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'चुनाव में उम्मीदवारों को अपनी और आश्रितों की आय का स्रोत बताना चाहिए'

Thu, 05 Jan 2017 12:02 AM IST
राजीव सिन्हा/ अमर उजाला, नई दिल्ली 
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चुनाव में स्वच्छता व पारदर्शिता लाने के मकसद से चुनाव आयोग इस पक्ष में है कि उम्मीदवारों को आमदनी का स्रोत बताना भी अनिवार्य किया जाना चाहिए। चुनाव लड़ने वाले उम्मीदारों को नामांकन करते वक्त न केवल अपना बल्कि पति/पत्नी और सभी आश्रितों की आमदनी का स्रोत बताना अनिवार्य किया जाना चाहिए। आयोग ने बुधवार को यह जानकारी सुप्रीम कोर्ट को दी है। 
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सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में आयोग ने कहा है कि वर्तमान व्यवस्था के तहत उम्मीदवारों को आमदनी का स्रोत बताना जरूरी नहीं होता है। इतना ही नहीं उम्मीदवारों केलिए यह भी बताना अनिवार्य नहीं होता है कि पिछले चुनाव केमुकाबले उसकी आमदनी में बढ़ोतरी का स्रोत क्या था। वर्तमान व्यवस्था के तहत मतदाताओं को उम्मीदवार और उनके आश्रितों के पैन के बारे में ही जानकारी रहती है। आयोग का मानना है कि मतदाताओं को ये सभी जानकारी मिलनी चाहिए। 

आयोग ने बताया कि कानून मंत्रालय को पत्र लिखकर फार्म-26 में संशोधन करने का आग्रह किया गया है। आयोग ने कहा कि फार्म-26 में उम्मीदवारों के साथ-साथ पति/पत्नी और आश्रितों की संपत्तियों के ब्योरे को शामिल किया जाना चाहिए और उनकी आमदनी का स्रोत भी। आयोग का मानना है कि चुनाव में मनी पावर के इस्तेमाल जग-जाहिर है। 
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'चुनाव में मनी पावर के इस्तेमाल पर लगे लगाम'

- फोटो : demo pic
ऐसे में कई बार ऐसा होता है कि वित्तीय संसाधनों की बदौलत प्रतिद्वदियों से बेहतर स्थिति में होते हैं। इस तरह के चुनाव का परिणाम लोगों की वास्तविक पसंद सामने नहीं आ पाती। इसका नतीजा यह होता है कि कभी-कभी योग्य और शिक्षित लोगों से जनता महरूम हो जाती है जबकि सही मायने में वह जनता का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। 

आयोग का कहना है कि चुनाव में मनी पावर के इस्तेमाल पर लगाम लगाने के मकसद से वह लगातार प्रयास कर रहा है। आयोग ने कहा है कि वह चुनावी प्रक्रिया से पैसों के दुरूपयोग और आपराधिक छवि के लोगों को दूर रखने के लिए प्रयासरत है। आयोग ने यह भी कहा कि उम्मीदवारों द्वारा गलत हलफनामा दाखिल करने को भी जनप्रतिनिधि अधिनियम की धारा-123 के तहत शामिल भ्रष्ट गतिविधियों की सूची में शामिल किया जाना चाहिए।

केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल(एएसजी) पीएस पटवालिया ने आयोग के हलफनामे पर सरकार का पक्ष रखने केलिए अदालत से कुछ वक्त देने के लिए कहा। इस आग्रह को स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर और न्यायमूर्ति अभय मोहन सप्रे की पीठ ने सरकार को पक्ष रखने के लिए छह हफ्ते का वक्त दिया है। शीर्ष अदालत लखनऊ की एक गैर सरकारी संस्था लोकप्रहरी द्वारा दाखिल एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है। 
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