सीबीआई चीफ आलोक वर्मा ने अपनी याचिका में कहा कि जांच एजेंसी की स्वायत्तता आवश्यक है, क्योंकि कई मौकों पर उच्च स्तरीय लोगों के खिलाफ जांच करने के दौरान एजेंसी को सरकार के मनमाफिक नहीं आने वाला निर्णय करना पड़ता है। अपनी याचिका में वर्मा ने केंद्रीय सतर्कता आयोग व कार्मिक विभाग की तरफ से उन्हें पद से हटाकर संयुक्त निदेशक एम नागेश्वर राव को अंतरिम सीबीआई निदेशक बनाने को प्राकृतिक न्याय के खिलाफ बताया और इसे निरस्त करने की मांग की। वर्मा ने इस निर्णय को यह संविधान के अनुच्छेद-14, 19 और 21 का उल्लंघन भी बताया।
दो साल का होता है सीबीआई चीफ का कार्यकाल
वर्मा ने कहा है कि दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टेबलिसमेंट एक्ट, 1946 के प्रावधानों के तहत सीबीआई निदेशक का दो वर्ष का निर्धारित कार्यकाल होता है। निदेशक की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के चीफ जस्टिस की मौजूदगी वाली उच्चाधिकार समिति करती है, लेकिन उनके तबादले के लिए इस समिति से सहमति नहीं ली गई।
याचिका में वर्मा ने राकेश अस्थाना को भी घेरने का प्रयास किया। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि अस्थाना के खिलाफ मामले लंबित होने और उनके विरोध के बावजूद अस्थाना को विशेष निदेशक के पद पर नियुक्त किया गया था। उन्होंने आरोप लगाया है कि अस्थाना ने कुछ जांच में बाधाएं उत्पन्न की। इनमें से कई मामले संवेदनशील है। कुछ मामलों की तो सुप्रीम कोर्ट निगरानी भी कर रही है। सीबीआई निदेशक और अन्य सभी अधिकारी कुछ चुनिंदा कार्रवाई को लेकर एकमत रहते थे, लेकिन विशेष निदेशक राकेश अस्थाना का अलग नजरिया होता था।