केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में जवानों और अफसरों को अदालतों में अपनी 'पहचान-पदोन्नति-हित' की लड़ाई लड़नी पड़ रही है। लगभग 11 लाख की नफरी वाले इन बलों ने 'पुरानी पेंशन बहाली' और कैडर अधिकारियों की पदोन्नति, संगठित सेवा का दर्जा (ओजीएएस), नए सर्विस रूल्स एवं वित्तीय हितों को लेकर अदालती लड़ाई जीती है, लेकिन सरकार नहीं मानी। दिल्ली हाईकोर्ट ने इन बलों में ओपीएस लागू करने का फैसला सुनाया तो उसके खिलाफ केंद्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट में चली गई। सीएपीएफ कैडर अधिकारियों की पदोन्नति, संगठित सेवा का दर्जा, नए सर्विस रूल्स को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया था, उस पर केंद्र सरकार रिव्यू पेटिशन में चली गई है। इनके अलावा सीएपीएफ में ऐसे ही कई दूसरे मुद्दे भी हैं, जो अदालत तक पहुंचे हैं। 'पहचान एवं पदोन्नति' के मामले, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। सीएपीएफ में कई मामले भी रहे हैं, जो कोर्ट की अवमानना के लिए दायर किए गए हैं।
कमांडरों को इसलिए काटने पड़े अदालतों के चक्कर
सीआरपीएफ को अलविदा बोल चुके सहायक कमांडेंट सर्वेश त्रिपाठी के मुताबिक, सीएपीएफ में सीधे नियुक्त राजपत्रित अधिकारियों को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। बात केवल पदोन्नति या दूसरे आर्थिक फायदों की नहीं है। यहां तो 'पहचान' के लिए लड़ना पड़ रहा है। इन बलों में मेडिकल कैडर, मिनिस्ट्रियल और यहां तक की वेटनरी डॉक्टर को भी समय पर पदोन्नति मिल जाती है, मगर एग्जीक्यूटिव कैडर के साथ हर मामले में भेदभाव होता है। सीआरपीएफ के एमटेक, बीटेक, आईआईटी व दूसरी डिग्री हासिल किए अधिकारियों को तय समय पर पदोन्नति से वंचित रखा जा रहा है। पॉलिसी के मोर्चे पर सरकार के निर्णय ठीक नहीं है। 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने संगठित सेवा 'ओजीएएस' देने का आदेश दिया। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने यह घोषणा करने के लिए बाकायदा प्रेसवार्ता की थी। केंद्रीय कैबिनेट ने नोटिफाई किया, लेकिन उसे लागू नहीं किया गया। जब ये फैसला लागू नहीं हुआ तो नए सर्विस रुल भी नहीं बने। ऐसे में एग्जीक्यूटिव कैडर को समयबद्ध पदोन्नति कैसे मिल सकती है।
दोबारा जीते तो सरकार रिव्यू पिटीशन में चली गई
कैडर अफसरों ने दोबारा से सर्वोच्च अदालत में पदोन्नति की लड़ाई लड़ी और जीती। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में कैडर अधिकारियों की पदोन्नति, संगठित सेवा का दर्जा, नए सर्विस रूल्स एवं वित्तीय हितों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मई 2025 को एक अहम फैसला सुनाया था, उस पर केंद्र सरकार गत सप्ताह रिव्यू पेटिशन में चली गई है। इसे सीएपीएफ के 13000 कैडर अधिकारियों के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। केंद्र सरकार के इस कदम से परेशान होकर सीएपीएफ के एक अधिकारी ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को खुला पत्र लिखा। इसमें सीएपीएफ अधिकारियों के लिए न्याय और सम्मान की गुहार लगाई गई है। पत्र में कहा गया है कि वे गंभीर अन्याय का सामना कर रहे हैं। सरकार ने हमें संगठित ग्रुप ए सेवा यानी 'ओजीएएस' का दर्जा देने से इनकार कर दिया है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनाया ओपीएस देने का फैसला
