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Supreme Court Updates: मणिपुर में महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाने के आरोपी की जमानत रद्द कराने SC पहुंची सीबीआई

Tue, 24 Mar 2026 06:29 PM IST
Rahul Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : पीटीआई
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सुप्रीम कोर्ट में मणिपुर हिंसा मामले पर नई सुनवाई शुरू हो गई है। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आरोपी अरुण खुंदोंगबाम उर्फ नानाओ को मिली जमानत को रद्द करने की मांग की है।  यह मामला मई 2023 की मणिपुर जातीय हिंसा से जुड़ा है। उस दौरान एक भीड़ ने तीन महिलाओं को निर्वस्त्र कर उन्हें घुमाया था। महिलाओं के साथ गैंगरेप भी किया गया। सीबीआई ने कोर्ट को बताया कि यह बेहद गंभीर अपराध है। आरोपी इस घटना में शामिल था, जिसमें महिलाओं का अपमान किया गया और उनके साथ हिंसा हुई।
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गुवाहाटी हाईकोर्ट ने पिछले साल सितंबर में इस आरोपी समेत दो लोगों को जमानत दे दी थी। अब सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में इस जमानत को चुनौती दी है। सुनवाई के दौरान सीबीआई के वकील ने जोर देकर कहा कि इस तरह के जघन्य अपराध में जमानत नहीं मिलनी चाहिए।

पीड़ित पक्ष की ओर से वरिष्ठ वकील निजाम पाशा ने कोर्ट में कहा कि वे पीड़ितों का पक्ष रख रहे हैं। अगर जरूरत पड़े तो कोर्ट पीड़ितों के लिए लीगल एड काउंसिल नियुक्त कर सकता है, ताकि न्याय मिल सके। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की याचिका पर सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर दिया है। कोर्ट ने आरोपी और अन्य पक्षों से जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई बाद में होगी, जब सभी के जवाब आएंगे।
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यह घटना मणिपुर की जातीय हिंसा की उन कई घटनाओं में से एक है, जिनकी जांच सीबीआई कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही इन मामलों की सुनवाई गुवाहाटी में विशेष सीबीआई कोर्ट में स्थानांतरित कर दी थी, ताकि पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा बनी रहे और निष्पक्ष सुनवाई हो सके।

इस मामले में आरोपी पर दंगे भड़काने, महिलाओं की इज्जत लूटने, गैंगरेप और अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार कानून के तहत भी आरोप लगाए गए हैं। सीबीआई का कहना है कि सबूतों के आधार पर आरोपी को जमानत नहीं मिलनी चाहिए, क्योंकि यह महिलाओं के खिलाफ हिंसा का गंभीर मामला है।

पीड़ित परिवारों और समाज में इस घटना को लेकर गहरा आक्रोश है। कई संगठनों ने न्याय की मांग की थी। अब सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका लंबित है। फैसले आने के बाद ही साफ होगा कि आरोपी को जमानत मिलेगी या नहीं।

यह मामला पूरे देश का ध्यान खींच रहा है, क्योंकि इसमें महिलाओं की सुरक्षा और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता शामिल है। सीबीआई की कोशिश है कि सभी दोषियों को सजा मिले और पीड़ितों को न्याय मिले।
 
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यूएपीए मामलों के जल्द निपटारे के लिए कितने विशेष कोर्ट की जरूरत
सुप्रीम कोर्ट ने यूएपीए जैसे गंभीर मामलों की सुनवाई में देरी पर नाराजगी जताते हुए 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा है कि वे यह पहचान करें और रिपोर्ट दें कि उन्हें कितने विशेष कोर्ट की जरूरत है, जिससे कि मामलों का निपटारा जल्द हो सके। शीर्ष अदालत ने कहा कि इन मामलों की सुनवाई रोजाना आधार पर होनी चाहिए और हर हाल में एक वर्ष के भीतर पूरी की जानी चाहिए। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने राज्यों से कहा कि वे यह तय करें कि ऐसे मामलों के लिए कितनी विशेष अदालतों की जरूरत है। राज्यों को चार सप्ताह के भीतर इस संबंध में रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट से कहा कि इन अदालतों के सुचारु संचालन के लिए पर्याप्त कर्मचारी की नियुक्ति सुनिश्चित की जाए। साथ ही एनआईए, सीबीआई और अन्य जांच एजेंसियों को निर्देश दिया गया कि हर विशेष अदालत के लिए कम से कम एक समर्पित लोक अभियोजक नियुक्त किया जाए। यदि अभियोजकों की कमी होती है तो केंद्र और राज्य सरकारों को विशेष लोक अभियोजक नियुक्त करने के लिए कहा गया है। शीर्ष अदालत एक स्वत: संज्ञान मामले की सुनवाई कर रही थी जिसमें यूएपीए और मकोका जैसे कानूनों के तहत लंबित मामलों को जल्द निपटाने पर जोर दिया गया है।
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