केंद्रीय अर्धसैनिक बल सीएपीएफ में पदोन्नति-अवरोध केवल राजपत्रित अधिकारियों की समस्या नहीं है। अगर इसकी जड़ तक पहुंचेंगे तो मालूम पड़ता है कि यह समस्या हवलदार और सिपाही तक पहुंचती है। तरुण कुमार बंजारी, जो यूपीएससी सीपीएफ 2004 बैच के सेवानिवृत्त राजपत्रित अधिकारी हैं, उनका कहना है कि केंद्रीय बलों में एक आईपीएस प्रतिनियुक्ति 15 से ज्यादा पदोन्नतियों को रोक देती है। प्रस्तावित सीएपीएफ बिल में डीआईजी स्तर पर प्रतिनियुक्ति हटाने (0% करने) से पिरामिड के मध्य में कुछ राहत मिलती है, लेकिन आईजी स्तर पर कानूनी जमाव यह सुनिश्चित करता है कि शीर्ष पर ठहराव जारी रहे। वहां से श्रृंखला नीचे की ओर बहती रहे।
महत्त्वपूर्ण सच से चूक जाता है यह दृष्टिकोण
तरुण कुमार बंजारी ने आईटीबीपी और भारतीय नौसेना में 27 वर्षों तक सेवा की है। महू स्थित आर्मी वॉर कॉलेज से सीनियर कमांड कोर्स के स्नातक, तरुण ने छत्तीसगढ़ में नक्सल-विरोधी अभियानों, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश में भारत-चीन सीमा सुरक्षा और देश भर में चुनाव संबंधी कार्यों में अपनी सेवाएं दी हैं। तरुण कुमार के मुताबिक, जब भी केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक, 2026 के आलोचक अवरुद्ध पदोन्नतियों की बात करते हैं, तो बहस लगभग हमेशा राजपत्रित अधिकारी वर्ग पर केंद्रित रहती है। यह दृष्टिकोण उस सबसे महत्त्वपूर्ण एक सच से चूक जाता है, जो आईपीएस प्रतिनियुक्ति एक अर्धसैनिक बल के साथ करती है। क्षति वहीं नहीं ठहरती, वह रैंक दर रैंक नीचे उतरती है। आखिर में वह सिपाही तक पहुंचती है, जो भारत की सीमाओं की निगरानी करता है।
मौजूदा व्यवस्था बनाम सीएपीएफ विधेयक 2026
तरुण कुमार के अनुसार, इस श्रृंखला-प्रभाव को समझने से पहले सही तथ्यात्मक आधार स्थापित करना आवश्यक है। सातवें वेतन आयोग पर आधारित मौजूदा कार्यकारी व्यवस्था के अनुसार:
डीआईजी स्तर (मौजूदा): 20% पद आईपीएस के लिए आरक्षित
आईजी स्तर (मौजूदा): 50% पद आईपीएस के लिए आरक्षित
एडीजी स्तर (मौजूदा): 75% पद आईपीएस के लिए आरक्षित
डीजी स्तर (मौजूदा): 100% पद आईपीएस के लिए आरक्षित
सीएपीएफ विधेयक 2026 में प्रस्तावित:
डीआईजी स्तर पर आईपीएस प्रतिनियुक्ति हटाई गई
आईजी 50 प्रतिशत, अपरिवर्तित, कानून में स्थायी रूप से दर्ज
एडीजी स्तर पर 67 प्रतिशत, 75% से मामूली कमी
स्पेशल डीजी/डीजी 100% अपरिवर्तित
ये है विधेयक का बड़ा दोष
