केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में कैडर अधिकारी, शीर्ष पदों तक नहीं पहुंच पाते। सीआरपीएफ और बीएसएफ में तो हालात ऐसे हो गए हैं कि पहली पदोन्नति लेने में ही 15 साल का वक्त लग रहा है। आगे की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। कैडर अधिकारियों को संगठित सेवा का दर्जा मिले और दूसरे वित्तीय हित आदि को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में 'सीएपीएफ बनाम आईपीएस' की सुप्रीम बहस चल रही है। हालांकि अभी सर्वोच्च अदालत का निर्णय आना बाकी है। 27 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में सीएपीएफ के कैडर अधिकारियों और सरकारी पक्ष के बीच तार्किक बहस हुई। सीएपीएफ को कौन लीड करे, इस बाबत जो तर्क 1970 के दशक में तत्कालीन होम सेक्रेट्री, बीएसएफ व सीआरपीएफ डीजी द्वारा दिए गए थे, कुछ वैसी ही बातें अब सुप्रीम कोर्ट की बहस में सुनने को मिली हैं। सर्वोच्च न्यायालय में कहा गया कि जब सीएपीएफ में सेना के अफसरों की प्रतिनियुक्ति बंद हो गई तो अब आईपीएस प्रतिनियुक्ति पर भी रोक लगे। इन बलों की कार्यात्मक जरुरतें पूरी करके लिए अगर लीडरशिप चाहिए तो इन संस्थानों के अंदर ही उसे विकसित करें। बाहर से अफसरों को क्यों बुलाया जाए।
शीर्ष अदालत में अपील- सीएपीएफ में प्रतिनियुक्ति को धीरे धीरे खत्म किया जाए
सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान सीएपीएफ कैडर की तरफ से कहा गया कि इन बलों में प्रतिनियुक्ति को धीरे धीरे खत्म किया जाना चाहिए। इन बलों में पहले सैन्य अधिकारी भी प्रतिनियुक्ति पर आते थे, लेकिन बाद में उस पहल को बंद कर दिया गया। आईपीएस की प्रतिनियुक्ति को नहीं रोका जा सका। अब आईपीएस की प्रतिनियुक्ति बंद होनी चाहिए। वजह, आईपीएस के चलते कैडर अधिकारी, पदोन्नति में पिछड़ जाते हैं। उन्हें नेतृत्व का अवसर नहीं मिल पाता। कैडर अधिकारियों के नेतृत्व को दूसरे दर्जे का माना जाता है। यह कहना कि सीएपीएफ में अच्छी लीडरशिप की जरुरत है तो उसके लिए आईपीएस ला रहे हैं, यह ठीक नहीं है। 1970 के दशक में तत्कालीन होम सेक्रेट्री, बीएसएफ व सीआरपीएफ डीजी द्वारा कहा गया था कि इन बलों के अधिकारियों को ही नेतृत्व के लिए तैयार किया जाए। केंद्रीय सुरक्षा बलों में आईपीएस के लिए पद आरक्षित न हों। कैडर अधिकारी, पदोन्नति के जरिए आगे बढ़ते रहेंगे और टॉप तक पहुंच जाएंगे।
क्या कैडर अधिकारियों की पदोन्नति पर संकट? सुप्रीम कोर्ट ने संक्षेप में मांगे तर्क
सुप्रीम कोर्ट की बहस में कहा गया कि इन बलों में लगातार प्रतिनियुक्ति जारी है। वह प्रथा बंद नहीं हो पा रही है। अगर सीएपीएफ की कार्यात्मक जरुरतों के लिए प्रतिनियुक्ति पर लीडरशिप ला रहे हैं तो वह इन बलों के अंदर से भी ली जा सकती है। यहां काम करने वाले कैडर अधिकारी भी अच्छा नेतृत्व कर सकते हैं तो फिर बाहर से प्रतिनियुक्ति पर आईपीएस को क्यों लाया जाए। न्यायमूर्ति अभय एस ओका ने सुनवाई के बीच दिए अपने रिमार्क में कहा, इन बलों में प्रतिनियुक्ति को धीरे धीरे कम किया जाए। सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड 'एसएजी' में तो प्रतिनियुक्ति बंद हो। उस स्थिति में तो इन बलों के अधिकारी ही सीनियर हो जाते हैं। प्रतिनियुक्ति को तुरंत मत रोको, लेकिन एसएजी लेवल के बाद आईपीएस को न लाएं। इसे एक एक प्वाइंट पर रोकना होगा। इससे कैडर अधिकारियों की पदोन्नति के रास्ते बंद हो जाते हैं। न्यायमूर्ति अभय एस ओका ने दोनों पक्षों से कहा, इस केस के संदर्भ में जो कुछ भी कोर्ट में बोला गया है, उसकी तीन चार पेजों में समरी बनाकर एक सप्ताह के अंदर कोर्ट को दें।
