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सीबीआई की खोई विश्वसनीयता छह महीने में वापस आ सकती है, बशर्ते कुछ ऐसा करें तो

Fri, 25 Jan 2019 12:56 PM IST
Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
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सीबीआई मुख्यालय - फोटो : PTI
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अफसरों के विवाद और कथित राजनीतिक हस्तक्षेप के बाद धूमिल हुई सीबीआई की साख दोबारा से बनाने के प्रयासों में केंद्र सरकार जुटी है। हालांकि यह राह सरकार के लिए उतनी आसान भी नहीं है। प्रधानमंत्री, सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश और नेता प्रतिपक्ष वाली सलेक्ट कमेटी पहली बैठक में सीबीआई के नए निदेशक का चयन नहीं कर सकी। मतलब अभी सब कुछ सामान्य नहीं है। इन सबके बीच एक सवाल उठ रहा है कि क्या सीबीआई की खोई हुई विश्वसनीयता दोबारा से बहाल हो पाएगी। इसका जवाब सीबीआई के पूर्व निदेशक अमर प्रताप सिंह ने दिया है। उनका कहना है कि जांच एजेंसी की विश्वसनीयता 3 से 6 महीने में वापस आ सकती है। बशर्ते सरकार ईमानदारी से कुछ कदम उठाए तो।
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पहले ऐसी नहीं थी सीबीआई निदेशक की चयन प्रक्रिया

बता दें कि सीबीआई निदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया, जो आज है, वह पहले नहीं थी। अगर नब्बे की दशक की बात करें तो उस वक्त सीबीआई निदेशक को नियुक्त करने का अधिकार पूरी तरह से केंद्र सरकार के पास था। दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिसमेंट एक्ट के तहत सरकार जब चाहे निदेशक को हटा सकती थी। विपक्षी दलों ने इसी वजह से सीबीआई की कार्यप्रणाली में राजनीतिक हस्तक्षेप का आरोप लगाया था। 

सुप्रीम कोर्ट ने विनीत नारायण मामले में सीबीआई निदेशक को थोड़ी मजबूती देने का काम किया। इस फैसले के बाद निदेशक का कार्यकाल न्यूनतम दो साल कर दिया गया। इसके बाद यह उम्मीद की गई कि अब जांच एजेंसी का निदेशक केंद्र सरकार के दबाव में आकर काम नहीं करेगा। सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद ही सीबीआई निदेशक की नियुक्ति के लिए एक चयन समिति का गठन हो सका। 
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इसका फायदा यह हुआ कि निदेशक को मनमर्जी से हटाना या उसका तबादला करना बंद हो गया। ये दोनों काम सेलेक्शन पैनल की मर्जी के बिना नहीं हो सकते थे। इस प्रक्रिया में सेलेक्शन कमेटी, सीवीसी के अलावा गृह सचिव और डीओपीटी के सचिव की सहमति जरुरी थी। नए निदेशक का चयन करने के लिए भी यही कमेटी सूची तैयार कर उसे प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजती थी। 

2013 में दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान (डीएसपीई) अधिनियम 1946 की धारा 4ए में लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम के अंतर्गत संशोधन कर दिया गया। इसके बाद प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और विपक्ष के नेता सर्च कमेटी द्वारा भेजे गए नामों में से निदेशक का चयन करते हैं। 
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एजेंसी के अफसरों को दिलाना होगा भरोसा

सीबीआई अफसर (फाइल)
सीबीआई के पूर्व निदेशक अमर प्रताप सिंह का कहना है कि सरकार चाहे तो यह संभव है। केवल तीन से छह महीने लगेंगे खोई विश्वसनीयता वापस आने में। एजेंसी के अफसरों को यह भरोसा दिलाना होगा कि उनके तय कार्यकाल और एजेंसी की तबादला नीति में कोई बदलाव नहीं हो रहा। एक यूनिट से दूसरी यूनिट में तो तबादला ठीक है, लेकिन कहीं दूसरी जगह तबादला होता है तो उसका असर अफसरों या कर्मियों के परिवार पर भी पड़ता है। 

एजेंसी में जब भी कुछ गलत होता है तो उसकी मार जूनियर अफसरों पर ज्यादा पड़ती है। सच्चाई यह है कि उनका कोई कसूर नहीं होता। वे वही करते हैं जो बॉस कहता है। सीबीआई से धड़ेबाजी को बिल्कुल खत्म किया जाए। अगर कोई अफसर ऐसा कर रहा है तो उसे फौरन बाहर करें। 

यह देखें कि उसने सीबीआई में कितने समय तक काम किया

नए निदेशक की चयन प्रक्रिया में यह देखना बहुत जरुरी है कि वह अफसर इससे पहले सीबीआई में कितने समय तक रहा है। सेलेक्ट कमेटी उसी अफसर को तव्वजो दे, जिसने एजेंसी में बेहतर काम किया हो। कई राज्यों में अच्छे अफसर मौजूद हैं, उन्हें सीबीआई में लाया जा सकता है। 

निदेशक को किसी मामले में पद सोपान के तहत सभी अफसरों के कमेंट अवश्य लेने चाहिए। आईओ, एसपी, डीआईजी, ज्वाइंट डायरेक्टर और एडीशनल डायरेक्टर सबके कमेंट देखने के बाद किसी अंतिम निर्णय पर पहुंचे। एपी सिंह ने कहा, सेलेक्ट कमेटी के सामने एक साथ इतने ज्यादा नाम रखना ठीक नहीं है। इससे योग्यता को ठीक से नहीं परखा जा सकता। 

पहले सीवीसी तीन नाम भेज देता था, उनमें से एक का चयन कर लिया जाता। अब एक साथ दर्जनों अफसरों का नाम भेजना किसी भी रूप में ठीक नहीं है। अगर नियुक्ति प्रक्रिया में केवल यही देख लें कि फलां अफसर इससे पहले कितने वर्ष तक जांच एजेंसी का हिस्सा रहा है तो चयन आसान हो जाता है।
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