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कोमागाटा पर माफी के बाद कनाडा के प्रधानमंत्री ट्रूडो अब स्वर्ण मंदिर जाएंगे

Sun, 18 Feb 2018 03:04 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पंजाब
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जस्टिन ट्रूडो
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कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो भारत के दौरे पर पहुंच गए हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बुलावे पर वो सात दिनों की भारत यात्रा पर शनिवार को नई दिल्ली पहुंचे। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने ट्वीट से इसकी सूचना भी दी। उन्होंने लिखा, "लोकतंत्र और अनेकता के साझा मूल्यों के साथ रणनीतिक साझेदारी! कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो को नमस्ते। वो 17 से 24 फरवरी तक भारत के दौरे पर हैं।" विदेश मंत्रालय के अनुसार, "कनाडा के प्रधानमंत्री के दौरे का उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश, ऊर्जा, साइंस और इनोवेशन, उच्च शिक्षा, आधारभूत विकास, अंतरिक्ष समेत कई क्षेत्रों के साझा हितों को लेकर द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना है।" इसके अलावा इस दौरे में दोनों देशों के बीच वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों के साथ ही सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई को लेकर आपसी सहयोग पर भी बातचीत होगी। 

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अमृतसर क्यों जा रहे हैं ट्रूडो?

इस दौरान दोनों देशों के बीच कई समझौतों पर हस्ताक्षर होंगे। 23 फरवरी को दोनों प्रधानमंत्रियों की मुलाकात होगी और अपने परिवार के साथ पहुंचे ट्रूडो मुंबई, आगरा, अहमदाबाद के साथ अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर भी जाएंगे। तो यह सवाल उठना लाजमी है कि उनके अमृतसर जाने के पीछे क्या वजहें हैं? इसके पीछे 103 साल पुरानी एक घटना है। जिसे लेकर 20 मई, 2016 को प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने अपने संसद में आधिकारिक माफी भी मांगी थी। कनाडा में भारतीय मूल के करीब 14 लाख लोग रहते हैं लेकिन आजादी से पहले वहां हिंदुस्तानियों के बसने की इजाजत नहीं थी। भारतीय वहां काम की तलाश में जाते थे लेकिन उन्हें परिवार समेत वहां आने की मनाही थी। उस वक्त की कनाडा सरकार ने एशियाई और अफ्रीकी मूल के लोगों को यहां आने से रोकने के लिए कानून बना रखे थे। यह कानून था कंटिन्यूअस पैसेज एक्ट यानी समुद्र में बगैर रुके अगर कोई जहाज कनाडा के तट पर पहुंचता है तभी उसे कनाडा में घुसने की अनुमति दी जाएगी।

क्या था पूरा मामला?

1914 में कोमागाटा मारू नामक एक जहाज में 300 से अधिक हिंदुस्तानी मुसाफिर कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया तट पर पहुंचे थे। जहाज को गदर पार्टी से संबंधित गुरदीत सिंह ने किराए पर लिया था। यह जहाज हांगकांग से सीधी यात्रा कर वहां पहुंचा था। यह कनाडा के उस हिस्से में पहुंचा था जहां ब्रिटिश शासन था। भारतीयों का यह मानना था कि वो उन जगहों पर अपनी रोजी रोटी के लिए जा सकते हैं जहां-जहां ब्रिटिश राज है। उसी कड़ी में लोग कनाडा पहुंचे लेकिन जो लोग नस्लवाद के पैरोकार थे वो बाहर से आने वाले लोगों को यहां आने नहीं देना चाहते थे। 23 मई को वैंकुवर पहुंचे इस जहाज को वहां समुद्र तट पर ही दो महीने तक रोके रखा गया और कनाडा में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई।
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कोमागाटा मारू में सवार 376 भारतीय मुसाफिरों में से सिर्फ 24 को कनाडा सरकार ने वैंकूवर में उतरने दिया था। कनाडा के अधिकारियों का कहना था कि कोमागाटा मारू पर इस यात्रा के बीच में लोग चढ़ाए गए हैं। 1913 में कनाडा और अमरीका में रह रहे प्रवासी भारतीयों द्वारा गठित गदर पार्टी ने कनाडा की सरकार पर यात्रियों को वहां उतारने का दबाव डाला इसके बावजूद तट पर दो महीने तक रखने के बाद उन्हें वापस भारत भेज दिया गया। लगभग छह महीने समुद्र में घूमने के बाद यह जहाज कोलकाता में बजबज बंदरगाह पहुंचा।

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कनाडा के प्रधानमंत्री
29 सितंबर 1914 का वो दिन