सीएपीएफ में आर्मी से आने वालों की प्रतिनियुक्ति पर रोक
अपने रिमार्क में न्यायमूर्ति अभय एस ओका ने कहा, सरकार की तरफ से कहा गया है कि इस मामले पर जल्दी निर्णय लेंगे। सीएपीएफ में आर्मी से आने वालों की प्रतिनियुक्ति रोक दी गई है। बहस के दौरान सरकार की ओर से कहा गया कि इन बलों को कुछ अफसरों की इच्छा पर नहीं छोड़ा जा सकता है। इन अफसरों को खुश करने के लिए बल की एकरूपता को छोड़ दें, ऐसा नहीं हो सकता है। ऐसा कह कर हम आईपीएस का पक्ष नहीं ले रहे। वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने कैडर अधिकारियों की ओर से कहा, छठे केंद्रीय वेतन आयोग में भी लिखा है कि डीआईजी का पद सौ प्रतिशत पदोन्नति से भरा जाए, डेपूटेशन से नहीं। कैडर अधिकारी और आईपीएस की पदोन्नति में बड़ा अंतर आ जाता है। 2005 बैच का आईपीएस अब आईजी बन जाता है, जबकि कैडर अधिकारी मुश्किल से डीसी या टूआईसी तक पहुंच पाता है। इन अधिकारियों को मुट्ठीभर कहना ठीक नहीं है। यही लोग फील्ड में काम करते हैं। एक अफसर को अपनी पदोन्नति के लिए डेढ़ दो दशक का इंतजार करना पड़े, ऐसा क्यों।
2019 में अदालती लड़ाई जीती, अदालत का फैसला लागू नहीं होने पर दोबारा शुरू हुई लड़ाई
कैडर अधिकारियों का कहना है कि हमें जानबूझकर परेशान किया जा रहा है। अगर सीएपीएफ कैडर में जॉब की मांग है तो उसके पीछे वजह है। ये लोग कॉम्बेट, लॉ एंड आर्डर और दूसरे तरह की जॉब में पारंगत होते हैं। इसके बाद भी इन्हें ही संगठित कैडर नहीं मिल पा रहा। ये संस्थागत भेदभाव है। क्या इन बलों की कार्यात्मक जरुरत को आईपीएस ही पूरा कर सकते हैं, कैडर अफसर नहीं। ये सोचने वाली बात है कि दशकों में कैडर को लीड रोल क्यों नहीं दिया जा रहा। 2019 में अदालती लड़ाई जीत चुके कैडर अफसरों को दोबारा से अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। अदालत का फैसला लागू नहीं किया जा रहा। सीआरपीएफ के पहले महानिदेशक वीजी कनेत्कर ने कहा था, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में आईपीएस के लिए पद आरक्षित न हों। दूसरी तरफ, 1955 के फोर्स एक्ट में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। इतना ही नहीं, 1970 में तत्कालीन होम सेक्रेट्री लल्लन प्रसाद सिंह, जेएस, बीएसएफ व सीआरपीएफ के डीजी ने भी लिखा था कि केंद्रीय सुरक्षा बलों में आईपीएस के लिए पद आरक्षित न हों।
केंद्रीय बलों का नेतृत्व कौन करेगा, 1970 में ही साफ हो चुकी थी तस्वीर
इन बलों में कैडर अधिकारियों को ही नेतृत्व करने का मौका दिया जाए। ऐसे में वे पदोन्नति के जरिए इन बलों में आगे बढ़ते रहेंगे और टॉप तक पहुंच जाएंगे। पूर्व कैडर अधिकारियों का कहना है कि 1970 में यह बात साफ हो चुकी थी कि केंद्रीय बलों का नेतृत्व कौन करेगा।
केंद्रीय सुरक्षा बलों में आईपीएस के लिए पद आरक्षण को लेकर क्या है कानून
तत्कालीन होम सेक्रेट्री लल्लन प्रसाद सिंह, सीएपीएफ में आईपीएस के लिए पद आरक्षित करने के पक्ष में नहीं थे। केंद्रीय गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव, बीएसएफ व सीआरपीएफ के डीजी ने भी लिखा था कि केंद्रीय सुरक्षा बलों में आईपीएस के लिए पद आरक्षित न किया जाए। 1955 के एक्ट में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं था। उसमें कहा गया था कि इन बलों के कैडर अधिकारियों को ही नेतृत्व का मौका दिया जाए। वे आगे बढ़ेंगे और पदोन्नति के जरिए टॉप तक पहुंच जाएंगे। तब ये सलाह नहीं मानी गई और केंद्रीय सुरक्षा बलों में अधिकांश पद आईपीएस के लिए रिजर्व कर दिए गए।
