केंद्र सरकार ने आम जनगणना के साथ-साथ जातिगत जनगणना कराने का निर्णय कर लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई राजनीतिक मामलों की कैबिनेट समिति (सीसीपीए) की बैठक में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया। बिहार विधानसभा चुनाव के पहले केंद्र सरकार की ओर से खेला गया यह बड़ा दांव हो सकता है। राहुल गांधी जातिगत जनगणना को लेकर जिस तरह लगातार आक्रामक रुख अपनाते आ रहे थे, 2029 के आम चुनाव में यह बड़ा मुद्दा बन सकता था। लेकिन केंद्र सरकार ने जातिगत जनगणना कराने का वादा कर कांग्रेस के हाथ से यह मुद्दा छीन लिया है।
जातिगत जनगणना के मुद्दे पर सबसे अधिक मुखर रुख कांग्रेस ने ही अपनाया था। राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा के दौरान भी पूरे देश में जातिगत जनगणना कराने की बात कही थी। बिहार में जाने के बाद भी उन्होंने अपनी इस बात को दुहराया था। कांग्रेस कर्नाटक में सत्ता में आई तो उसने वहां भी जातिगत सर्वे कराया। इस पर उसके अपने नेताओं में कुछ मतभेद अवश्य हैं, लेकिन कांग्रेस यह संदेश देने में सफल रही कि वह इस मुद्दे पर गंभीर है। वहीं, कांग्रेस की तेलंंगाना सरकार ने ओबीसी समुदाय के आरक्षण में भी बढ़ोतरी कर दी है। इससे भी कांग्रेस यह संदेश देने में सफल रही है कि यदि वह केंद्र में सत्ता में आती है तो वह पूरे देश में जातिगत जनगणना कराएगी। वह जातिगत आरक्षण पर भी दबाव बनाने में सफल रही है।
कांग्रेस का यह वादा तेलंगाना और कर्नाटक राज्य सरकारों के द्वारा उठाए गए कदमों के कारण जनता के बीच ज्यादा विश्वसनीयता प्राप्त कर सकता था। यदि विपक्ष इसको बड़ा मुद्दा बनाने में सफल रहता तो बिहार चुनाव के साथ-साथ आगामी आम चुनावों में इससे भाजपा को नुकसान हो सकता था। संभवतः यही कारण है कि केंद्र सरकार ने समय को भांपते हुए पहले ही जातिगत जनगणना कराने का निर्णय ले लिया।
यूपी के चुनाव परिणाम से भी हुआ था खतरे का एहसास
उत्तर प्रदेश को भाजपा ने गुजरात और मध्य प्रदेश के बाद अपना तीसरा सबसे मजबूत गढ़ मान लिया था। लेकिन पिछले आम चुनाव में अखिलेश यादव ने जैसे ही पीडीए के न्याय की बात की, भाजपा का किला ढह गया। कभी यूपी की 80 में 73 सीटों पर जीत हासिल करने वाली भाजपा इस चुनाव में केवल 36 सीटों पर सिमट कर रह गई।
अखिलेश यादव अभी भी पीडीए के मुद्दे को पूरी मजबूती के साथ पकड़े हुए हैं। वे अभी भी इसी मुद्दे के सहारे भाजपा को यूपी के अगले विधानसभा चुनाव में पछाड़ने की रणनीति बना रहे हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि यूपी में अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखने के लिए भी भाजपा को इस मुद्दे पर आना पड़ा।
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जातिगत मुद्दे पर आने को क्यों मजबूर हुई कांग्रेस
भाजपा ने राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के मुद्दे से पूरे देश में जिस तरह अपनी पकड़ मजबूत किया है, विपक्ष के पास कोई दूसरा ऐसा मुद्दा नहीं दिखाई दे रहा था जिससे वह भाजपा के इस तिलिस्म को चुनौती दे सके। यही कारण है कि भाजपा लगभग अजेय होने की स्थिति में आ गई है, जबकि विपक्ष के पैर चुनाव दर चुनाव उखड़ते जा रहे थे। यही कारण है कि नब्बे के दशक का अनुभव लेते हुए कांग्रेस और विपक्ष ने जातिगत राजनीति को अपनी मुख्य रणनीति में शामिल कर लिया।
विपक्ष न लेने पाए श्रेय
भाजपा पहले ही इस बात के लिए सक्रिय हो गई है कि इस निर्णय का लाभ कांग्रेस या विपक्ष का कोई दूसरा दल न ले सके। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बुधवार को प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि विपक्ष के दल जातिगत जनगणना के मुद्दे पर केवल राजनीति करते रहे हैं। जातिगत सर्वे से सही आंकड़े नहीं मिलते हैं। भाजपा नेता ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा जातिगत जनगणना कराने से समाज की असलियत सामने आएगी और सभी वर्गों का विकास करने के लिए उचित नीतियां बनाने में मदद मिलेगी।
'बाकी है भाजपा की चुनौती'
राजनीतिक विश्लेषक सुनील पांडेय ने अमर उजाला से कहा कि भाजपा अपनी रणनीति के साथ तैयार है और वह इसका लाभ विपक्ष को नहीं लेने देगी। लेकिन ओबीसी-एससी-एसटी जातियों का आरक्षण बढ़ाने का मुद्दा अभी भी केंद्र सरकार को परेशान कर सकता है। क्योंकि यदि वह आरक्षण सीमा को बढ़ाने की बात करती है तो इससे उसका पारंपरिक समर्थक उच्च वर्ग उससे दूर जा सकता है। ऐसे में इस मोर्चे पर निपटना केंद्र के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
लालू की विश्वसनीयता जनता के बीच- राजद नेता
राजद नेता अभिनंदन रंजन यादव ने अमर उजाला से कहा कि भाजपा जातिगत जनगणना के पक्ष में कभी नहीं रही है। उसके नेता हमेशा उच्च जातियों की राजनीति करते रहे हैं। जबकि लालू प्रसाद यादव की पूरी राजनीति सामाजिक न्याय को आगे बढ़ाने की रही है। ऐसे में बिहार का हर व्यक्ति यह जानता है कि सामाजिक न्याय की लड़ाई केवल राजद-कांग्रेस ने लड़ी है। उन्होंने कहा कि बिहार चुनाव में इस निर्णय का कोई असर नहीं पड़ेगा।