सीएपीएफ के 11 लाख जवानों/अफसरों ने 2023 में 'पुरानी पेंशन' बहाली के लिए दिल्ली हाईकोर्ट से अपने हक की लड़ाई जीती थी। इसके बाद केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को लागू नहीं किया। इस मामले में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से स्टे ले लिया। कॉन्फेडरेसन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेस मार्टियरस वेलफेयर एसोसिएशन के महासचिव रणबीर सिंह कहते हैं, जब केंद्र सरकार ने स्टे लिया, तभी यह बात साफ हो गई थी कि सरकार सीएपीएफ को पुरानी पेंशन के दायरे में नहीं लाना चाहती। दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को 'भारत संघ के सशस्त्र बल' माना था। दूसरी तरफ केंद्र सरकार, सीएपीएफ को सिविलियन फोर्स बताती है। अदालत ने इन बलों में लागू 'एनपीएस' को स्ट्राइक डाउन करने की बात कही। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था, चाहे कोई आज इन बलों में भर्ती हुआ हो, पहले कभी भर्ती हुआ हो या आने वाले समय में भर्ती होगा, सभी जवान और अधिकारी, पुरानी पेंशन स्कीम के दायरे में आएंगे। मौजूदा समय में भी यह मामला सर्वोच्च अदालत के समक्ष लंबित है।
सीएपीएफ को ओपीएस देने की सरकार की इच्छा नहीं
सीआरपीएफ के पूर्व एडीजी एवं एसोसिएशन के चेयरमैन एचआर सिंह बताते हैं, देखिये दिल्ली हाईकोर्ट का एक ऐतिहासिक फैसला था। अदालत ने स्पष्ट तौर पर कहा था कि 'सीएपीएफ', 'भारत संघ के सशस्त्र बल' हैं। इसका मतलब, सीएपीएफ भी आर्मी/नेवी/वायु सेना की तरह सशस्त्र बल हैं। इन्हें भी पुरानी पेंशन मिलनी चाहिए। जैसे ओपीएस के फैसले को पलटने का प्रयास हो रहा है, वैसा ही अब कैडर अधिकारियों के मामले में प्रतीत हो रहा है। केंद्र सरकार, कैडर अधिकारियों के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटिशन में चली गई है। मतलब साफ है कि वर्षों से पदोन्नति एवं वित्तीय फायदों से वंचित कैडर अफसरों को सरकार, राहत नहीं देना चाहती।
'पहचान' के लिए अदालत में जाना पड़ा
सर्वेश त्रिपाठी के अनुसार, हर सर्विस का एक नाम होता है। संबंधित कैडर अधिकारी उससे पहचाने जाते हैं। हैरानी की बात तो ये है कि सीआरपीएफ के युवा अधिकारियों को इसके लिए भी अदालत जाना पड़ा। चूंकि ये क्लास वन अधिकारी हैं, इसलिए अपनी सेवा का एक नाम चाहते हैं। आखिर ये किस सेवा में हैं, यह पता होना चाहिए। जैसे अखिल भारतीय सेवा में रेवेन्यू सर्विस, इंजीनियरिंग सर्विस या रेलवे की कई सेवाएं, सीआरपीएफ का भी एक ऐसा ही नाम चाहते थे। इसके लिए दिल्ली हाईकोर्ट में जाना पड़ा। आरपीएफ और सीआरपीएफ का एक जैसा ही केस था। आरपीएफ को आईआरपीएफएस नाम दे दिया गया। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सीआरपीएफ को नाम नहीं दिया। पुरानी पेंशन व्यवस्था भी अब खत्म हो चुकी है। करियर प्रोग्रेसन की स्थिति बहुत खराब है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी संगठित सेवा का दर्जा न मिलना और न ही एनएफएफयू को सही तरीके से लागू करना, इन सभी में सरकारी की मनमानी रही है। बल में साथ काम कर रहे मेडिकल कैडर और मंत्रालयिक शाखा के अधिकारियो को तुलनात्मक रूप से तेज प्रमोशन मिल रहा है। हर छोटे देय भत्ते जैसे एचआरए, टीए आदि के लिए न्यायालय की शरण में जाना पड़ रहा है।
