अन्य क्षेत्रों से होता है इतना प्रदूषण
गैर-प्राप्ति शहरों में वायु प्रदूषण के विनियमन के लिए पोर्टल (PRANA) और आईआईटी दिल्ली के स्रोत विभाजन अध्ययन के अनुसार, परिवहन (17 प्रतिशत-28 प्रतिशत) और धूल (17 प्रतिशत-38 प्रतिशत) के अलावा, कई अन्य क्षेत्र पीएम के स्तर में महत्वपूर्ण रूप से योगदान करते हैं। इनमें आवासीय दहन (8 प्रतिशत-10 प्रतिशत), कृषि दहन (4 प्रतिशत-7 प्रतिशत) और औद्योगिक गतिविधियाँ और बिजली संयंत्र (22 प्रतिशत-30 प्रतिशत) शामिल हैं। ये अध्ययन लगातार दर्शाते हैं कि दिल्ली-एनसीआर की वायु गुणवत्ता का संकट केवल वाहनों या मौसमी बायोमास जलने के कारण नहीं है, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में से होने वाले निरंतर उत्सर्जन के कारण भी है।
राजधानी में प्रदूषण नियंत्रण प्रौद्योगिकियों की कमी
सीआरईए के विश्लेषक मनोज कुमार ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, दिल्ली के निकट अधिकांश ताप विद्युत संयंत्रों में फ्लू गैस डिसल्फराइजेशन (एफजीडी) प्रणाली जैसी महत्वपूर्ण प्रदूषण नियंत्रण प्रौद्योगिकियां अभी भी अनुपस्थित हैं।
11 में से केवल 2 संयंत्रों में ही एफडीजी चालू
2025 के मध्य तक, राजधानी के 300 किलोमीटर के दायरे में स्थित ग्यारह संयंत्रों में से केवल दो एनटीपीसी दादरी और महात्मा गांधी कोयला आधारित बिजली संयंत्र में ही एफजीडी चालू हैं। एफजीडी यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका उपयोग थर्मल पावर प्लांटों और अन्य औद्योगिक प्रक्रियाओं से निकलने वाली फ्लू गैसों से सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) को हटाने के लिए किया जाता है। सीआरईए ने कहा कि यह नियमों की कमी सख्त वाहन नीति से मिले फायदे को कम कर देती है और नियमों के पालन में असंतुलन पैदा करती है। इससे होता यह है कि खेती से जुड़े प्रदूषण पर तो सख्ती होती है, लेकिन दूसरे क्षेत्रों में प्रदूषण अनियंत्रित रूप से जारी रहता है।