सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा ने दिल्ली हाईकोर्ट को बताया कि विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज करने के लिए कार्मिक व प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) की अनुमति की जरूरत नहीं थी। सीबीआई ने भी वर्मा के इस दलील से सहमति जताई।
जस्टिस नजमी वजीरी की पीठ के समक्ष अस्थाना की याचिका का विरोध करते हुए वर्मा के वकील ने शुक्रवार को कहा कि एफआईआर दर्ज करने से पहले तत्कालीन एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) पीएस नरसिम्हा की राय ली गई थी। उनका कहना था कि जिन अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं, उन पर मुकदमा दर्ज करने के लिए सक्षम अधिकारी की अनुमति की जरूरत नहीं है।
सीबीआई के हलफनामे में भी एएसजी ने कहा था कि किसी केस की जांच के दौरान एजेंसी को किसी संज्ञेय अपराध की जानकारी मिलने पर एफआईआर के लिए अनुमति जरूरी नहीं है। ऐसे मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा-17ए भी लागू नहीं होती, क्योंकि जांच पहले से चल रही थी।
सीबीआई के वकील ने कहा कि इस मामले में अस्थाना, डीएसपी देवेंद्र कुमार और बिचौलिया मनोज प्रसाद के खिलाफ संज्ञेय अपराध की एफआईआर दर्ज करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य मौजूद थे। इससे पहले अस्थाना की याचिका पर सीबीआई ने अपने जवाब में इन अधिकारियों के खिलाफ संज्ञेय अपराध के साक्ष्य होने की बात कही थी।
‘एफआईआर बदनीयत से दर्ज की गई’
राकेश अस्थाना और देवेंद्र कुमार के वकीलों ने कहा कि एफआईआर आलोक वर्मा की बदनीयती का नतीजा है। याची अस्थाना ने वर्मा के खिलाफ दो करोड़ की घूस लेने की पुख्ता जानकारी मिलने के बाद 28 अगस्त, 2018 को कैबिनेट सचिव को पत्र लिखकर जानकारी दी थी। इसके बाद वर्मा ने अस्थाना और अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा-17ए के मुताबिक, किसी भी सरकारी अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार की एफआईआर बिना सक्षम अधिकारी की अनुमति के दर्ज नहीं हो सकती। इस मामले में ऐसा नहीं किया गया।