ठाणे की एक विशेष सीबीआई अदालत ने एक पूर्व केंद्रीय सरकारी कर्मचारी को रिश्वत लेने के आरोप से बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि मांग के पुख्ता सबूत के बिना केवल नोटों की बरामदगी दोषी ठहराने के लिए अपर्याप्त है। यह मामला अगस्त 2006 का है।
विशेष न्यायाधीश डी एस देशमुख ने गुरुवार को अरविंद मोतिराम सावंत को सभी आरोपों से बरी किया। सावंत उस समय नवी मुंबई के सीबीडी बेलापुर स्थित रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज (आरओसी) कार्यालय में क्लर्क के पद पर कार्यरत थे। अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता ने अनाधिकृत निर्माण के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू करने के लिए आरओसी से एक निजी कंपनी के निगमन दस्तावेजों और मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं।
आरोप था कि सावंत ने प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए 1000 रुपये की मांग की थी, जिसे बाद में घटाकर 800 रुपये कर दिया गया। सीबीआई को सूचित किए जाने के बाद, 22 अगस्त 2006 को एक जाल बिछाया गया और आरोपी से दागी नोट बरामद किए गए।
राशि रिश्वत नहीं बल्की चालान शुल्क था
जिरह के दौरान बचाव पक्ष ने स्थापित किया कि सावंत प्रमाणित प्रतियां जारी करने के लिए अंतिम हस्ताक्षरकर्ता अधिकारी नहीं थे। उनके पास आरओसी की हिरासत में दस्तावेजों को जारी करने का अधिकार क्षेत्र भी नहीं था। अदालत ने यह भी नोट किया कि मानक आधिकारिक प्रोटोकॉल में चालान के माध्यम से शुल्क जमा करना शामिल था। चर्चा की गई राशि व्यक्तिगत रिश्वत के बजाय राज्य के आधिकारिक चालान शुल्क से संबंधित हो सकती थी। अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी आरोपी को सीधे तौर पर दोषी नहीं ठहराते थे।
अदालत किस आधार पर किया बरी
अदालत ने अपने फैसले में महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। न्यायाधीश ने कहा, जब पिछली मांग के सबूत की कमी हो या वह संतोषजनक न हो, तो आरोपी से दागी राशि की बरामदगी उसे दोषी ठहराने के लिए पूरी तरह से अपर्याप्त होगी। इस आधार पर सावंत को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया। यह फैसला रिश्वत के मामलों में सबूतों की गुणवत्ता पर जोर देता है।