केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (सीएपीएफ) के हितों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त टिप्पणी कर रहा है। दो सितंबर को सर्वोच्च अदालत ने कहा, सीएपीएफ अफसर देश की सीमाओं पर सर्वोच्च बलिदान दे रहे हैं। उन्हें अलग नहीं माना जा सकता। सीएपीएफ में नेतृत्व करने के लिए सक्षम अधिकारी नहीं हैं, यह मानना गलत है। बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद कहते हैं, अब क्या ही बचा है। सुप्रीम कोर्ट ने तो खुद ही नौकरशाहों की 'लॉबी' के बारे में भी टिप्पणी कर दी है। मौजूदा हालात में सीएपीएफ कैडर अफसरों के हितों को लेकर न्यायपालिका और सरकार के मध्य टकराव की आशंका बन रही है।
कैडर अफसरों की पदोन्नति एवं दूसरे हित प्रभावित
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सीएपीएफ अफसर देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं, सर्वोच्च बलिदान दे रहे हैं, उनके पास 30 साल का अनुभव है, उन्हें अलग नहीं माना जा सकता। सर्वोच्च अदालत ने सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से यह टिप्पणी भी की है कि इस मामले में एक मजबूत लॉबी सक्रिय है। इसके चलते सीएपीएफ कैडर में योग्य अधिकारियों की पदोन्नति एवं दूसरे हित प्रभावित हो रहे हैं। सर्वोच्च अदालत ने अब इस मामले की निगरानी खुद करने का संकेत दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने 23 मई 2025 को जो फैसला दिया था, उसे लागू करने के लिए सरकार ने अभी तक क्या किया है। इस बाबत केंद्रीय गृह सचिव से दो सप्ताह में जवाब मांगा गया है। दूसरी ओर कैडर अफसरों द्वारा 'सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026' को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
कैडर अफसरों को नहीं मिल रही राहत
पूर्व एडीजी एसके सूद के मुताबिक, कैडर अफसरों के पास कार्य करने की क्षमता और लंबा अनुभव है, लेकिन पॉलिसी लेवल पर निर्णय लेने में इनका इस्तेमाल बहुत कम है, जबकि बॉर्डर या इंटरनल सिक्योरिटी में इनका बड़ा योगदान है। अदालती लड़ाई जीतने के बाद भी कैडर अफसरों को कोई राहत नहीं दी जा रही। 2015 में जब दिल्ली हाईकोर्ट ने कैडर अफसरों के हक में फैसला दिया तो सरकार उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चली गई। 2019 में सरकार की एसएलपी डिसमिस हो गई, लेकिन फिर भी ओजीएएस/एनएफएफयू जैसे मुद्दे अनसुलझे रहे। सीआरपीएफ और बीएसएफ में तो 2016 के बाद से कैडर रिव्यू ही नहीं हुआ है। कैडर अफसरों ने दोबारा से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 23 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने कैडर अफसरों के हित में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। उसे समाप्त कराने के लिए सरकार ने हर संभव कोशिश की। अदालत में कुछ नहीं हुआ तो केंद्र सरकार ने सर्वोच्च अदालत के फैसले के खिलाफ संसद में 'सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026 पास करा लिया। अब अवमानना मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की खिंचाई की है।
इसलिए बन रही टकराव की आशंका
