केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह दावा करने कि केंद्र को छोड़कर, संविधान के तहत या अन्यथा कोई अन्य निकाय जनगणना या इसके समान कोई कार्रवाई करने का हकदार नहीं है, वाले बयान को कुछ घंटों के भीतर ही वापस ले लिया। सरकार ने शीर्ष अदालत में सोमवार को बताया कि अनजाने में यह दस्तावेज हलफनामे में आ गया था।
सुप्रीम कोर्ट में सोमवार सुबह ही दायर किए गए एक हलफनामे में, गृह मंत्रालय के रजिस्ट्रार जनरल के कार्यालय ने कहा था, संविधान के तहत केंद्र के अलावा कोई अन्य निकाय जनगणना या जनगणना के समान कोई कार्रवाई करने का हकदार नहीं है। हालांकि, शाम को उसने एक नया हलफनामा दायर किया, जिसमें कहा गया है कि केंद्र सरकार ने आज सुबह एक हलफनामा दायर किया था। उक्त हलफनामे में अनजाने में पैरा 5 घुस गया था। इसलिए उस हलफनामे को वापस लिया जाता है। अब उसके नए हलफनामे पर ही विचार किया जाए। मंत्रालय ने ताजा हलफनामे में फिर से कहा है कि जनगणना एक वैधानिक प्रक्रिया है और यह जनगणना अधिनियम, 1948 से शासित होती है। जनगणना का विषय सातवीं अनुसूची में प्रविष्टि 69 के तहत संघ सूची में शामिल है। उक्त प्रविष्टि के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए केंद्र सरकार ने जनगणना अधिनियम, 1948 बनाया है। जनगणना अधिनियम, 1948 की धारा 3 केवल केंद्र सरकार को जनगणना करने का अधिकार देती है।
पटना हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती वाली याचिकाओं पर दाखिल किया हलफनामा
केंद्र सरकार का यह जवाब पटना हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आई है जिसमें राज्य में विवादास्पद जाति जनगणना कराने के बिहार सरकार के फैसले को बरकरार रखा गया था। हलफनामे में गृह मंत्रालय के रजिस्ट्रार जनरल के कार्यालय ने कहा कि केंद्र सरकार संविधान के प्रावधानों और कानून के अनुसार, एससी/एसटी/एसईबीसी और ओबीसी के उत्थान के लिए सभी सकारात्मक कार्रवाई करने के लिए प्रतिबद्ध है।