ज्यादा मतों से हरा दिया। इसकी पहले से कयास भी लगाई जा रही थी। खैर, खरगे के अध्यक्ष बनने के बाद अब ये चर्चा शुरू हो गई है कि आखिर उनके सामने चुनौतियां कौन-कौन सी हैं? वह कांग्रेस पार्टी को कितना बदल पाएंगे? पार्टी के लिए क्या नया कर सकते हैं? आइए समझते हैं...
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पहले जानिए चुनाव में क्या-क्या हुआ?
कांग्रेस के नए अध्यक्ष के लिए 17 अक्तूबर को वोटिंग हुई थी। 80 साल के मल्लिकार्जुन खड़गे के सामने 66 साल के शशि थरूर टक्कर दे रहे थे। करीब 9497 कांग्रेस नेताओं ने इसके लिए वोट किया। आज हुई मतगणना में खरगे ने शशि थरूर को भारी मतों से हरा दिया। मल्लिकार्जुन खरगे को 7897 वोट मिले, जबकि शशि थरूर को महज 1072 वोट मिले।
इस बार गांधी परिवार की तरफ से कोई भी सदस्य अध्यक्ष पद की रेस में शामिल नहीं था। ऐसा पिछले 24 साल में पहली बार हुआ है। इससे पहले सीताराम केसरी ऐसे अध्यक्ष थे, जो गांधी परिवार से नहीं थे। कांग्रेस मुख्यालय पर खरगे की जीत का जश्न मनाया जा रहा है। खरगे के समर्थक ढोल नगाड़ों के साथ उनकी जीत का जश्न मना रहे हैं। शशि थरूर ने भी खरगे को जीत की बधाई दी। थरूर ने ट्वीट कर लिखा, 'ये काफी सम्मान और बड़ी जिम्मेदारी की बात है। मैं खरगे जी के लिए उनके इस काम में सफलता की कामना करता हूं।'
खरगे के सामने कौन सी चार चुनौतियां हैं?
इसे समझने के लिए हमने वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद कुमार सिंह से बात की। उन्होंने कहा, 'खरगे ऐसे वक्त पार्टी के अध्यक्ष चुने गए हैं, जब कांग्रेस को नई ताकत की जरूरत है। कांग्रेस लगातार देशभर में चुनाव हार रही है। ऐसे में खरगे के सामने चुनौतियों का बड़ा अंबार लगा है।' प्रमोद ने हमें खरगे के सामने की चार बड़ी चुनौतियों के बारे में बताया...
1. खुद से फैसला लेना : अभी कांग्रेस पर पूरी तरह से गांधी परिवार का राज है। भले ही गांधी परिवार के सदस्य पार्टी में किसी पद पर हों या न हों, लेकिन बगैर उनके कोई फैसला नहीं लिया जा सकता है। ये भी सही है कि कांग्रेस को गांधी परिवार से अलग रखकर बात भी नहीं किया जा सकता है। ऐसे समय में खरगे के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी कि वह स्वतंत्र होकर पार्टी के लिए फैसला ले सकें, जिनमें गांधी परिवार का कोई दबाव न हो।
2. पार्टी में पड़ रही फूट को रोकना : राजस्थान में सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच लड़ाई जारी है। अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर भी थरूर ने एक तरह से मोर्चा खोल रखा है। एक के बाद एक कई कांग्रेस के दिग्गज नेता पार्टी छोड़ चुके हैं। महाराष्ट्र में भी कांग्रेस विधायकों के बीच नाराजगी है। ऐसी स्थिति में खरगे के सामने दूसरी बड़ी चुनौती पार्टी में लगातार पड़ रही फूट को रोकना है।
3. जनता को विश्वास दिलाना और नए लोगों को जोड़ना : कांग्रेस फिर से तभी चुनाव जीत सकती है, जब वह जनता को ये भरोसा दिला पाए कि उनके लिए यही पार्टी बेहतर है। इसके लिए कांग्रेस को नए लोगों को पार्टी से जोड़ना होगा। खरगे के लिए ये भी एक चुनौती ही है।
4. विधानसभा और फिर लोकसभा चुनाव : अभी नवंबर में हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होना है। इसके बाद गुजरात में भी चुनाव होगा। अगले साल यानी 2023 में दस राज्यों में विधानसभा चुनाव है। इनमें कर्नाटक भी शामिल है, जहां से खरगे खुद आते हैं। 2024 में भी सात राज्यों में विधानसभा के साथ-साथ लोकसभा चुनाव भी होगा। इन चुनाव में बेहतर परफॉरमेंस की चुनौती खरगे के सामने है।
खरगे के बारे में भी जान लीजिए
मल्लिकार्जुन खरगे का जन्म कर्नाटक के बीदर जिले के वारावत्ती इलाके में एक किसान परिवार में हुआ था। पिता मपन्ना खरगे और मां का नाम सबावा था। खरगे ने कर्नाटक के गुलबर्गा के नूतन विद्यालय से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। इसके बाद यहां सरकारी कॉलेज से स्नातक की डिग्री ली। खरगे की रुचि शुरू से ही राजनीति में रही। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान वह छात्रों के मुद्दों को लेकर संघर्ष किया करते थे। इसी के कारण वह यहां स्टूडेंट यूनियन के महासचिव भी चुने गए थे।
खरगे ने गुलबर्गा के ही सेठ शंकरलाल लाहोटी लॉ कॉलेज से एलएलबी करने के बाद वकालत की। इसके बाद वह मजदूरों के हक की लड़ाई लड़ने लगे। 1969 में वह एमकेएस मील्स कर्मचारी संघ के विधिक सलाहकार बने। इसके बाद उन्हें संयुक्त मजदूर संघ का प्रभावशाली नेता माने जाने लगा। खरगे ने राधाबाई से शादी की है और दोनों के पांच बच्चे भी हैं। इनमें दो बेटियां और तीन बेटे शामिल हैं। 2006 में मल्लिकार्जुन खरगे ने अपने धर्म को लेकर एक बड़ा खुलासा किया था। उन्होंने बताया था कि वह बौद्ध धर्म को मानते हैं।
1969 में ही वह कांग्रेस में शामिल हो गए। पार्टी ने उनकी लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें गुलबर्गा कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बना दिया। 1972 में पहली बार कर्नाटक की गुरमीतकल विधानसभा सीट से विधायक बने। खरगे गुरमीतकल सीट से नौ बार विधायक चुने गए। इस दौरान उन्होंने विभिन्न विभागों में मंत्री का पद भी संभाला। 2005 में उन्हें कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया। 2008 तक वह इस पद पर बने रहे। 2009 में पहली बार सांसद चुने गए।
खरगे गांधी परिवार के भरोसेमंद माने जाते हैं। इसका समय-समय पर उनको इनाम भी मिला। साल 2014 में खरगे को लोकसभा में पार्टी का नेता बनाया गया। लोकसभा चुनाव 2019 में हार के बाद भी कांग्रेस पार्टी ने उन्हें 2020 में राज्यसभा भेज दिया। पिछले साल गुलाम नबी आजाद का कार्यकाल खत्म हुआ तो खरगे को राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष बना दिया गया।