1960 में पहला बैच ट्रेनिंग के लिए एनपीए में पहुंचा
पूर्व कैडर अधिकारियों के मुताबिक, 1959 में पहली बार आईपीएस अधिकारी, कमांडेंट बन कर केंद्रीय सुरक्षा बलों में आए थे। ये भी तब हुआ, जब आर्मी ने कहा कि हम अफसर नहीं देंगे। हमें अपनी जरूरतें पूरी करनी हैं। इसके बाद भारत सरकार ने निर्णय लिया कि इन बलों में अफसरों की भर्ती शुरू की जाए। डीएसपी के पद पर भर्ती प्रक्रिया पूरी होने के बाद 1960 में पहला बैच ट्रेनिंग के लिए एनपीए में पहुंचा। वहां पर आईपीएस के साथ कैडर अफसरों की ट्रेनिंग हुई। 1962 में लड़ाई छिड़ी तो इन बलों में इमरजेंसी कमीशंड ऑफिसर भेजे गए। लड़ाई खत्म होने के बाद वे भी वापस लौट गए। बाद के वर्षों में सीआरपीएफ और बीएसएफ ने खुद के चार सौ से अधिक अफसर तैयार कर लिए। डीजी बीएसएफ केएफ रुस्तम ने कहा था, केंद्रीय सुरक्षा बलों में आईपीएस अफसर के लिए पदों का आरक्षण न किया जाए। इसका 1955 के फोर्स एक्ट में भी प्रावधान नहीं है। हम अपने अफसर तैयार करेंगे, जो कुछ समय बाद फोर्स का नेतृत्व करेंगे। इसके बाद 1968 में सीआरपीएफ के पहले डीजी वीजी कनेत्कर ने कहा था, मुझे आईपीएस अधिकारियों की जरूरत ही नहीं है।
1970 में गृह मंत्रालय के डिप्टी डायरेक्टर ने दिए अहम दिशानिर्देश
तत्कालीन गृह सचिव एलपी सिंह ने भी दोनों बलों के डीजी की बात को सही माना। सिंह ने कहा, शुरू में बीस फीसदी अफसर आर्मी व आईपीएस कैडर से ले लो। थोड़े समय बाद डीआईजी, कमांडेंट और सहायक कमांडेंट के पद कैडर को सौंप दिए जाएं, लेकिन आईपीएस के लिए वैधानिक आरक्षण न किया जाए। 1970 में गृह मंत्रालय के डिप्टी डायरेक्टर 'संगठन' जेसी पांडे ने लिखा, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में आईपीएस के लिए पद फिक्स मत करो। इससे कैडर अफसरों के मौके प्रभावित होंगे। डीजी सीआरपीएफ ने कहा, अब केवल वर्किंग फार्मूला ले लो, जो बाद में नई व्यवस्था के साथ परिवर्तित हो जाएगा।
1997 में पहली बार कैडर अफसरों को आईजी के 33 फीसदी पद मिले
आईपीएस, आर्मी और स्टेट पुलिस, इन तीनों के अफसरों के लिए सुरक्षा बलों में डीआईजी, कमांडेंट और एसी के पद पर आरक्षण न हो। कैडर के पूर्व अफसरों के मुताबिक, उसके बाद फाइलें बदल गई। उसी साल यह आर्डर निकाला गया कि केंद्रीय बलों में डीजी के 100 फीसदी पद, 100 फीसदी आईजी, 75 फीसदी डीआईजी, 40 फीसदी सीओ और एसी के 10 फीसदी पद आईपीएस को दिए जाएं। समय के साथ इस कोटे में बदलाव होते रहे। 1997 में पहली बार कैडर अफसरों को आईजी के 33 फीसदी पद मिले। 2008 में आईजी के 50 फीसदी और डीआईजी के 80 फीसदी कैडर को मिले।
आईपीएस की प्रतिनियुक्ति जारी रखने के खिलाफ अदालती संघर्ष
कैडर अधिकारियों ने बताया, आईपीएस एसोसिएशन एक बार फिर कोर्ट में जाकर यह मांग कर रही है कि सीएपीएफ को आरपीएफ के समान ओजीएएस दिया जाए, जहां प्रतिनियुक्ति प्रभावित न हो। सीएपीएफ कैडर अधिकारी, आईपीएस की प्रतिनियुक्ति जारी रखने के खिलाफ अदालत में लड़ रहे हैं। उनका आरोप है कि आईपीएस ने सीएपीएफ को एक नागरिक संगठन में बदल दिया है। वे पहले 'संघ के सशस्त्र बल' के रूप में गठित किए गए थे। 1979 में उन्हें अर्धसैनिक बल में स्थानांतरित कर दिया। 2011 में सीएपीएफ (केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल) बन गए। उन्होंने सहायक कमांडेंट की सीधी प्रवेश भर्ती को 33% तक कम करने और सीएपीएफ को ओजीएएस प्राप्त करने के अयोग्य बनाने के लिए पदोन्नति और विभागीय परीक्षा कोटा बढ़ाने की भी कोशिश की।
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