अमर उजाला से खास बातचीत में कर्नल सिंह ने कहा कि कर्ज देने के बाद बैंक यह निगरानी नहीं करते हैं कि आखिर वह पैसा जिस काम के लिए लिया गया है उसी में खर्च हो रहा है या नहीं। यदि वह ऐसा करते तो स्टर्लिंग बायोटेक के मालिक चेतन संदेसरा जैसे लोग शेल कंपनियों के जरिए बैंकों से लिए कर्ज को विदेश नहीं भेज पाते। न ही माल्या और मोदी जैसे व्यवसायी हजारों करोड़ डकार कर विदेश भाग जाते। सिंह ने कहा कि मनी लांड्रिंग की वजह से ना सिर्फ करदाताओं को बल्कि ईमानदार व्यवसायियों और देश की अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान होता है।
सिंह ने बताया कि छह साल पहले विशेष निदेशक के पद के लिए आवेदन करने से पहले उन्हें ईडी के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था। लेकिन पद संभालने के बाद से लेकर तीन साल बतौर निदेशक कार्यकाल में इन्होंने ईडी की पूरी की पूरी ईमेज ही बदल डाली। उनके कार्यकाल में ईडी विवादों से दूर रहा और पहली बार पांच आर्थिक अपराध के मामलों में सजा दिलवाने में कामयाबी मिली।
सिंह के मुताबिक उनकी कामयाबी का राज हर कर्मचारी से सीधी बातचीत और सघन तकनीकी प्रशिक्षण में है। वह हर एक कर्मचारी से उनकी समस्याओं और एजेंसी के कामकाज में सुधार के लिए सुझाव पर बात करते थे। इसी दौरान उन्हें प्रमोशन से संबंधित समस्याओं से लेकर भ्रष्ट कर्मचारियों के बारे में जानकारी मिलती थी।
भ्रष्टाचार की शिकायतों पर जांच के बाद सख्त कार्रवाई की। इससे एजेंसी में इमानदारी आई। प्रमोशन जैसी समस्याओं के दूर होने से इनमें काम के प्रति लगन और बढ़ी। यहां तक कि कर्मचारी अपनी पहल पर छुट्टियों के दिन भी दफ्तर आए और देर रात तक काम करते रहे। इसी का नतीजा था कि ईडी ने पिछले तीन साल में 33563 करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त की।
जबकि इससे पहले 40 साल में केवल 1057 करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त की गई थी। सिंह के मुताबिक उनका सबसे ज्यादा जोर जांच को तेजी और सटीक तरीके से करने पर रहा। उन्होंने कहा कि बेईमानी सिर्फ रिश्वत लेना ही नहीं है। अगर आप किसी का हक उसे नहीं देते तो वह भी एक बेईमानी है।
सिंह की सबसे बड़ी सफलता ईडी को दलालों से मुक्त करने में रही। जबकि सीबीआई की बदहाली और बदनामी का मुख्य कारण दलालों का निर्बाध प्रवेश रहा। जिस मोईन कुरैशी की वजह से सीबीआई के तीन निदेशकों के खिलाफ जांच शुरू हुई उसकी जांच ईडी ने भी की लेकिन बेदाग रहते हुए।