डीआईजी स्तर पर आईपीएस प्रतिनियुक्ति हटाना विधेयक की एकमात्र वास्तविक रियायत है, किंतु विधेयक का घातक दोष यह है कि यह आईजी स्तर, जहां से न्यायालय ने हटने का आदेश दिया था, पर 50% आरक्षण को कानून में स्थायी रूप से लॉक कर देता है। पहले यह एक कार्यकारी आदेश था, जिसे बदला जा सकता था। विधेयक पास होने पर यह एक स्थायी कानूनी प्रावधान बन जाएगा, जिसे केवल दूसरे संसदीय अधिनियम से ही बदला जा सकेगा। बतौर तरुण कुमार, यह विधेयक डीआईजी स्तर पर रियायत देता है, लेकिन आईजी स्तर को 50% पर कानून में स्थायी रूप से जकड़ देता है। न्यायालय ने ठीक इसके विपरीत आदेश दिया था।
पदोन्नति की सीढ़ी: सीएपीएफ रैंक कैसे आगे बढ़ती है
सीएपीएफ में पदोन्नतियां पूर्णतः रिक्ति-आधारित हैं। आईपीएस के विपरित, जहां राज्य संवर्ग में कुछ लचीलापन होता है, सीएपीएफ में ऊपर का पद खाली होने पर ही अगला अधिकारी आगे बढ़ सकता है।
- आईजी: फ्रंटियर की कमान
- डीआईजी: सेक्टर की कमान
- कमांडेंट: बटालियन की कमान
- टूआईसी: बटालियन का द्वितीय-कमांडेंट
- डीसी: स्टाफ ऑफिसर
- एसी: कम्पनी कमांडर
- निरीक्षक: प्लाटून कमाण्डर
- उप निरीक्षक: प्लाटून टूआईसी
- एएसआई: सेक्शन कमाण्डर
- हवलदार: सेक्शन टूआईसी
- कांस्टेबल: जमीनी तैनाती
ये हैं वो अड़चनें
बतौर तरुण कुमार, यहां पर प्रत्येक स्तर एक अड़चन है। जब शीर्ष पर कोई पद बाहरी अधिकारी द्वारा भर दिया जाता है, तो नीचे की हर पायदान प्रभावी रूप से बाधित हो जाती है। जो आईजी बन सकता था, वह डीआईजी तक ही पहुंच पाता है। जिसे डीआईजी बनना था, उसे कमांडेंट तक ही संतोष करना पड़ता है। यह श्रृंखला उस सिपाही तक पहुंचती है, जो हेड कांस्टेबल नहीं बन पाता। वजह, क्योंकि उसके ऊपर वाले भी नहीं हिल पाते। जब कोई ग्रुप-ए से पदोन्नत होता है, तो एक श्रृंखला-प्रतिक्रिया होती है। यहां तक कि सिपाही भी रैंक में ऊपर चले जाते हैं। यह एक सीढ़ी प्रणाली है।
दो आईपीएस आईजी, रोकते हैं इतनी पदोन्नति
आईजी स्तर पर एक एकल आईपीएस प्रतिनियुक्ति का पद पूरे रैंक ढांचे में एक श्रृंखला को अवरुद्ध करता है। एक आईपीएस आईजी, एक सीएपीएफ डीआईजी को रोकता है। वह डीआईजी एक कमांडेंट को रोकता है। सीओ एक टूआईसी को रोकता है।
- 2 × आईजी आईपीएस: 2 सीएपीएफ अधिकारी आईजी नहीं बन पाते
- 2 × डीआईजी पद अवरुद्ध: 2 कैडर डीआईजी, आईजी नहीं बन पाते
- 2 × कमांडेंट पद अवरुद्ध: 2 वरिष्ठ कमांडेंट स्तर पर रुके रहते हैं
- 2 × 2IC पद अवरुद्ध: 2 अधिकारी कमांडेंट नहीं बन पाते
- 2 × डिप्टी कमांडेंट पद अवरुद्ध: 2 डीसी आगे नहीं बढ़ पाते
- 2 × एसी पद अवरुद्ध: 2 कम्पनी कमांडर आगे नहीं बढ़ पाते
- 1 × निरीक्षक पद अवरुद्ध: राजपत्रित अधिकारी नहीं बन पाते
