यूपी में विधानसभा चुनावों का बिगुल बजते ही राजनीतिक दलों ने मोर्चाबंदी तेज कर दी है। अधिकतर टिकटों का वितरण किया जा चुका है तो चुनावी वादे और दावे भी जनता के बीच पहुंचाए जा चुके हैं। वादे सब विकास के नाम पर चुनाव लड़ने के कर रहे हैं लेकिन हकीकत यही है कि निगाहें अभी भी जातियों पर ही टिकी हैं। आलम ये है कि तमाम प्रमुख दल किसी न किसी खास जाति के भरोसे चुनावी समर में उतर रहे हैं। आइए डालते हैं राजनीतिक दलों की पसंदीदा जातियों पर एक निगाह।
भाजपा
यूपी चुनावों में सबसे ज्यादा निगाहें भाजपा के प्रदर्शन पर ही टिकी होंगी, उसकी बड़ी वजह ये है कि तीन साल पहले हुए लोकसभा चुनावों में पार्टी ने राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से 73 पर जीत हासिल करते हुए विरोधियों को जोरदार पटखनी दी थी। यूपी में इसी शानदार प्रदर्शन की बदौलत केंद्र में भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनने का रास्ता साफ हुआ था।
मौजूदा विधानसभा चुनावों के लिए रैलियां कर रहे प्रधानमंत्री मोदी यूं तो विकास के नाम पर वोट मांगने की बात कर रहे हैं लेकिन हकीकत यही है कि पार्टी की निगाहें अगड़ी जातियों पर ही टिकी हुई हैं जो उसका कोर वोटर भी मानी जाती हैं। खासकर वैश्य, जिन्हें भाजपा का कट्टर समर्थक माना जाता है। भाजपा ने अभी तक जितने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की है उसमें से अधिकतर अगड़ी जातियों के हैं। अगडों के अलावा पार्टी की निगाहें पिछडों पर भी टिकी हैं।
सपा
राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव यूं तो पिछले पांच सालों में कराए गए विकास कार्यों के नाम पर जनता के बीच जाने की बात कर रहे हैं लेकिन हकीकत ये ही है कि उन्होंने भी अधिकतर टिकट यादव और मुस्लिमों को ही दिए हैं। पिछड़े वर्ग में यादव बिरादरी का प्रतिनिधित्व सबसे ज्यादा है और इसे सपा का बेस वोटर भी माना जाता है। अपने बेस वोटर के अलावा समाजवादी पार्टी की निगाहें मुस्लिमों पर भी टिकी रहती है, खासकर पिछड़े मुस्लिमों पर। जिन्हें सपा मुखिया रहे मुलायम सिंह ने कभी बखूबी अपने साथ जोड़ा था। मौजूदा चुनावों में सपा यादव और मुस्लिमों के सहारे एक बार फिर यूपी के रण में है।
बसपा
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बेस वोटर के हिसाब से बसपा को देश की सबसे मजबूत पार्टी माना जाता है, जिसका वोटबैंक हमेशा उसके साथ रहता है। बीते सभी चुनावों में बसपा ने बेशक अन्य पार्टियों को कुछ तवज्जो दी हो लेकिन ध्यान दलितों पर ही रहा। बसपा का चुनावी गणित इसी बुनियाद पर टिका रहता है कि दलितों के साथ साथ वह किस अन्य जाति को अपने पक्ष में मजबूती से जोड़ पाती है।
खास बात ये है कि दलितों में भी बसपा में सबसे ज्यादा तवज्जो जाटवों को मिलती हैं जिससे खुद बसपा सुप्रीमो मायावती आती हैं। जाटवों को ही बसपा का बेस वोटबैंक माना जाता है। हालांकि उसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि दलितों में सबसे ज्यादा प्रतिशत जाटवों का ही है।
कांग्रेस
यूं तो कांग्रेस को किसी जाति के साथ नहीं जोड़ा गया लेकिन इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि कभी मुस्लिम और दलित कांग्रेस का प्रमुख वोट बैंक हुआ करते थे। बसपा के उभार के बाद दलितों का कांग्रेस से मोहभंग हुआ तो मुस्लिम वोट बैंक को सपा ने तोड़ लिया। आज भी कांग्रेस अपने इस कोर वोटर को साधने की पूरी कोशिश कर रही है। यूपी में सपा से गठबंधन के बाद कांग्रेस ने भी काफी संख्या में मुस्लिमों को टिकट दिए हैं। हालांकि अब पार्टी दलितों और अगडों पर भी पूरा ध्यान दे रही है।
रालोद
पश्चिम यूपी में खासा दखल रखने वाले राष्ट्रीय लोकदल की सारी राजनीति जाटों पर ही टिकी है। यूं तो पिछडों में जाटों की आबादी मात्र दो फीसदी ही है लेकिन वेस्ट के 11 जिलों में इनका खासा दखल है। 50 से ज्यादा सीटों पर तो ये निर्णायक स्थिति में हैं। ऐसे में रालोद प्रमुख अजित सिंह भी उनका महत्व समझते हैं। मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जाटों का रालोद से मोहभंग हुआ तो रालोद की स्थिति दयनीय हो गई। लोकसभा चुनावों में अजित सिंह खुद अपनी सीट भी नहीं बचा सके। मौजूदा चुनावों में रालोद ने एक बार फिर जाटों की घेराबंदी की तैयारी कर ली है। पार्टी ने अभी तक जितने टिकट दिए हैं उनमें सबसे ज्यादा जाटों पर ध्यान दिया गया है।
अपना दल
अपना दल के संस्थापक रहे सोनेलाल पटेल ने कुर्मी पटेलों को जोड़ने के लिए नए दल की स्थापना की थी। पूर्वी और मध्य यूपी में कुर्मियों की आबादी सबसे ज्यादा है ऐसे में इस वोटबैंक को जोड़ने के लिए सोनेलाल पटेल ने अलग पार्टी का गठन कर कुर्मी पटेलों को अपने साथ जोड़ लिया, आज अपना दल के दो सांसद हैं और एक केंद्रीय मंत्री।
पीस पार्टी
पीस पार्टी की स्थापना डा. मोहम्मद अयूब ने की थी। पार्टी की स्थापना के दौरान इस बात का जोर शोर से प्रचार किया गया कि राज्य में यही अकेली पार्टी है जिसकी स्थापना मुस्लिम हितों के लिए की गई है। पार्टी ने अधिकतर टिकट भी मुस्लिमों को ही दिए। बीते विधानसभा चुनावों में पार्टी के तीन विधायक भी चुने गए। अब भी पार्टी का पूरा फोकस मुस्लिमों पर ही है।