केंद्रीय मंत्रिमंडल के नए विस्तार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगले डेढ़ साल में होंने वाले विधानसभा चुनावों के साथ साथ 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों के समीकरणों का भी ध्यान रखा है। जहां नए मंत्रियों के चयन में मोदी ने उत्तर प्रदेश बिहार कर्नाटक राजस्थान मध्यप्रदेश के सामाजिक संतुलन का खास ध्यान रखा है तो वहीं चार पूर्व नौकरशाहों जिनमें दो अभी सांसद भी नही हैं को मंत्री बनाकर सरकार में प्रशासनिक योग्यता को भी तरजीह दी है।
जबकि चार पुराने राज्य मंत्रियों को पदोन्नति देकर ये भी संदेश दिया गया है कि कामकाज के मानदंड पर खरे उतरने वालों को पुरस्कृत भी जाएगा। लेकिन इस फेरबदल से ये भी साफ है कि सरकार और भाजपा दोनों पर अगले 18 महीनों में अपनी नीतियों कार्यक्रमों को जनता के बीच अमली जामा पहनाने का खासा दबाव है।
उत्तरप्रदेश ने लोकसभा चुनाव में भाजपा व सहयोगी दलों को मिलाकर 73 सांसद दिए।इसलिये वहां कोई जोखिम नहीं लिया गया।कलराज मिश्र अगर बाहर गए तो पूर्वांचल के ही शिवप्रताप शुक्ल को शामिल किया गया।पश्चिमी उत्तरप्रदेश के जाट नेता संजीव बालियान की छुट्टी हुई तो बागपत के सांसद सत्यपाल सिंह को जगह दे दी गई।पूर्वांचल के महेन्द्रनाथ पांडे को मंत्रिमंडल से बाहर तो किया गया लेकिन उन्हें सूबे के संगठन की कमान सौंपी दी गई।
इसतरह भाजपा के बड़े जनाधार ब्राह्मण और जाट वर्ग को नाराज नही होने दिया गया। इसीतरह बिहार से अगर राजपूत राजीव प्रताप रूडी हटाये गए तो राजपूतों के गढ़ आरा के सांसद आर के सिंह को जगह दी गई। साथ ही बक्सर के ब्राह्णण सांसद अश्वनी चौबे को मंत्री बनाकर बिहार के नए समीकरणों में भाजपा के सवर्ण जनाधार को एकजुट रखा गया।
इसी तरह धर्मेंद्र प्रधान की पदोन्नति भाजपा की उड़ीसा राजनीति का विस्तार है तो गजेंद्र सिंह शेखावत के जरिये राजस्थान में राजपूतों वीरेंद्र कुमार मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा की दलित राजनीति साधेंगे।वहीं अनंत हेगड़े को लेकर कर्नाटक में ब्राह्मण मतदाताओं को संतुष्ट करने की कोशिश है।केजे अल्फोंस भाजपा और संघ की केरल राजनीति का नया आयाम है जिसमे हिंदुओं के साथ ईसाइयों को भी शामिल किया गया है।हरदीप पुरी की भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं से नज़दीकी और अंतरराष्ट्रीय अनुभव का लाभ मिला।