सीएपीएफ के इन अफसरों ने उठाई हक की आवाज
सेवा का नाम, बैच का निर्धारण, सरकार ने इस बाबत कोई निर्णय नहीं लिया। सर्वेश त्रिपाठी बनाम भारत सरकार, ये मामला अदालत में चल रहा है। स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एचआरए के लिए भी अधिकारियों को कोर्ट की शरण लेनी पड़ी। गौरव सिंह बनाम भारत सरकार, यह केस अदालत में पहुंचा। नॉन फंक्शनल सेलेक्शन ग्रेड (एनएफएसजी) के लिए करुणा निधान बनाम भारत सरकार, यह अवमानना का केस दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष दायर हुआ था। गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन (एनएफएफयू) के केस में अदालत की अवमानना, यह केस भी सुप्रीम कोर्ट में चला है। ओजीएएस यानी संगठित सेवा का मामला भी सर्वोच्च अदालत में है। सीआरपीएफ में डॉक्टरों को तेज पदोन्नति और एग्जीक्युटिव अधिकारियों को कछुआ गति से आगे बढ़ाना, ये केस भी अदालत में पहुंचा है। कैडर अफसरों का कहना है कि डॉक्टरों को टाइम बाउंड पदोन्नति मिल रही है। वे एक समय के बाद मनमर्जी से रैंक लगा लेते हैं। रणजीत सिंह बनाम भारत सरकार, ये केस अदालत में रहा है। कैडर अधिकारियों का कहना है कि मिनिस्ट्रयल स्टाफ को क्लास वन अधिकारी बना रहे हैं वो भी डीओपीटी व यूपीएससी की सलाह लिए बिना। कासिफ बनाम भारत सरकार, ये केस भी अदालत के समक्ष पहुंचा था। यहां तक कि सीएपीएफ में वेटनरी डॉक्टर को भी टाइम बाउंड पदोन्नति दी जा रही है।
सीएपीएफ के इंस्पेक्टर भी पहुंचे हैं अदालत
सीएपीएफ के इंस्पेक्टरों का कहना है कि केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को लेकर सरकार दोहरी नीति अपना रही है। पहले खुद कहती है कि ये बल तो 'भारत संघ के सशस्त्र बल' हैं। जब दिल्ली हाईकोर्ट इसी आधार पर इन बलों को ओपीएस में शामिल करने का फैसला देता है तो केंद्र सरकार उसे नहीं मानती। सरकार, उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चली जाती है। अब इसी तरह के दूसरे केस सामने आ रहे हैं। वित्त मंत्रालय के 2008 में जारी एक कार्यालय ज्ञापन 'ओएम' में कहा गया था कि जिन कर्मियों का 48 सौ रुपये का 'ग्रेड पे' है और उन्होंने इसमें चार साल की नौकरी कर ली है तो उनका ग्रेड पे 54 सौ रुपये हो जाएगा। यह बात केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में स्वत: ही लागू नहीं होती। इसे लागू कराने के लिए अदालतों का सहारा लेना पड़ता है। आईटीबीपी के इंस्पेक्टर सुशील कुमार ने दिल्ली कोर्ट से यह लड़ाई जीती थी। उसके बाद बीएसएफ के लगभग सवा सौ इंस्पेक्टरों ने अदालत से अपने हक में आदेश जारी कराया। दिल्ली हाईकोर्ट ने सीमा सुरक्षा बल के इंस्पेक्टरों को 54 सौ रुपये वाला 'ग्रेड पे' देने का आदेश दिया। अब सीआरपीएफ के इंस्पेक्टरों ने भी उक्त फायदे के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया है।