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अधिकारियों ने धर्म विशेष के अफसरों की जिले में तैनाती नहीं करने की भेजी थी रिपोर्ट

Thu, 16 Jun 2016 09:40 AM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, कैराना
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कैराना के हालात का जायजा लेने पहुंची बीजेपी की टीम - फोटो : PTI
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 पलायन पर सियासत के दावे कुछ भी हों, लेकिन सूबे की ब्यूरोक्रेसी दो दशक पहले से कैराना के सच से वाकिफ रही है। कुंद हो चुकी कानून व्यवस्था और पसरे खौफ ने अपना घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया। तत्कालीन डीएम विनोद शंकर चौबे ने बाकायदा शासन को गोपनीय रिपोर्ट भेजी थी, जिसमें एक जाति और धर्म विशेष के अफसरों की जिले में तैनाती नहीं करने तक के लिए कह दिया था। खौफ के संदर्भ में ऐसा ही इशारा पूर्व डीएम एसपी सिंह भी कर चुके हैं।
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कैराना का लावा भले ही अब फूटा हो, मगर जमीनी हकीकत से अफसर पहले भी अनभिज्ञ नहीं रहे हैं। शामली जब पृथक जिला नहीं था। मुख्यालय से कैराना की दूरी 50 किलोमीटर से ज्यादा रही। यही वजह है कि तहसील होने के बावजूद भी डीएम और एसएसपी के लिए कैराना के लॉ एंड ऑर्डर को बनाए रखना चुनौती बना रहा। हरियाणा से जुड़े कैराना में क्राइम कभी कंट्रोल नहीं हो पाया। नकली नोट, हथियारों की तस्करी से लेकर रंगदारी, हत्या, दुष्कर्म, अवैध कब्जे और अन्य संगीन अपराधों ने यहां के जनजीवन को तबाह कर दिया। पाकिस्तान में बैठे इकबाल काना के रिश्ते कैराना से जुड़ते रहे। खुफिया एजेंसी भी इस बात को स्वीकार कर चुकी हैं।

इकबाल काना ने कैराना में अपराध का ऐसा चक्र शुरू किया कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी में उसको ओहदेदार बना दिया गया। कैराना की बर्बादी की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। बेखौफ अपराधियों को सियासत की पनाह मिलती रही। कृषि आधारित इस इलाके में अपराध के बाद जरायम के कारिंदे हरियाणा के पानीपत, करनाल, सोनीपत और कुरुक्षेत्र में छिपते रहे हैं। कुख्यात मुकीम काला के गुर्गों की इन्हीं शहरों से हुई गिरफ्तारी बात को पुख्ता करती है। पुलिस प्रशासन ने कैराना की हकीकत पर परदा डालते हुए सियासतदाओं की चाकरी में ही नौकरी गुजार दी। शासन तक कभी कैराना का सच पहुंच नहीं पाया। तत्कालीन डीएम विनोद शंकर चौबे ने हिम्मत की तो सूबे में बवाल खड़ा हो गया।
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बाहर के कारोबारियों ने भी तोड़ा नाता

खौफ ने अपना घर छोडने पर मजबूर कर दिया - फोटो : अमर उजाला
 विधानसभा में चौबे के खिलाफ अवमानना का प्रस्ताव लाने की बात उठी। सरकार ने घबराकर 26 फरवरी को डीएम चौबे का तबादला कर दिया। इससे पहले वर्ष 1995 में केवल छह माह जिले के डीएम रहे वरिष्ठ आईएएस सूर्य प्रताप सिंह भी कैराना के मसले पर तीखी टिप्पणी कर चुके हैं। सिंह के मुताबिक कैराना के कई मोहल्लों में दिन में घुसना भी पुलिस के बूते की बात नहीं थी।

गुंडागर्दी, अवैध असलहे, पशु तस्करी आदि अपराधों को कैराना में खुला राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा है। एक पूर्व सांसद के घर से ही कलक्टर रहते तस्करी का 25 किलो सोना और कई कुंतल चरस बरामद की गई थी। ब्यूरोक्रेट्स की मानें तो अपराध पिछले दो दशक से कैराना में पलता रहा है। असुरक्षा और मखौल बन चुके कानून की वजह से पलायन का परिणाम सामने है। यह अलग बात है कि भाजपा सांसद बाबू हुकुम सिंह का उठाया गया मुद्दा सियासी रंग ले रहा है।

कैराना में पिछले कई सालों से आपराधिक वारदातों के चलते हुए व्यापारियों के पलायन ने यहां प्रापर्टी में मंदा कर दिया है। दिल्ली- हरियाणा, पंजाब  के कारोबारियों ने दहशत के चलते भूमि की खरीद फरोख्त करने से कतराने लगे हैं। जिस कारण कैराना में बैनामा कराने में भारी कमी आई है।
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'पुलिस का राजनीतिकरण किया जाएगा तो कैराना जैसे हालात पैदा होंगे'

कैराना गांव
1990 के दशक कैराना तहसील में पंजाब, दिल्ली, हरियाणा के कारोबारियों ने यहां आकर किसानों की भूमि को खरीदकर कृषि फार्म बनाया था। दूसरे प्रांतों के कारोबारियों से भूमि की जबरदस्त खरीद फरोख्त और बैनामों से राजस्व की बढ़ोत्तरी हुई थी। पिछले 16 सालों से कैराना के व्यापारियों, उद्यमियों को आपराधियों द्वारा निशाना बना लिए जाने से दिल्ली-हरियाणा और पंजाब के कारोबारियों ने कैराना में अपनी भूमि में खरीद फरोख्त करने के लिए आना कम कर दिया था। पिछले दो साल पूर्व कैराना के उद्यमियों-व्यापारियों से शातिर बदमाश कग्गा-मुकीम काला गैंग के बदमाशों द्वारा रंगदारी वसूलने और हत्या करने के बाद यहां से पलायन शुरू कर दिया था।

पिछले दो सालो में एक के बाद एक व्यापारी, उद्यमी अपने को असुरक्षित मानते हुए करनाल, पानीपत, शामली, मुजफ्फरनगर, दिल्ली- मेरठ, सहारनपुर- हरिद्वार, रुड़की और देहरादून जाकर बस गए। जिले के सहायक स्टांप आयुक्त अरविंद कुमार सिंह बताते है कि जिले में दो वर्ष पूर्व सांप्रदायिक दंगे और आपराधिक वारदातों के चलते भारी संख्या में बैनामों व उनसे आय में भारी कमी आई है।

कैराना का दौरा करने वाली भाजपा की टीम में बागपत के भाजपा सांसद डॉ. सत्यपाल सिंह भी शामिल रहे।  मुंबई के पुलिस कमिश्नर रहे सत्यपाल सिंह का मानना है यदि पुलिस का राजनीतिकरण किया जाएगा तो कैराना जैसे हालात पैदा होंगे। पुलिस का काम कानून के हिसाब से कार्य करना है, न कि राजनीति के हिसाब से। ऐसी पुलिस को वर्दी उतारकर फेंक देनी चाहिए। पुलिस जब-जब राजनीति के हिसाब से चलती है व्यवस्था बिगड़ जाती है। कांधला और कैराना में भी यही देखने को मिला है। वर्तमान सरकार का ट्रैक रिकॉर्ड बेहद खराब है। इस सरकार से कोई उम्मीद करना बेमानी हैं। दोनों जगह गुंडे खुल घूमकर फायरिंग करते हैं, लोगों को धमकाते हैं। 
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