- 1 × उप निरीक्षक पद अवरुद्ध: कनिष्ठ नेतृत्व स्तर जमा हुआ
- 1 × एएसआई पद अवरुद्ध: निरीक्षक संक्रमण पर सीढ़ी जाम
- 1 × हवलदार पद अवरुद्ध: वरिष्ठ फील्ड नेता आगे नहीं बढ़ता
- 1 × कांस्टेबल पद अवरुद्ध: प्रवेश-स्तर का कार्मिक ऊपर नहीं उठेगा
कुल दो आईजी रिक्तियां 10 रैंकों में 15 से अधिक अवरुद्ध पदोन्नतियों की श्रृंखला बनाती हैं। अब इसे सीएपीएफ विधेयक 2026 के वास्तविक आंकड़ों पर लागू करें। यह विधेयक, पांचों सीएपीएफ में सभी आईजी पदों का 50 प्रतिशत, आईपीएस अधिकारियों के लिए वैधानिक रूप से आरक्षित करता है। प्रत्येक सीएपीएफ में आईजी के अनेक पद हैं। श्रृंखला प्रभाव सैकड़ों अवरुद्ध पदोन्नतियों तक फैल जाता है। डीआईजी स्तर पर प्रतिनियुक्ति हटाने (0% करने) से पिरामिड के मध्य में कुछ राहत मिलती है, लेकिन आईजी स्तर पर कानूनी जमाव यह सुनिश्चित करता है कि शीर्ष पर ठहराव जारी रहे, और वहां से श्रृंखला नीचे की ओर बहती रहे।
वे आंकड़े जो राज्यसभा में रखे जाने चाहिए।
- सीआरपीएफ या बीएसएफ में 2010 में भर्ती एक सहायक कमांडेंट को 2026 में भी उप कमांडेंट की पहली पदोन्नति नहीं मिली। दुर्गम इलाकों में 16 वर्षों की सेवा के बावजूद एक ही पद पर काम करने को मजबूर।
- 2012 बैच का एक आईपीएस, 14 वर्ष की सेवा में सीएपीएफ में सीधे डीआईजी रैंक पर प्रतिनियुक्त होता है। सैकड़ों कैडर अफसर क्षेत्रीय अनुभव के बावजूद पीछे छूट जाते हैं।
- आईपीएस में एक अधिकारी लगभग 13 वर्ष में डीआईजी और 18 वर्ष में आईजी बनता है। कैडर अधिकारी को उन्हीं स्तरों तक पहुंचने में 31 से 33 वर्ष लग सकते हैं।
- बीएसएफ के सभी चार स्वीकृत एडीजी पद 1995-97 बैच के आईपीएस अधिकारियों के पास हैं। बीएसएफ में सबसे वरिष्ठ कैडर अधिकारी, 1987 बैच का, अभी भी आईजी स्तर पर है। 34 अधिकारियों के एक बैच में केवल दो ही कभी एडीजी स्तर तक पहुंच पाएं।
मनोबल और आर्थिक सुरक्षा प्रभावित
तरुण कुमार बंजारी के मुताबिक, जब शीर्ष पर पदोन्नति पाइपलाइन अवरुद्ध होती है, तो परिणामी ठहराव नीचे की ओर दबाव बनाता है। गैर-राजपत्रित अधिकारी और अन्य रैंक आगे नहीं बढ़ सकते, क्योंकि उनके ऊपर के पद उन अधिकारियों से भरे हैं, जो खुद रुके हुए हैं। वह हेड कांस्टेबल जो पांच साल पहले एएसआई बन जाता, वह कांस्टेबल, जो हेड कांस्टेबल बन जाता, ये पुरुष और महिलाएं, राष्ट्रीय बहस में अदृश्य हैं, लेकिन उनका मनोबल और उनके परिवारों की आर्थिक सुरक्षा सीधे प्रभावित है।
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