बतौर सूद, सर्वोच्च न्यायपालिका, कैडर अफसरों के हित में फैसले दे रही है, लेकिन सरकार उन्हें लागू नहीं कर रही। ऐसे में अब टकराव की आशंका बन रही है। लिहाजा आईपीएस 'लॉबी' मजबूत है और सरकार में पूरा दखल रखती है तो कैडर अफसरों का मामला सुलझ नहीं पा रहा। आईपीएस लॉबी के चलते ही सरकार 'सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) बिल, 2026 लेकर आई थी। अब अवमानना केस की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने बहुत कुछ स्पष्ट कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को रद्द कराने के लिए सरकार हर बार एक्ट में संशोधन नहीं करेगी। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में नए सीएपीएफ एक्ट को लेकर शपथ पत्र में कुछ नहीं कहा है। सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि सीएपीएफ में 'एसएजी' स्तर तक आईपीएस प्रतिनियुक्ति को दो वर्ष में कम किया जाए। इस फैसले के विपरित सीएपीएफ में आईपीएस नियुक्त किए जाने की संख्या में तेजी आ गई। छह माह में कैडर रिव्यू, सेवा एवं भर्ती नियमों में बदलाव, इस बाबत भी कोई प्रगति नहीं हुई।
सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका लगाई गई
नतीजा, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के कैडर अफसरों की तरफ से छह दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका लगाई गई है। 23 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन, कैडर समीक्षा और आईपीएस प्रतिनियुक्ति को कम करने के लिए भर्ती नियमों के पुनर्गठन व संशोधन की मांग वाली कई याचिकाओं पर एक अहम फैसला सुनाया था। सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि देश की सीमाओं पर सुरक्षा बनाए रखने के साथ-साथ आंतरिक सुरक्षा कर्तव्यों के निर्वहन के लिए सीएपीएफ की भूमिका महत्वपूर्ण है। केंद्रीय गृह मंत्रालय को छह माह के भीतर इस फैसले का पालन करना था। इस अवधि के दौरान केंद्र सरकार, रिव्यू पिटीशन में चली गई। 28 अक्तूबर को रिव्यू पिटीशन को डिसमिस कर दिया गया। नए सीएपीएफ एक्ट में डीआईजी के पद पर आईपीएस प्रतिनियुक्ति का कोई भी कोटा तय नहीं है। इसके बावजूद पिछले समय में अनेक आईपीएस ने सीएपीएफ में डीआईजी के पद पर ज्वाइन किया है। नए एक्ट में आईपीएस आईजी के लिए 50 प्रतिशत पद, एडीजी के 67 प्रतिशत पद और एसडीजी व डीजी के सौ फीसदी पद आईपीएस के लिए रिजर्व किए गए हैं।
टकराव की स्थिति में 'लॉबी' को पीछे हटना होगा
सूद कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक तरफ कैडर अफसरों के हित में फैसले दिए जा रहे हैं तो दूसरी ओर सरकार 'लॉबी' के दबाव में उन्हें लागू नहीं कर रही। ऐसे में टकराव संभव है। सरकार इस बार कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। लॉबी के दबाव में सरकार ने पहले ही नया एक्ट पास करा दिया, जिसका बड़े पैमाने पर विपक्षी दलों और कैडर अफसरों ने विरोध किया था। अब गृह सचिव ने सर्वोच्च अदालत में कहा है कि कैडर रिव्यू पर तेजी से काम हो रहा है। कैडर रिव्यू की समीक्षा कर ली गई है। उस पर आतंरिक वित्तीय डिवीजन भी राजी हो गई है। गृह मंत्री की सहमति से उसे डीओपीटी की मंजूरी के लिए भेज दिया गया है। आने वाले समय में टकराव की स्थिति न हो, इसके लिए 'लॉबी' को पीछे हटना पड़ेगा।
अपने डोमेन में विशेषज्ञता अर्जित कर ली
पूर्व कैडर अफसरों का कहना है कि सीएपीएफ अधिकारियों के नेतृत्व में अर्धसैनिक बलों ने राष्ट्र की सुरक्षा तंत्र में अपनी विशिष्ट और निर्णायक भूमिका के साथ एक लंबी यात्रा की है। सीएपीएफ अफसरों ने अपने अपने डोमेन में विशेषज्ञता अर्जित कर ली है। इन अधिकारियों ने कंपनी कमांडर से लेकर कमांड के उच्च पदों तक, समय-समय पर अनुकरणीय नेतृत्व, व्यावसायिकता और परिचालन दक्षता का प्रदर्शन किया है। इतिहास, सैकड़ों सीएपीएफ अधिकारियों द्वारा दिए गए सर्वोच्च बलिदानों का साक्षी है। इतना होने पर भी पुलिस अफसरों द्वारा इन्हें कमांड किया जाता है।