नागरिकता संशोधन कानून और पूरे देश में एनआरसी के डर से महाराष्ट्र के मालेगांव में जन्म प्रमाणपत्र बनवाने के लिए लंबी कतारें लगना शुरू हो गई है। लोगों के बीच भय है कि अगर उनके पास जन्म प्रमाणपत्र नहीं होगा तो वह एनआरसी लागू होने पर साबित नहीं कर पाएंगे कि वे भारत के नागरिक है।
असम में लागू हुए एनआरसी के बाद जब अंतिम सूची प्रकाशित हुई तो उसमें 19 लाख लोग इस सूची से बाहर हो गए। जिसके बाद असम से सैकड़ों किलोमीटर दूर, महाराष्ट्र के मालेगांव शहर में कई प्रमुख मस्जिदों ने 23 आवश्यक दस्तावेजों की एक सूची प्रसारित की और स्थानीय लोगों से आग्रह किया कि वे अपने इन कामजातों को सुनिश्चित करें, ताकि उन्हें किसी कठिनाई का सामना ना करना पडे़।
दिसंबर में आ चुके 13000 से ज्यादा आवेदन
इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, स्वास्थ्य विभाग ने बताया कि मालेगांव नगर निगम को अगस्त महीने जन्म प्रमाणपत्र बनवाने के लिए 2000 आवेदन आए। सितंबर महीने तक यह आकंड़ा बढ़कर 12 हजार पहुंच गया। वहीं, अक्तूबर में 12,500 और नवंबर में 12,800 लोगों ने जन्म प्रमाणपत्र बनवाने के लिए आवेदन दिया। गौर करने वाली बात यह है कि यह आकंड़ा बढ़ता ही जा रहा है। अकेले दिसंबर में ही 26 तारीख तक निगम को 13,000 से ज्यादा आवेदन मिल चुके हैं।
मुस्लिम निवासी डरकर बना रहे दस्तावेज
इस मुद्दे पर मालेगांव नगर निगम के कमिश्नर किशोर बोर्डे ने कहा कि वह जन्म प्रमाणपत्रों के लिए बढ़ रहे आवेदन पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते हैं, लेकिन उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि शहर के मुस्लिम निवासियों नए नागरिकता संशोधन अधिनियम और एक राष्ट्रव्यापी एनआरसी के प्रभाव से डरकर पहचान के लिए दस्तावेज बनवा रहे हैं।
निगम के जन्म और मृत्यु रजिस्ट्री विभाग के कर्मचारियों ने कहा कि अधिकांश आवेदन 1927 और 1980 के बीच पैदा हुए लोगों के लिए हैं। कर्मचारियों ने बताया कि इसके चलते वे समय पर इन आवेदनों प्रक्रिया को पूरा नहीं कर पा रहे है।
दस्तावेज बनवाने में 15 से 30 दिन का लग रहा है समय
एक अधिकारी ने कहा कि हमारे पास केवल चार कर्मचारी कार्यरत है। उन्होंने बताया कि अगस्त तक, हम एक जन्म प्रमाणपत्र को तीन से चार दिनों में जारी कर देते थे। लेकिन अब इतनी संख्या में आवेदन आ रहे हैं, हम इस जल्दबाजी का सामना नहीं कर पा रहे है। इसे देखते हुए अब हम आवेदकों को 15 से 30 दिन तक का समय दे रहे हैं।
स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि जब हमें आवेदन मिलता है तो हम अपने रजिस्टर में आवेदक का नाम और उसका जन्म दिन देखते है। यदि हमें आवेदक का नाम मिलता है, तो हम उसे वापस बुलाते और आवेदक को उसका जन्म प्रमाणपत्र ले जाने के लिए कहते हैं। उन्होंने बताया कि वर्तमान में इस सारी प्रक्रिया में 15 से 30 दिनों का समय लग रहा है।
एक अधिकारी के अनुसार, अधिकांश आवेदन माता-पिता और दादा-दादी के जन्म प्रमाणपत्र के लिए किए गए हैं। अधिकारी ने बताया कि लोग मालेगांव में अपने पूर्वजों और अधिवास को साबित करने के लिए चिंतित हैं, यहां तक कि जो लोग तीन-चार पीढ़ियों से रह रहे हैं उनमें भी यह चिंता देखी जा रही है।
मालेगांव में रहने वाले लोगों के पूर्वज उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सचिव और दस्तूर बचाओ समिति के संस्थापक मौलाना उमरैन महफूज रहमानी ने कहा कि असम में एनआरसी से 19 लाख से अधिक लोगों के बाहर होने से मालेगांव के मुसलमानों के बीच डर है।
उन्होंने बताया कि मालेगांव में रहने वाले ज्यादा मुसलमानों के वंशज उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे, जो यहां आकर बस गए। जब से असम में एनआरसी की प्रक्रिया पूरी हुई है, तब से यहां रहने वाले लोगों में यह सुनिश्चित करने की होड़ मची हुई है कि उनके सभी जरूरी दस्तावेज क्रम में हैं या नहीं।