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पेरिफेरल एक्सप्रेसवे के बकाये पर सुप्रीम कोर्ट में भिड़ीं केंद्र और दिल्ली सरकार

Sat, 23 Nov 2019 02:41 AM IST
संजीव कुमार झा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के बीच ईस्टर्न व वेस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे के बकाये को लेकर टकराव की स्थिति बन गई है। केंद्र सरकार ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली से भू-अधिग्रहण में अपने हिस्से के तौर पर करीब 3600 करोड़ रुपये चुकाने को कहा है, वहीं दिल्ली सरकार ने स्पष्ट तौर पर और रकम चुकाने से इनकार कर दिया है।

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इन दोनों एक्सप्रेसवे का निर्माण राष्ट्रीय राजधानी में अनावश्यक वाहनों का प्रवेश रोककर प्रदूषण व ट्रैफिक जाम को नियंत्रित करने के लिए किया गया था। शुक्रवार को सुनवाई के बाद जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस दीपक गुप्ता की पीठ ने दिल्ली सरकार को 10 दिन के अंदर शपथपत्र के जरिए अपना जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है।

इससे पहले पीठ के सामने केंद्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एएनएस नादकर्णी ने केंद्र सरकार के हलफनामे का हवाला देते हुए कहा कि दिल्ली सरकार को बकाया रकम चुकानी चाहिए। सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया था।
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इसमें कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से 18 अक्तूबर को दिए गए निर्देश के तहत 11 नवंबर को कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में सचिवों की कमेटी की बैठक आयोजित की गई थी। बैठक में निर्णय लिया गया था कि दिल्ली सरकार को बकाया रकम चुकानी होगी।

दिल्ली को 1000 करोड़ रुपये का भुगतान तत्काल करना होगा और शेष रकम एक महीने के अंदर जमा हो जानी चाहिए। बैठक में पहले से ही तय उस नियम पर भी सहमति बनी, जिसमें जमीन अधिग्रहण की लागत बढ़ने की स्थिति में 50 फीसदी खर्च दिल्ली सरकार और 25-25 फीसदी खर्च यूपी और हरियाणा के हिस्से में आने का निर्णय लिया गया था। केंद्र सरकार ने दिल्ली पर 3668.21 करोड़ रुपये और यूपी पर 63.47 करोड़ रुपये बकाया होने की बात कही है।

दिल्ली सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने पीठ से कहा कि उन्हें सचिवों की कमेटी का निर्णय मंजूर नहीं है। उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार अब कोई भी रकम नहीं जमा करना चाहती। रोहतगी ने दलील दी कि वर्ष 2005 में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से एक्सप्रेसवे को लेकर आदेश पारित करते समय परियोजना की लागत 800 करोड़ रुपये थी।

यह अब बढ़कर 8000 करोड़ रुपये हो गई है। उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार ने पुरानी लागत के हिसाब से अपना हिस्सा जमा करा दिया है।

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यूपी-हरियाणा को ज्यादा लाभ, वे चुकाएं ज्यादा हिस्सा : दिल्ली

रोहतगी ने कहा कि दिल्ली सरकार का बजटीय आवंटन बहुत सीमित है। उन्होंने कहा कि एक्सप्रेसवे के किनारे टाउनशिप बनाने से इसका लाभ यूपी और हरियाणा को ज्यादा हो रहा है। दिल्ली सरकार इसके मद और रकम नहीं देना चाहती।

दिल्ली सरकर ने पहले ही 700 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया है। रोहतगी ने कहा कि पर्यावरण उपकर के नाम पर दिल्ली सरकार ने 900 करोड़ रुपये वसूले हैं और वह इस रकम का इस्तेमाल पर्यावरण अनुकूल इलेक्ट्रिक बसों को खरीदने में करना चाहती है।

रोहतगी ने यह भी कहा कि ऐसा कोई करार या निर्देश नहीं है कि इस परियोजना में दिल्ली को 50 फीसदी वहन करना होगा। हालांकि एमिकस क्यूरी ने पीठ को बताया कि फरवरी, 2005 को शीर्ष अदालत की तरफ से स्वीकृत की गई कैबिनेट सचिव की रिपोर्ट में दिल्ली, यूपी और हरियाणा को भू-अधिग्रहण की लागत 50:25:25 के अनुपात में वहन करने का प्रस्ताव रखा गया था।

 यूपी-हरियाणा ने भी कहा कि दे चुके हैं अपना हिस्सा

पीठ के सामने हरियाणा सरकार के वकील ने बताया कि उन्होंने अपना हिस्सा जमा करा दिया है। उधर, प्रदूषण मामले में शीर्ष अदालत की एमिकस क्यूरी के तौर पर मदद कर रहीं वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने बताया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने भी अपने 25 फीसदी हिस्से के तौर पर 1200 करोड़ रुपये जमा करा दिए हैं।

 क्या हैं पेरिफेरल एक्सप्रेसवे

सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में दिल्ली के चारों तरफ दो हाईवे बनाने का निर्देश दिया था, जो हरियाणा के पलवल से पूर्वी और पश्चिमी दिशा में घूमकर कुंडली में आपस में जुड़ते हुए राष्ट्रीय राजधानी के चारों तरफ 270 किलोमीटर का एक गोलाकार सिग्नल मुक्त बाईपास बनाते हैं।

ईस्टर्न पेरिफेरल पलवल से शुरू होकर फरीदाबाद, गौतमबुद्ध नगर (ग्रेटर नोएडा), गाजियाबाद व बागपत जिले से होते हुए कुंडली पहुंचता है, जबकि वेस्टर्न पेरिफेरल पलवल से शुरू होकर मानेसर होते हुए कुंडली पहुंचता है। दोनों एक्सप्रेसवे की लंबाई 135-135 किलोमीटर है।
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