मोबाइल वॉलेट, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, यूपीआई ऐप या बैंकों के ट्रांजेक्शन ऐप के उपयोग में सरकारी कर्मचारियों की उदासीनता को देखते हुए अब इन्हें विशेष प्रशिक्षण देने की तैयारी चल रही है। योजना है कि निचले स्तर के कर्मचारियों को ई-ट्रांजेक्शन के विशेषज्ञ विस्तृत जानकारी दे कर प्रशिक्षित करेंगे।
केन्द्रीय वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी का कहना है कि निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के मुकाबले सरकारी कर्मचारियों में ई-ट्रांजेक्शन की प्रतिशतता काफी कम है। अब, जबकि शत प्रतिशत सरकारी कर्मचारियों का वेतन बैंकों में ही क्रेडिट होता है और उन्हें नि:शुल्क डेबिट कार्ड जारी किया गया है तो वे आसानी से डेबिट कार्ड का उपयोग कर सकते हैं, लेकिन तब भी ये कर्मचारी खरीदारी में ज्यादातर नकदी का उपयोग करते हैं।
अब उन्हें जागरूक किया जाएगा कि ई-ट्रांजेक्शन भी उतना ही सुरक्षित है, जैसे कि किसी को नकद राशि देना। इसमें एक आसानी यह है कि नकदी को ढोने से मुक्ति मिल जाती है। यही नहीं, उन्हें बैंकों के ई-ट्रांजेक्शन ऐप के उपयोग के बारे में भी जागरूक किया जाएगा।
सूचना तकनीकी मंत्रालय का भी सहयोग लिया जाएगा
एक अन्य अधिकारी का कहना है कि जब से नोटबंदी हुई है, तब से केन्द्रीय सचिवालय स्थित बैंकों और एटीएम के समाने कुछ ज्यादा ही भीड़ लग रही है। इन लाइनों में ज्यादातर छोटे पदों पर काम करने वाले कर्मचारी खड़े हैं। जबकि इनकी आसानी के लिए नवंबर महीने में सभी समूह घ एवं ग वर्ग के कर्मचारियों को दस-दस हजार रुपये का अग्रिम दे दिया गया है। तब भी वे बैंक या एटीएम की लाइनों में ही खड़े नजर आते हैं। ऐसी स्थिति से समाज में गलत संदेश जा रहा है।
इन्हें प्रशिक्षण देने के लिए बैंक के अधिकारियों के साथ साथ सूचना तकनीकी मंत्रालय का भी सहयोग लिया जा रहा है। इसके अलावा सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय से इस बारे में एक बुकलेट तैयार करने को भी कहा गया है। इस बारे में शुरूआती जागरूकता कार्यक्रम पर काम भी शुरू हो गया है।
बैंकों की आधी अधूरी तैयारी
बैंकों की आधी अधूरी तैयारी
एक तरफ सरकार चाहती है कि लोग और कारोबारी नए नोट भी बैंकों में जमा करायें, उसे अपने पास नहीं रखें, दूसरी ओर ऐसे नोट को जमा करने के लिए बैंक के डिपोजिट फार्म में कोई कॉलम ही नहीं है। परचून की दुकान चलाने वाले गुड्डू साव का कहना है कि पिछले कुछ दिनों की बिक्री की रकम जमा कराने वाले जब वह बैंक पहुंचे तो वहां जमा करने का फार्म पुराना ही मिला।
उस फार्म में 2000 रुपये के नोट का कॉलम ही नहीं है। वह 2000 रुपये के नोटा की जानकारी कहां दें। एक बैंक के अधिकारी से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि कि स्टेशनरी लोकल लेवल पर नहीं छपवायी जाती, उसकी केन्द्रीकृत आपूर्ति की व्यवस्था है। जब नए फार्म आएंगे तो ग्राहकों से वही फार्म भरवाये जाएंगे।
28 फीसदी लोगों ने अभी नहीं जमा करवाए हैं पुराने नोट
कम्युनिटी इंगेजमेंट प्लेटफार्म लोकल सर्किल के एक सर्वेक्षण के मुताबिक अभी तक 28 फीसदी लोगों ने अपने 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों को जमा नहीं कराया है। ऐसे लोगों का कहना है कि ये पुराने नोट तो उनके अकाउंटेड मनी हैं, कोई काला धन तो है नहीं। जब बैंकों में लाइन कम हो जाएगी, तब जा कर जमा करा देंगे।