29 सितंबर 1914 का वो दिन
कोमागाटा मारू समिति की जांच रिपोर्ट के मुताबिक जहाज सितंबर 1914 में कोलकाता के पास बज बज बंदरगाह पहुंचा। बंगाल सरकार के प्रशासन ने यह फैसला किया कि जहाज में सवार सभी लोगों की पहले शिनाख्त की जाएगी। इसके लिए उन्हें एक ट्रेन से बिना हावड़ा और कलकत्ता गए पंजाब ले जाया जाएगा लेकिन केवल 62 यात्री इसके लिए तैयार हुए बाकियों ने इसका विरोध किया और फिर 29 सितंबर 1914 को यात्रियों और पुलिस के बीच गंभीर झड़प शुरू हो गई। झड़प इतनी गंभीर थी की सेना बुलानी पड़ी। यात्रियों पर गोलियां चलाई गईं। जिसमें 20 सिख यात्री मारे गए साथ ही एक पुलिस अधिकारी, एक रेलवे अधिकारी, पंजाब पुलिस के दो अधिकारी, बजबज के रहने वाले दो भारतीय की भी इस झड़प में मौत हो गई। जबकि 213 यात्रियों को गिरफ्तार किया गया।
कोमागाटा मारू की घटना को लेकर बहुत हंगामा हुआ। एक समिति गठित की गई जिसने दिसंबर 1914 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसमें 321 यात्रियों का जिक्र है जो कोमागाटा मारू से बज बज पहुंचे थे। इसके मुताबिक 62 लोगों को ट्रेन से पंजाब भेजा गया। 20 यात्री मारे गए। 211 यात्रियों को गिरफ्तार किया गया जबकि 23 यात्री फरार हो गए लेकिन इस पूरे जत्थे के मुखिया गुरदीत सिंह ने अपनी किताब में लिखा कि अंग्रेज सिपाहियों ने इस पूरे प्रकरण की शुरुआत की। उन्होंने लिखा, 'हम सभी प्रार्थना के लिए जुटे थे। गुरु ग्रंथ साहिब बीच में रखी थी लेकिन एक पुलिस वाले ने बीच में घुस कर लाठी चलाई। इस पर सरदार कमल सिंह ने उससे लाठी छीन ली। इसे देखते हुए एक दूसरा पुलिस वाला इस भीड़ में पहुंचा जिसे ग्रंथी ने गुरु ग्रंथ साहिब तक पहुंचने से रोका। तभी एक तीसरे पुलिस वाले ने गोली चला दी। बिना कोई चेतावनी दिए गोली चलाई गई।
इससे आजादी की लड़ाई हुई प्रचंड
द वॉयज ऑफ द कोमागाटा मारू में ह्यूज जेएम जॉन्सटन लिखते हैं, "कोमागाटा मारू के यात्रियों के साथ कानून का उल्लंघन करने वालों की तरह व्यवहार किया गया।" इस घटना के बाद भारतीयों में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बहुत गुस्सा पैदा किया। कनाडा स्थित रैडियल देसी के संस्थापक संपादक गुरप्रीत सिंह ने बीबीसी से कहा कि कोमागाटा मारू की घटना ने आजादी की लड़ाई को प्रचंड किया और लोगों में और भी गुस्सा आया और बगावत और भी तीखी हुई। कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने इसी घटना को लेकर अपने सदन में माफी मांगी थी। कोमागाटा मारू पर सवार यात्रियों के वंशजों और सिख समुदाय से माफी मांगते हुए उन्होंने कहा था कि जिस दर्द और तकलीफ से वो लोग गुजरे हैं उसे कोई शब्द मिटा नहीं सकता। उन्होंने कनाडा सरकार के तब के कानून को इस घटना के लिए जिम्मेदार ठहराया और कहा कि उसकी वजह से हुई बाद में मौतों का उन्हें दुख है।
ट्रूडो का स्वर्ण मंदिर जाना अहम
गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि अब कनाडा सरकार अतीत में हुई ज्यादतियों को सुधारा जाए, उसे लेकर माफी मांगी जाए। जापानी, चीनी और भारतीय लोगों से माफी मांगी गई। गुरप्रीत बताते हैं, "पिछले प्रधानमंत्री स्टीफन हार्पर ने भी माफी मांगी थी लेकिन उन्होंने माफी एक पार्क में मांगी थी। समुदाय चाहता था कि यह माफी संसद में मांगी जाए जिसे ट्रूडो ने किया।" गुरप्रीत कहते हैं, "कोमागाटा मारू घटना के बाद लोग क्रांतिकारी घटनाओं में शामिल हुए। यह बहुत महत्वपूर्ण अध्याय था। कनाडा की सरकार ने माफी मांग ली लेकिन भारत सरकार ने बहुत दिनों तक यह स्वीकार नहीं किया कि वो स्वतंत्रता सेनानी थे।" कनाडा सरकार ने कोमागाटा मारू घटना की शताब्दी पर डाक टिकट भी जारी किया था। गुरप्रीत बताते हैं, "सिख समुदाय कनाडा में बहुत अहम है। पहले भी कनाडा के प्रधानमंत्री स्वर्ण मंदिर जाते रहे हैं। सिख समुदाय के लिए ट्रू़डो की स्वर्ण मंदिर यात्रा बहुत अहम है।"