देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में फिल्म सेंसर बोर्ड अलोकतांत्रिक ढांचे के जैसा है। उसका काम सिर्फ दर्शकों की उम्र के लिहाज से सर्टिफिकेट देना है। बच्चों को कौन सी फिल्म देखनी है कौन सी नहीं, उनके लिए उनके अभिभावक ही सबसे बड़े सेंसर बोर्ड हैं। ये बातें बुधवार को राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में चल रहे भारत रंग महोत्सव में आए एनएसडी के पूर्व छात्र व मशहूर अभिनेता मनोज वाजपेयी ने कहीं। वे लोगों के सवालों का जवाब दे रहे थे। बुधवार को भारत रंग महोत्सव में कुल पांच नाटकों का मंचन किया गया।
महोत्सव में इंटरफेस कार्यक्रम में आए मनोज वाजपेयी ने एनएसडी के छात्रों का सवाल देते हुए कहा कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए अनुशासन बेहद जरूरी है। पुराने दिनों को याद करते हुए कहा कि वे तड़के उठकर रिहर्सल करते थे लेकिन कभी किसी को शिकायत नहीं की। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि सेंसर बोर्ड को फिल्म के कंटेंट के लिहाज से सिर्फ सर्टिफिकेट देना चाहिए। वह उम्र के लिहाज से होना चाहिए।
इसमें निर्देशक श्यामल चक्रवती की शेकल छेनरा हाटेर खोंजे, डी. एलुमलई की द्रौपदी वस्त्रावरणम, देबोरा मेरोला की स्पेशनिश नाटक एना इन द ट्रापिक्स, नॉन वर्बल नाटक लव योर नेचर जिसका निर्देशन वाई. सदानंद सिंह और सुनील शानबाग की निर्देशित लॉरेटा का मंचन किया गया। इस दौरान काफी दर्शकों ने नाटकों का लुत्फ उठाया।