-बच्चों के अकाउंट हैक कर उन्हें धमकी दी जाती है।
-अशलील फोटो और मेसेज भेजे जाते हैं।
-इंटरनेट पर बच्चों को धमकाने के साथ-साथ उनकी जासूसी भी की जाती है।
-गलत लोगों से फेसबुक पर दोस्ती होने से वह लोग बच्चे को नुकसान पहुंचाने में जरा भी नहीं हिचकिचाते।
-मोरफिंग करके फोटो का गलत इस्तेमाल किया जाता है।
-बच्चों को धमकाकर उनसे संवेदनशील जानकारी ली जाती है।
-इंटरनेट इस्तेमाल करने की एक तय उम्र सीमा होनी चाहिए।
-माता-पिता, शिक्षक और बच्चों को साइबर क्राइम पर बने कानूनों से जागरुक कराना चाहिए।
-बच्चों को शिक्षित करना होगा कि वह किस प्रकार इंटरनेट का इस्तेमाल करें।
-हो सके तो जब बच्चे इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हों तब माता-पिता में से किसी एक को बच्चे के साथ बैठना चाहिए।
-बच्चों के साथ यदि किसी प्रकार का कोई साइबर क्राइम हो तो ऐसा करने वाले व्यक्ति के खिलाफ तुरंत कार्रवाई होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की वकील और साइबर लॉ विशेषज्ञ कर्निका सेठ का कहना है कि हम आजकल 10-14 वर्ष की उम्र के सभी बच्चों को इंटरनेट का इस्तेमाल करते हुए देखते हैं। अगर यह नियम बना दिया जाए कि जब तक वह 18 वर्ष के नहीं हो जाते तब तक वह इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं कर सकते, तो ऐसा करने से
बच्चे स्कूल लेवल पर ही इंटरनेट का सही इस्तेमाल करना सीख जाएंगे।