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सीएजी रिपोर्ट में खुलासा: शिक्षकों और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी से सात आईआईटी में लक्ष्य से कम हुए प्रवेश

Sat, 01 Jan 2022 07:44 PM IST
Harendra Chaudhary डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक शिक्षा मंत्रालय की परिकल्पना थी कि शुरुआती छह वर्षों (2008-14) में आठ आईआईटी में कुल 18,880 छात्र लिए जाएंगे। लेकिन इस अवधि के दौरान इन आठ संस्थान में केवल 33 फीसदी छात्रों को ही दाखिला दिया जा सका। जिससे छात्रों के लिए शिक्षा के अधिकतम अवसर पैदा करने का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सका...
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आईआईटी दिल्ली - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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यूपीए सरकार के दौर में स्थापित किए गए नए दौर के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) छात्रों को शिक्षा के अवसर देने में नाकाम रहे हैं। इसके पीछे शिक्षकों और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी जैसी वजह सामने आई है। 2008 में शुरू हुए इन आईआईटी में शुरुआती छह वर्षों में महज 33 फीसदी छात्रों को एडमिशन मिल सका है। इसका खुलासा हाल ही में जारी नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में हुआ है।

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इन आठ आईआईटी का परफॉरमेंस ऑडिट अगस्त 2019 में शुरू किया गया था। इसमें 2014 से 2019 के बीच पांच वर्ष की अवधि कवर की गई है। इसमें इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण, उपकरणों और सेवाओं की खरीद, शैक्षणिक और शोध गतिविधियां, शासन व निरीक्षण और वित्तीय प्रबंधन का आकलन किया गया है। इस ऑडिट में आईआईटी इंदौर, रोपड़ (रूपनगर), हैदराबाद, पटना, मंडी, गांधीनगर, भुवनेश्वर और जोधपुर शामिल हैं।

महज 33 फीसदी छात्रों को मिला एडमिशन

सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक शिक्षा मंत्रालय की परिकल्पना थी कि शुरुआती छह वर्षों (2008-14) में आठ आईआईटी में कुल 18,880 छात्र लिए जाएंगे। लेकिन इस अवधि के दौरान इन आठ संस्थान में केवल 33 फीसदी छात्रों को ही दाखिला दिया जा सका। जिससे छात्रों के लिए शिक्षा के अधिकतम अवसर पैदा करने का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सका।

रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि इन आईआईटी के पीजी और पीएचडी जैसे कोर्स में भी छात्र कम रुचि ले रहे हैं। जिसकी वजह से इन कोर्स की सीटें नहीं भर पा रही हैं। इसके अलावा इन संस्थानों में एससी, एसटी और ओबीसी श्रेणियों के छात्रों का पोस्ट ग्रेजुएट (पीजी) और पीएचडी नामांकन में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। कैग ने इन संस्थानों में चल रहे कोर्स को फिर मूल्यांकन करने का भी सुझाव दिया है।

शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं संस्थान

सीएजी ऑडिट में इन संस्थानों में छात्रों के दाखिलों में कमी के अलावा इन आठ संस्थानों में कुछ और खामियां सामने आई हैं। संस्थानों में साल दर साल शिक्षकों की भर्ती के बावजूद सात आईआईटी में शिक्षकों के पदों में पांच से 36 फीसदी की रिक्तियां देखी गई हैं। शिक्षकों की ये कमियां रोपड़ (रूपनगर, पंजाब) को छोड़कर सभी दूसरे संस्थानों में देखी गईं। टीचिंग स्टाफ में ये कमी मार्च 2019 तक देखी गई है। शिक्षकों की कमी की वजह से छात्रों की शिक्षा की गुणवत्ता पर असर दिखाई देगा। क्योंकि कम शिक्षक होने के कारण दूसरे शिक्षकों पर पढ़ाने का अधिक बोझ बढ़ जाता है।

इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी आई आड़े

कैग ने अपने ऑडिट में यह भी पाया कि कुछ आईआईटी संस्थानों को भूमि आवंटन में भी देरी हुई है। जिससे छात्रों को दी जाने वाली सुविधाओं पर असर पड़ा है। आईआईटी के लिए छात्रों को नियोजित सुविधाएं मुहैया कराने की राह में आवश्यक ज़मीन का अभाव एक बड़ी बाधा थी। आईआईटी हैदराबाद, आईआईटी इंदौर, आईआईटी जोधपुर और आईआईटी पटना में शिक्षा मंत्रालय द्वारा परिकल्पित पर्याप्त जमीन (500-600 एकड़) उपलब्ध थी।

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जबकि आईआईटी भुवनेश्वर, आईआईटी गांधीनगर, आईआईटी मंडी और आईआईटी रोपड़ में जमीन के आवंटन और हस्तांतरण के मुद्दे उसकी स्थापना के एक दशक बाद जस के तस बने हुए थे। आठों आईआईटी के भवन समय से नहीं बनने का असर छात्रों के एडमिशन पर देखा गया है। ऑडिटर ने पाया कि आईआईटी हैदराबाद के इंफ्रास्ट्रक्चर बनने में 56 महीने, आईआईटी मंडी में 41 महीने, आईआईटी रोपड़ में 39 महीने, आईआईटी गांधीनगर और आईआईटी इंदौर में 37 महीने की देरी हुई है।

वित्तीय प्रबंधन में भी खामियां

कैग ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) पर्याप्त आंतरिक रिसिप्ट्स यानी प्राप्तियां उत्पन्न करने में असमर्थ थे और वे अनुदान के लिए सरकार पर ही निर्भर रहे। इसका मतलब है कि आईआईटी ने जिस तरह से पैसे को मैनेज किया, उसमें कमियां देखी गईं। ऑडिट में पाया गया कि आईआईटी द्वारा किए गए वित्तीय प्रबंधन में खामियां थीं। पूंजी परिव्यय को संशोधित करना पड़ा क्योंकि बुनियादी ढांचे के निर्माण में देरी हो रही थी। आईआईटी पर्याप्त आंतरिक प्राप्तियां उत्पन्न करने में असमर्थ थे और इस प्रकार वे अनुदान के लिए सरकार पर निर्भर बने रहे।

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