कोमागाटा मारू समिति की जांच रिपोर्ट के मुताबिक जहाज सितंबर 1914 में कोलकाता के पास बज बज बंदरगाह पहुंचा। बंगाल सरकार के प्रशासन ने यह फैसला किया कि जहाज में सवार सभी लोगों की पहले शिनाख्त की जाएगी। इसके लिए उन्हें एक ट्रेन से बिना हावड़ा और कलकत्ता गए पंजाब ले जाया जाएगा लेकिन केवल 62 यात्री इसके लिए तैयार हुए बाकियों ने इसका विरोध किया और फिर 29 सितंबर 1914 को यात्रियों और पुलिस के बीच गंभीर झड़प शुरू हो गई। झड़प इतनी गंभीर थी की सेना बुलानी पड़ी। यात्रियों पर गोलियां चलाई गईं। जिसमें 20 सिख यात्री मारे गए साथ ही एक पुलिस अधिकारी, एक रेलवे अधिकारी, पंजाब पुलिस के दो अधिकारी, बजबज के रहने वाले दो भारतीय की भी इस झड़प में मौत हो गई। जबकि 213 यात्रियों को गिरफ्तार किया गया।

कोमागाटा मारू की घटना को लेकर बहुत हंगामा हुआ। एक समिति गठित की गई जिसने दिसंबर 1914 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसमें 321 यात्रियों का जिक्र है जो कोमागाटा मारू से बज बज पहुंचे थे। इसके मुताबिक 62 लोगों को ट्रेन से पंजाब भेजा गया। 20 यात्री मारे गए। 211 यात्रियों को गिरफ्तार किया गया जबकि 23 यात्री फरार हो गए लेकिन इस पूरे जत्थे के मुखिया गुरदीत सिंह ने अपनी किताब में लिखा कि अंग्रेज सिपाहियों ने इस पूरे प्रकरण की शुरुआत की। उन्होंने लिखा, 'हम सभी प्रार्थना के लिए जुटे थे। गुरु ग्रंथ साहिब बीच में रखी थी लेकिन एक पुलिस वाले ने बीच में घुस कर लाठी चलाई। इस पर सरदार कमल सिंह ने उससे लाठी छीन ली। इसे देखते हुए एक दूसरा पुलिस वाला इस भीड़ में पहुंचा जिसे ग्रंथी ने गुरु ग्रंथ साहिब तक पहुंचने से रोका। तभी एक तीसरे पुलिस वाले ने गोली चला दी। बिना कोई चेतावनी दिए गोली चलाई गई।

इससे आजादी की लड़ाई हुई प्रचंड

द वॉयज ऑफ द कोमागाटा मारू में ह्यूज जेएम जॉन्सटन लिखते हैं, "कोमागाटा मारू के यात्रियों के साथ कानून का उल्लंघन करने वालों की तरह व्यवहार किया गया।" इस घटना के बाद भारतीयों में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बहुत गुस्सा पैदा किया। कनाडा स्थित रैडियल देसी के संस्थापक संपादक गुरप्रीत सिंह ने बीबीसी से कहा कि कोमागाटा मारू की घटना ने आजादी की लड़ाई को प्रचंड किया और लोगों में और भी गुस्सा आया और बगावत और भी तीखी हुई। कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने इसी घटना को लेकर अपने सदन में माफी मांगी थी। कोमागाटा मारू पर सवार यात्रियों के वंशजों और सिख समुदाय से माफी मांगते हुए उन्होंने कहा था कि जिस दर्द और तकलीफ से वो लोग गुजरे हैं उसे कोई शब्द मिटा नहीं सकता। उन्होंने कनाडा सरकार के तब के कानून को इस घटना के लिए जिम्मेदार ठहराया और कहा कि उसकी वजह से हुई बाद में मौतों का उन्हें दुख है।

ट्रूडो का स्वर्ण मंदिर जाना अहम

गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि अब कनाडा सरकार अतीत में हुई ज्यादतियों को सुधारा जाए, उसे लेकर माफी मांगी जाए। जापानी, चीनी और भारतीय लोगों से माफी मांगी गई। गुरप्रीत बताते हैं, "पिछले प्रधानमंत्री स्टीफन हार्पर ने भी माफी मांगी थी लेकिन उन्होंने माफी एक पार्क में मांगी थी। समुदाय चाहता था कि यह माफी संसद में मांगी जाए जिसे ट्रूडो ने किया।" गुरप्रीत कहते हैं, "कोमागाटा मारू घटना के बाद लोग क्रांतिकारी घटनाओं में शामिल हुए। यह बहुत महत्वपूर्ण अध्याय था। कनाडा की सरकार ने माफी मांग ली लेकिन भारत सरकार ने बहुत दिनों तक यह स्वीकार नहीं किया कि वो स्वतंत्रता सेनानी थे।" कनाडा सरकार ने कोमागाटा मारू घटना की शताब्दी पर डाक टिकट भी जारी किया था। गुरप्रीत बताते हैं, "सिख समुदाय कनाडा में बहुत अहम है। पहले भी कनाडा के प्रधानमंत्री स्वर्ण मंदिर जाते रहे हैं। सिख समुदाय के लिए ट्रू़डो की स्वर्ण मंदिर यात्रा बहुत अहम है।"
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