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SC: '40 साल पुरानी FIR को नहीं समझ पा रहा CFSL', सिख विरोधी दंगा मामले में यूपी सरकार का सुप्रीम कोर्ट को जवाब

Fri, 25 Jul 2025 09:12 PM IST
बशु जैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

कानपुर में 1984 में हुए सिख विरोधी दंगा मामले में न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यूपी सरकार के हलफनामे पर विचार करते हुए कहा कि यदि सीएफएसएल जैसी विशेषज्ञ संस्था एफआईआर की विषय-वस्तु को नहीं समझ पाती है तो कुछ नहीं किया जा सकता, लेकिन यदि एजेंसियों को इसकी प्रति मिल जाती है तो अदालत आगे निर्देश जारी कर सकती है।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
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 कानपुर में हुए 1984 सिख विरोधी दंगा मामले में सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को जवाब दिया। यूपी सरकार ने कहा कि मामले में 40 साल पहले दर्ज की गई एफआईआर को केंद्रीय फॉरेंसिक प्रयोगशाला (CFSL) समझ नहीं पा रही है। यह एफआईआर काफी पुरानी हो गई है। इस पर कोर्ट ने जांच एजेंसियों को निर्देश दिया कि भविष्य में एफआईआर की कॉपी मिलती तो उस बारे में अदालत को जरूर बताएं।

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न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने राज्य सरकार के हलफनामे पर विचार करते हुए कहा कि यदि सीएफएसएल जैसी विशेषज्ञ संस्था एफआईआर की विषय-वस्तु को नहीं समझ पाती है तो कुछ नहीं किया जा सकता, लेकिन यदि एजेंसियों को इसकी प्रति मिल जाती है तो अदालत आगे निर्देश जारी कर सकती है।


पीठ ने कहा कि रिपोर्ट से पता चलता है कि एफआईआर की विषय-वस्तु को विशेषज्ञ संस्थान केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (सीएफएसएल), नई दिल्ली द्वारा भी नहीं समझा जा सका। इससे प्राप्त रिपोर्ट से पता चलता है कि दो हिंदी शब्दों को छोड़कर, जिन्हें आंशिक रूप से पढ़ा जा सकता है, अन्य सभी शब्द खंडित हैं। हम इस बात से संतुष्ट हैं कि इस स्तर पर एफआईआर के संबंध में कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की जा सकती। हालांकि जब भी एजेंसियां इसकी भौतिक प्रति प्राप्त करने में सक्षम होंगी, तो मामले को बिना किसी देरी के इस अदालत के संज्ञान में लाया जाएगा ताकि उस एफआईआर के संबंध में भी उचित निर्देश जारी किए जा सकें।

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शुक्रवार को अदालत को बताया गया कि उच्च न्यायालय ने कई मामलों में निचली अदालत में चल रही कार्यवाही पर रोक लगा दी है। इससे पीड़ितों के परिजनों को न्याय मिलने में देरी हो रही है। इस पीठ ने कहा कि हम किसी संदिग्ध/आरोपी के आरोपपत्र को रद्द करने सहित अन्य उपाय प्राप्त करने के अधिकार को प्रभावित नहीं करना चाहते, लेकिन हम केवल इतना कहते हैं कि उच्च न्यायालय इन मामलों को कानून के अनुसार निर्णय के लिए ले सकता है। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि यह दुर्भाग्यपूर्ण त्रासदी वर्ष 1984 में घटित हुई थी और इस न्यायालय द्वारा बार-बार किए गए प्रयासों के कारण ही जांच को पुनर्जीवित किया गया, एसआईटी का गठन किया गया और जांच पूरी होने पर अब आरोपपत्र दाखिल किया गया है। इस तथ्य का न्यायिक संज्ञान लिया जा सकता है कि मुकदमे के समापन में कुछ उचित समय लगेगा।

कोर्ट ने कहा कि इसलिए जरूरी है कि हाईकोर्ट जिन मामलों की कार्यवाही पर रोक लगा दी गई थी, उनको बिना बारी के आधार पर शीघ्रता से सुनें। क्योंकि समय बीतने के साथ महत्वपूर्ण गवाहों को पेश करना एक कठिन कार्य हो गया।

उत्तर प्रदेश की स्थायी वकील रुचिरा गोयल ने कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय में बरी किये जाने के खिलाफ दायर चार आपराधिक अपीलों में उच्च न्यायालय द्वारा देरी को माफ कर दिया गया था और अब राज्य के महाधिवक्ता कार्यालय द्वारा अपीलों पर सक्रिय रूप से कार्रवाई की जा रही है।

शीर्ष अदालत ने कहा हम उत्तर प्रदेश राज्य के महाधिवक्ता से कहना चाहते हैं कि वे लंबित आपराधिक अपीलों में उच्च न्यायालय की सहायता के लिए राज्य के सर्वश्रेष्ठ विधि अधिकारियों को तैनात करें, जिनके पास आपराधिक कानून में विशेषज्ञता हो। ऐसे सभी मामलों में राज्य के वकील को आवश्यक कार्रवाई के लिए शीर्ष अदालत के आदेश की एक प्रति उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया तथा मामले की सुनवाई 15 सितंबर के लिए निर्धारित कर दी गई।

130 सिखों की हत्या की गई थी
जिस एफआईआर की बात की जा रही है वह उसकी जांच एसआईटी द्वारा 35 वर्षों के बाद की जा रही है और जिन्हें साक्ष्य के अभाव में बंद कर दिया गया है। शीर्ष अदालत 1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान कानपुर में लगभग 130 सिखों की हत्या के मामले को फिर से खोलने की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इससे पहले कोर्ट ने कानपुर में 1984 के सिख विरोधी दंगों से संबंधित 11 मामलों की शीघ्र सुनवाई का निर्देश दिया था। जिनमें मामलों की पुनः जांच के बाद आरोपपत्र दाखिल किए गए थे।

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