सर्दियां शुरू होते ही दिल्ली की हवा काफी जहरीली हो जाती है। एयर क्वालिटी इंडेक्स अपने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाता है और इस दौरान लोगों को सांस लेने में काफी तकलीफ का सामना करना पड़ता है। हवा में मौजूद प्रदूषक तत्वों की वजह से कई लोगों को आंखों, नाक और गले में जलन भी होती है। इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए सरकार स्कूल और कॉलेजों को कुछ दिनों के लिए बंद कर देती है।
कई जगहों पर निर्माण कार्य और दूसरी कई तरह की गतिविधियों पर भी रोक लगा दी जाती है ताकि प्रदूषण बढ़ने की समस्या को कुछ हद तक नियंत्रत किया जा सके। यह समस्या हर साल सामने आती है। पिछले कई वर्षों में सरकार ने दिल्ली में प्रदूषण का स्तर कम करने के वादे तो जरूर किए हैं, लेकिन हर साल सर्दियों में यह समस्या देखने को मिलती है।
एक दशक पहले चीन एक गंभीर वायु प्रदूषण के संकट से जूझ रहा था। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ बड़े शहरों में वाहनों की संख्या, भारी उद्योग और कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों से होने वाला उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा था। इसका असर इतना गंभीर था कि बीजिंग में प्रदूषण का स्तर कई बार खतरनाक स्थिति तक पहुंच जाता था। खराब होती हवा को लेकर चीन के कई हिस्सों में लोगों के बीच नाराजगी बढ़ी और जगह-जगह विरोध प्रदर्शन भी होने लगे थे।
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बीजिंग के सामने मौजूद वायु प्रदूषण को देश की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक माना। इसके बाद चीन ने प्रदूषण से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय अभियान शुरू किया। सरकार ने इसके लिए करीब 270 अरब डॉलर का भारी-भरकम बजट तय किया। इस योजना का मकसद सिर्फ प्रदूषण के गंभीर दिनों में अस्थयी कदम उठाना नहीं था बल्कि उन जगहों पर एक्शन लेना था जो लगातार हवा को खराब करने का काम कर रहे थे।
चीन ने वायु प्रदूषण से निपटने के लिए सिर्फ एक-दो उपायों पर निर्भर रहने के बजाय कई स्तरों पर एक साथ काम किया। बीजिंग में प्रदूषण के अलग-अलग स्रोतों को पहचानकर उनके हिसाब से कदम उठाए गए। इसी रणनीति का एक अहम हिस्सा पब्लिक ट्रांसपोर्ट और अर्बन रेल नेटवर्क का विस्तार था। इसका मकसद लोगों की कारों पर निर्भरता कम करना और शहर में ज्यादा टिकऊ परिवहन व्यवस्था तैयार करना था।