कांग्रेस ने कहा है कि मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले और नीलामी के नियम-शर्तों के बावजूद तीन नामी टेलीकॉम कंपंनियों को स्पेक्ट्रम आवंटन में अतिरिक्त लाभ पहुंचाया है।
पार्टी का कहना है कि ‘स्पेक्ट्रम 2.0 घोटाले’ में भाजपा सरकार पिछले दरवाजे से स्पेक्ट्रम नीलामी की राशि तय समय में न वसूलकर कंपनियों को छह साल की मोहलत दे रही है।
इससे सरकारी खजाने को 23,821 करोड़ का नुकसान होगा। वित्त और संचार मंत्रालय की संयुक्त समिति के अलावा संचार आयोग ने मुहर लगाकर इसे कैबिनेट के अनुमोदन के लिए भेजा है।
कांग्रेस मीडिया विभाग के प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला ने स्पेक्ट्रम आवंटन को लेकर अपनाई गई प्रक्रिया और होने वाले नुकसान का हवाला देकर कहा कि कांग्रेस ने इसे सुप्रीम कोर्ट ले जाने का विकल्प खुला रखा है।
बावजूद हम इसे सार्वजनिक कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जवाब मांग रहे हैं। आखिर मोदी सरकार के इस गवर्नेंस मॉडल से किसको फायदा पहुंच रहा है क्योंकि इससे सरकारी खजाने को सीधा नुकसान होगा।
उनका कहना है कि भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए तत्कालीन सीएजी द्वारा टेलीकॉम सेक्टर में नोशनल नुकसान को पारदर्शिता एवं भ्रष्टाचार का मुद्दा बनाया था। अब वास्तविक नुकसान के लिए क्या योजना है।
सुरजेवाला ने बताया कि 2016 में टेलीकॉम कंपंनी रिलायंस जियो, एयरटेल और आइडिया को अनुमानित राशि से कम में स्पेक्ट्रम आवंटित किए गए। वित्त मंत्री अरुण जेटली को इससे 98 हजार करोड़ और आईडीएफसी सिक्योरिटी लि. को 80 हजार करोड़ रुपये आने का अनुमान था।
शुरूआती रकम देने के बाद तीन साल तक कंपंनियों को कुछ नहीं देना था। जबकि कंपंनियों को नीलामी की बकाया 33, 789.12 करोड़ की राशि दस साल में जमा करानी थी। कंपंनियों ने नियम शर्तों के तहत रकम लौटाने में हाथ खड़े कर दिए तो वित्त और संचार मंत्रालय की संयुक्त कमेटी गठित की गई। जिसने रकम दस सालाना किश्तों की जगह 16 साल में लौटाने का फैसला लिया है।
संचार कमीशन ने भी अधिकारों का दुरुपयोग कर निर्णय पर अपनी मुहर लगा दी है। इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि कंपंनियां आर्थिक संकट से जूझ रही हैं। जबकि ऐसे ही एक मामले में अडानी ग्रुप को अंतरराष्ट्रीय कोयले की कीमतें बढ़ने का हवाला देकर रियायत दी गई थी। इस दलील को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया था।