पारिवारिक अदालतों को इसलिए बनाया गया था कि वो ‘शादी और परिवार के मामलों में सुलह को बढ़ावा देंगी तथा विवादों का तेजी से निपटारा सुनिश्चित करेंगी।’ सुप्रीम कोर्ट ने कई बार दिखाया है कि वह सिर्फ जटिल कानूनों की व्याख्या नहीं करता, बल्कि अपने वकीलों के माध्यम से कानूनी लड़ाई लड़ने वाले जोड़ों को यह भी याद दिलाता है कि एक-दूसरे से बात करके भी आपसी विवाद खत्म किए जा सकते हैं।
यह मामला राजस्थान के पवन कुमार शर्मा और उनकी पत्नी सनी के बीच चल रहे तलाक के मुकदमे का है। पवन ने हिंदू विवाह अधिनियम के सेक्शन 13 के तहत पत्नी से तलाक की अर्जी दी थी। दोनों के बीच अल्वर की पारिवारिक अदालत में मामला चल रहा था। सनी ने इस मामले को गुरुग्राम ट्रांसफर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दी।
न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ की अध्यक्षता वाली पीठ ने शुरू में दोनों को गुरुग्राम स्थित मध्यस्थता और सुलह केंद्र जाने का निर्देश दिया। हालांकि ये कोशिश नाकाम रही, क्योंकि पति ने इसमें शामिल नहीं हुआ। इसके बाद पीठ ने दोनों को अगली सुनवाई में पेश होने का निर्देश दिया।
सुनवाई के दौरान पीठ ने वकील गरिमा प्रसाद को पक्षकारों के साथ सभी मुद्दों पर चर्चा करने के लिए मध्यस्थ नियुक्त कर दिया। गरिमा ने दोनों के साथ लगभग तीन घंटे लंबी चर्चा की।