रोहतगी ने कहा कि दिल्ली सरकार का बजटीय आवंटन बहुत सीमित है। उन्होंने कहा कि एक्सप्रेसवे के किनारे टाउनशिप बनाने से इसका लाभ यूपी और हरियाणा को ज्यादा हो रहा है। दिल्ली सरकार इसके मद और रकम नहीं देना चाहती।
दिल्ली सरकर ने पहले ही 700 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया है। रोहतगी ने कहा कि पर्यावरण उपकर के नाम पर दिल्ली सरकार ने 900 करोड़ रुपये वसूले हैं और वह इस रकम का इस्तेमाल पर्यावरण अनुकूल इलेक्ट्रिक बसों को खरीदने में करना चाहती है।
रोहतगी ने यह भी कहा कि ऐसा कोई करार या निर्देश नहीं है कि इस परियोजना में दिल्ली को 50 फीसदी वहन करना होगा। हालांकि एमिकस क्यूरी ने पीठ को बताया कि फरवरी, 2005 को शीर्ष अदालत की तरफ से स्वीकृत की गई कैबिनेट सचिव की रिपोर्ट में दिल्ली, यूपी और हरियाणा को भू-अधिग्रहण की लागत 50:25:25 के अनुपात में वहन करने का प्रस्ताव रखा गया था।
यूपी-हरियाणा ने भी कहा कि दे चुके हैं अपना हिस्सा
पीठ के सामने हरियाणा सरकार के वकील ने बताया कि उन्होंने अपना हिस्सा जमा करा दिया है। उधर, प्रदूषण मामले में शीर्ष अदालत की एमिकस क्यूरी के तौर पर मदद कर रहीं वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने बताया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने भी अपने 25 फीसदी हिस्से के तौर पर 1200 करोड़ रुपये जमा करा दिए हैं।
क्या हैं पेरिफेरल एक्सप्रेसवे
सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में दिल्ली के चारों तरफ दो हाईवे बनाने का निर्देश दिया था, जो हरियाणा के पलवल से पूर्वी और पश्चिमी दिशा में घूमकर कुंडली में आपस में जुड़ते हुए राष्ट्रीय राजधानी के चारों तरफ 270 किलोमीटर का एक गोलाकार सिग्नल मुक्त बाईपास बनाते हैं।
ईस्टर्न पेरिफेरल पलवल से शुरू होकर फरीदाबाद, गौतमबुद्ध नगर (ग्रेटर नोएडा), गाजियाबाद व बागपत जिले से होते हुए कुंडली पहुंचता है, जबकि वेस्टर्न पेरिफेरल पलवल से शुरू होकर मानेसर होते हुए कुंडली पहुंचता है। दोनों एक्सप्रेसवे की लंबाई 135-135 किलोमीटर है।