उत्तरप्रदेश और बिहार में तीन लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के लिए मतदान संपन्न हो गया। जानकारी के मुताबिक शाम 5 बजे तक यूपी के फूलपुर में 37.39 फीसदी और गोरखपुर में 43 फीसदी लोगों ने मतदान किया है।
गोरखपुर-फूलपुर में अखिलेश की सोशल इंजीनियरिंग का टेस्ट
वहीं, गोरखपुर व फूलपुर लोकसभा सीटों के उपचुनाव में सपा की सोशल इंजीनियरिंग का इम्तिहान भी होगा। इन सीटों के चुनाव परिणामों से सपा की सियासी दिशा तय होगी। सपा ने न सिर्फ सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखकर प्रत्याशी उतारे हैं, बल्कि उसका पूरा जोर पिछड़ों, दलित व अल्पसंख्यकों की लामबंदी पर भी है। अगर नतीजे सपा के अनुकूल रहे तो 2019 में यही राजनीतिक-सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश होगी। प्रदेश में आबादी के लिहाज से पिछड़ी जातियों की तादाद सर्वाधिक है। इसके बाद दलित व अल्पसंख्यक आते हैं।
पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भाजपा ने पिछड़ी जातियों को पाले में लाने के लिए लंबी कसरत की। अपना दल, भारतीय समाज पार्टी से गठबंधन, केशव मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष बनाना, स्वामी प्रसाद मौर्य समेत कई पिछड़े व दलित नेताओं को भाजपा में शामिल करना ऐसे फैसले रहे, जिनका भाजपा को चुनावों में फायदा मिला। भाजपा ने सोशल इंजीनियरिंग से पिछड़ी व कुछ दलित जातियों को साधा।
किसी जमाने में चौधरी चरण सिंह ने पिछड़ों, दलितों व अल्पसंख्यकों को जोड़ने के लिए सोशल इंजीनियरिंग की शुरुआत की थी। उनके दौरे में पिछड़े नेताओं की बड़ी फौज तैयार हुई। सरकारों में पिछड़ों की नुमाइंदगी बढ़ी। मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक पिछड़े वर्ग के नेता बनने लगे। उनके निधन के बाद मुलायम सिंह यादव ने काफी हद तक इस समीकरण को समझा।
बसपा के संस्थापक कांशीराम का ‘बहुजन’ का फॉर्मूला भी सोशल इंजीनियरिंग पर ही आधारित था। सपा भी इसी सोशल इंजीनियरिंग के रास्ते पर बढ़ी है। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश ने भी लोकसभा चुनाव की घोषणा से पहले पिछड़े व दलित नेताओं को जोड़ने की कोशिश की। उन्होंने गोरखपुर में निषाद पार्टी के अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद के बेटे प्रवीण को उम्मीदवार बनाया तो फूलपुर में कुर्मी समाज के नागेंद्र सिंह पटेल को चुनाव में उतारा।