केंद्र सरकार आगामी विधान सभा चुनावों से पहले आदिवासी बहुल राज्यों में लघु वन्य उत्पादों की एमएसपी बढ़ाने की योजना बना रही है। चुनाव आचार संहिता लागू होने के बावजूद सरकार इसे लागू करना चाहती है। वहीं विपक्षी दलों ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए इसे एक और जुमला करार दिया है। सरकार के इस फैसले को मंजूरी मिलती है, तो तीन भाजपा शासित राज्यों राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की तकरीबन 100 विधानसभा सीटों पर इसका असर प़ड़ेगा।
वन उत्पादों की बढ़ेगी संख्या
केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्रालय के तहत आने वाले मार्केटिंग विभाग ट्राइफेड के प्रबंध निदेशक प्रवीर कृष्ण ने अमर उजाला को बताया कि लघु वन्य उत्पादों पर 40 से 60 प्रतिशत न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने का मसौदा तैयार है और इसे लागू करने के लिए वे भारतीय निर्वाचन आयोग से विशेष अनुमति लेना चाहते हैं। प्रवीर के मुताबिक यह योजना यूपीए सरकार के दौरान 2013-14 में शुरू हुई थी और उनका विभाग एमएसपी के साथ वन उत्पादों की संख्या 24 से बढ़ा कर 50 करना चाहता है।
आयोग दे सकता है अनुमति
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी के मुताबिक आचार संहिता लागू होने के बाद ऐसी योजनाओं के लिए आयोग से मंजूरी लेना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि नियमावली के मुताबिक आयोग से पूर्वानुमति लेकर सरकार ऐसे फैसले लागू कर सकती है। गौरतलब है कि भाजपा शासित मध्यप्रदेश में 41, राजस्थान में 25 और छत्तीसगढ़ में 34 सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं।
आदिवासियों को फंसाने की चाल
वहीं कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता शक्ति सिंह गोहिल का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी को गरीब, किसान की चिंता करने की बजाय केवल वोट बैंक की राजनीति करना जानते हैं। गोहिल ने कहा कि सरकार को चार साल पहले एमएसपी बढ़ाने की याद क्यों नहीं आई। चूंकि भाजपा तीनों राज्य में हार रही है, तो मोदी जी ऐसी चालें चल कर आदिवासियों को फंसा रहे हैं। गोहिल का कहना है कि अब आदिवासी उनकी चालों में फंसने वाले नहीं हैं।
व्यावहारिक नहीं योजना
सामाजिक कार्यकर्ता और स्वराज इंडिया के प्रमुख योगेंद्र यादव ने कहा कि यह योजना केवल जुमला भर है और मोदी जी इसका श्रेय अपने भावी भाषण में लेंगे। यादव के मुताबिक ये केवल प्रचार का प्रोपेगंडा भर है। योजना की व्यावहारिकता पर सवाल उठाते हुए यादव ने कहा कि जब सरकार वन्य उत्पादों की खरीद ही नहीं करती है, तो एमएसपी लागू करने का फायदा क्या है।
चुनाव बाद करेंगे लागू
केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्रालय के सचिव दीपक खांडेकर का कहना है कि अगर चुनाव आयोग उनके आवेदन पर आपत्ति दर्ज करता है, तो इससे आदिवासियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। उन्होंने बताया कि वन्य उत्पादों को एकत्र करने का वक्त अगले साल जनवरी से शुरू होगा और जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, वहां चुनाव परिणामों के बाद इस फैसले को लागू किया जाएगा।