आतंकवाद विरोधी कानून यूएपीए के कुछ प्रावधानों को दोबारा तैयार किए गए भारतीय न्याय संहिता विधेयक में शामिल किया गया है, जिसे मौजूदा आपराधिक कानूनों को बदलने के लिए दो अन्य विधेयकों के साथ लोकसभा में नए सिरे से पेश किया गया था।
संसदीय पैनल द्वारा की गई कुछ सिफारिशों को शामिल करने के लिए तीन विधेयकों को फिर से पेश किया गया। भारतीय न्याय संहिता विधेयक पहली बार 11 अगस्त को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्षरता अधिनियम विधेयकों के साथ लोकसभा में पेश किया गया था।
कम से कम किए गए पांच बदलाव
दोबारा पेश किए गए विधेयकों में आतंकवाद की परिभाषा समेत कम से कम पांच बदलाव किए गए हैं। नए भारतीय न्याय (द्वितीय) संहिता विधेयक में आतंकवाद की परिभाषा में अब अन्य परिवर्तनों के साथ-साथ आर्थिक सुरक्षा और विदेशों में आतंकवादी कृत्य भी शामिल हैं।
विक्षिप्तता को अस्वस्थ मन से बदला
संशोधित आपराधिक कानूनों में विक्षिप्तता (मेंटल इलनेस) की जगह अस्वस्थ मन (अनसाउंड माइंड) कर दिया है। प्रस्तावित कानूनों में मेंटल इलनेस का जिक्र मेंटल हेल्थकेयर एक्ट-2017 की धारा 2 के क्लॉज (ए) में है।
377 प्रावधानों को बरकरार रखने के प्रस्ताव को किया खारिज
सरकार ने प्रस्तावित विधेयक में नाबालिगों के साथ शारीरिक संबंध और पाशविकता के कृत्यों से संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 377 प्रावधानों को बरकरार रखने के पैनल के प्रस्ताव को खारिज कर दिया।
तीनों विधेयकों में मामूली बदलाव
लोकसभा विधेयक पेश करते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने कहा, यह बदलाव तथ्यों में नहीं, बल्कि भाषा और व्याकरण में सुधार की वजह से किए गए हैं। स्थायी समिति के सुझावाें के आधार पर जरूरी बदलाव किए गए हैं।
11 अगस्त को पहली बार पेश हुआ था विधेयक
भारतीय न्याय संहिता विधेयक, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम विधेयक को पहली बार 11 अगस्त को संसद के मानसून सत्र में पेश किया गया था। 18 अगस्त को विभाग-संबंधित गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति के पास विचार के लिए भेजा गया था। तीनों विधेयक क्रमशः भारतीय दंड संहिता, 1860, आपराधिक प्रक्रिया संहिता अधिनियम, 1898 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की जगह लाए गए थे।