नई दिल्ली स्थित इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित कार्यक्रम में किसानों की आय बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण के लिए चलाए जा रहे ईशा फाउंडेशन के कावेरी कॉलिंग अभियान की उपलब्धियों पर चर्चा की गई। इस अवसर पर तमिलनाडु के सफल किसान वल्लुवन और अभियान के प्रोजेक्ट डायरेक्टर आनंद एथिराजालु ने अपने अनुभव और विचार साझा किए। उन्होंने बताया कि पेड़ आधारित खेती न केवल किसानों की आय बढ़ा रही है, बल्कि मिट्टी, पानी और पर्यावरण के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
'कावेरी कॉलिंग' एक अभूतपूर्व पर्यावरण-पुनर्स्थापन परियोजना है और दुनिया की सबसे बड़ी किसान-संचालित पारिस्थितिक पहल है, जिसमें कृषि क्षेत्रों के लिए एक 'गेम-चेंजर' (बड़ा बदलाव लाने वाला) साबित होने की अपार क्षमता है। 'कावेरी कॉलिंग' कर्नाटक और तमिलनाडु के किसानों को उनके निजी खेतों पर वृक्ष-आधारित कृषि (पेड़ों की खेती) अपनाने में मदद कर रहा है, जिससे उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो रही है।
तमिलनाडु के कुड्डालोर में स्थित ईशा नर्सरी, सालाना उत्पादन क्षमता (8.5 मिलियन पौधे) और उगाई जाने वाली प्रजातियों की विविधता (54 प्रजातियां) के मामले में दुनिया की सबसे बड़ी सिंगल-साइट नर्सरियों में से एक है। कर्नाटक सरकार और ईशा आउटरीच ने एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं, ताकि वे मिलकर काम कर सकें और कावेरी बेसिन का हिस्सा बनने वाले जिलों में 'कावेरी कॉलिंग' और सरकार की अलग-अलग कृषि-वानिकी योजनाओं के बीच तालमेल बिठा सकें।
खेती में हो रहा है बदलाव
तमिलनाडु के किसान वल्लुवन ने बताया कि पहले वे केवल नारियल की खेती करते थे। इस एकल खेती प्रणाली में उन्हें कई बार आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ा। मौसम की मार, उत्पादन में उतार-चढ़ाव और बढ़ती लागत के कारण खेती से पर्याप्त लाभ नहीं मिल रहा था। इसके बाद उन्होंने पेड़ आधारित और बहुफसली खेती को अपनाया, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव आया। उन्होंने बताया कि अब उनकी आय पहले की तुलना में लगभग छह गुना बढ़ चुकी है। खेती के इस नए मॉडल ने उन्हें स्थायी और नियमित आय का स्रोत उपलब्ध कराया है। इसी उत्कृष्ट कार्य के लिए उन्हें संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) द्वारा भी सम्मानित किया जा चुका है।
फूड फॉरेस्ट मॉडल से मिला बड़ा लाभ
वल्लुवन ने अपने खेत को एक ‘फूड फॉरेस्ट’ के रूप में विकसित किया है। पहले जहां खेत में केवल नारियल के पेड़ थे, वहीं अब नारियल के साथ काली मिर्च, विभिन्न फलदार वृक्ष, इमारती लकड़ी के पेड़ और कई अन्य फसलें भी उगाई जा रही हैं। उन्होंने बताया कि इस मॉडल से खेत की जैव विविधता बढ़ी है और किसानों को साल भर अलग-अलग स्रोतों से आय प्राप्त होती है। यदि किसी एक फसल का उत्पादन कम भी हो जाए तो दूसरी फसलें आर्थिक सुरक्षा प्रदान करती हैं। इससे खेती का जोखिम भी काफी कम हो गया है।
नई तकनीकों से घटी लागत
किसान वल्लुवन का कहना है कि कम जुताई, मल्चिंग और कवर क्रॉपिंग जैसी आधुनिक कृषि तकनीकों ने खेती की लागत को काफी कम किया है। इन तकनीकों के उपयोग से मिट्टी की नमी लंबे समय तक बनी रहती है और खरपतवारों की समस्या भी कम होती है। उन्होंने कहा कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता कम होने से खर्च घटा है। साथ ही मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ी है, जिससे उसकी उर्वरता में सुधार हुआ है। इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ा है और खेत की उत्पादकता पहले की तुलना में काफी बेहतर हुई है।
सूखा और बाढ़ जैसी चुनौतियों से मुकाबला
पेड़ आधारित खेती का एक बड़ा लाभ यह भी है कि खेत मौसम की विपरीत परिस्थितियों का बेहतर ढंग से सामना कर पाते हैं। वल्लुवन ने बताया कि उनके खेत में लगाए गए विभिन्न प्रकार के पेड़ और पौधे मिट्टी को सुरक्षित रखते हैं और जल संरक्षण में मदद करते हैं। इससे सूखा पड़ने पर भी खेत में नमी बनी रहती है, जबकि भारी बारिश या बाढ़ की स्थिति में मिट्टी का कटाव कम होता है।
कावेरी कॉलिंग अभियान का उद्देश्य
प्रेसवार्ता में कावेरी कॉलिंग अभियान के प्रोजेक्ट डायरेक्टर आनंद एथिराजालु ने बताया कि यह केवल पेड़ लगाने का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि खेती की पूरी व्यवस्था में बदलाव लाने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि अभियान के तहत अब तक 13.4 करोड़ पेड़ लगाए जा चुके हैं और लगभग 2.6 लाख किसानों को वृक्ष आधारित खेती अपनाने में सहायता प्रदान की गई है। उन्होंने बताया कि इस पहल का मुख्य उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार करना और कावेरी नदी के जल प्रवाह को बनाए रखना है। उनका मानना है कि यदि सरकार और किसान मिलकर काम करें तो जल संरक्षण, मिट्टी के पुनर्जीवन और ग्रामीण आजीविका को मजबूत बनाने के बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं।
किसानों को मिल रही हर संभव सहायता
आनंद एथिराजालु ने बताया कि कावेरी कॉलिंग अभियान के तहत किसानों को कम कीमत पर पौधे उपलब्ध कराए जा रहे हैं। तमिलनाडु में एशिया की सबसे बड़ी एकल-स्थल नर्सरी स्थापित की गई है, जहां महिलाओं द्वारा हर वर्ष लाखों पौधे तैयार किए जाते हैं। इसके अलावा किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण कार्यक्रम और डिजिटल सहायता भी प्रदान की जाती है, ताकि वे आसानी से पेड़ आधारित खेती अपना सकें। उन्होंने यह भी बताया कि उत्तर भारत में इस तरह की कोई योजना शुरू करने की तैयारी नहीं है। हालांकि, दक्षिण भारत में यह अभियान किसानों की आय बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में सकारात्मक परिणाम दे रहा है।