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राजनीति के इमामः मौसम की तरह बदलते बुखारी, निष्ठा पर नीयत भारी

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दिल्‍ली की शाही जामा मस्जिद के इमाम सैयद अहमद बुखारी एक बार फिर अपने राजनीतिक एजेंडे के कारण चर्चाओं में हैं। मौजूदा विधानसभा चुनावों में उन्होंने बसपा को समर्थन देने का ऐलान किया है। 
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इस ऐलान को यूं भी समझा जा सकता है कि उन्होंने यूपी के मुसलमानों को बसपा के पक्ष में वोट देने के लिए फतवा जारी किया है। लेकिन उनके इस फतवे का क्या महत्व है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जामा मस्जिद दिल्‍ली के जिस मटियामहल विधानसभा क्षेत्र में पड़ती है उसमें इमाम बुखारी के पुरजोर विरोध के बावजूद कांग्रेस के शोएब इकबाल लगातार तीन चुनावों तक जीत दर्ज करते रहे। 

इसे यूं भी समझा जा सकता है कि धार्मिक रूप से मुस्लिम कौम में खास स्‍थान रखने वाले इमाम बुखारी राजनीतिक मामलों में कौम के बीच अपनी हैसियत खोते जा रहे हैं। 
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कहा जाता है कि सैयद बुखारी को राजनीति की सीख पिता अब्दुल्ला बुखारी से ही मिली थी। जिन्होंने 1977 में पहले जनता पार्टी फिर 1980 में कांग्रेस को समर्थन कर खुद को राजनीति के बड़े खिलाड़ी के रूप में स्‍थापित कर लिया था। 

उसके बाद जामा मस्जिद से राजनीति का ऐसा साथ जुड़ा कि तमाम चुनावों में राजनीतिक दल के नुमाइंदे माथा टेकने यहां आने लगे। फिर चाहे वो इंदिरा गांधी रही हों या उनकी बहू सोनिया गांधी हर कोई मुस्लिम वोटों की चाह में जामा मस्जिद में हाजिरी लगाता रहा। हालांकि वो बात दीगर है कि जामा मस्जिद से निकलने वाले फतवे समय के साथ अपनी रंगत खोते रहे।

मुलायम को बताया था मुसलमानों का सच्चा हमदर्द

राजनीतिक जानकार इसका श्रेय मौजूदा इमाम सैयद बुखारी को देते रहे हैं जो हर बार चुनाव के साथ अपना चोला बदलते रहे। पिछले विधानसभा चुनाव में वो समाजवादी पार्टी के साथ थे तो मुलायम सिंह यादव को मुसलमानों का सच्‍चा रहनुमा बताने नहीं थकते थे, मौजूदा चुनावों में वो बिना मांगे ही बसपा के साथ हैं और मायावती को देश की सबसे अच्छी प्रशासक बताते हैं। 

आज भाजपा को मुसलमानों का दुश्मन बताने वाले बुखारी ने एक समय भाजपा को वोट देने का फतवा जारी कर मुसलमानों में हड़कंप मचा दिया था। साल 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी के कहने पर बुखारी ने पुरानी बातें भूलते हुए मुसलमानों से भाजपा के पक्ष में वोट देने की अपील की थी। 

हालांकि न उनकी अपील का असर तब हुआ था और न अब होता दिखाई देता है। हर बीतते चुनाव के साथ बुखारी की राजनीतिक निष्ठा भी बदलती रहती है और मकसद भी। एक दौर में आदम सेना नाम से मुस्लिम युवाओं का संगठन बनाने वाले बुखारी को जल्द ही उस मंशा को दफन करना पड़ा। 

वजह, मुसलमानों ने उनकी इस कवायद को सिरे से खारिज कर दिया और उन्हें कहीं से कोई समर्थन नहीं मिल पाया। इसके बाद उन्होंने 2007 के विधानसभा चुनावों में उत्तरप्रदेश यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के नाम से एक राजनीतिक दल का गठन कर मुस्लिम बहुल सीटों पर 54 उम्‍मीदवार उतारे थे। उन्हें उस समय शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा जब इनमें से 51 उम्मीदवारों की जमानत भी जब्त हो गई थी। मात्र एक सीट पर उन्हें जैसे तैसे जीत मिल सकी। 

हालांकि इसके बाद बुखारी ने सीधे राजनीति में उतरने से तौबा कर ली, लेकिन उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं कम नहीं हुईं। साल 2014 के लोकसभा चुनावों में बुखारी ने एक बार फिर पाला बदला और कांग्रेस के समर्थन का ऐलान किया, लेकिन एक बार फिर उनकी अपील का असर नहीं हुआ। माना जाता है कि काफी संख्या में मुसलमानों ने इन चुनावों में मोदी को समर्थन किया था। बीच में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के रूप में उन्हें मुसलमानों का नया रहनुमा देखने को मिला लेकिन बात आगे नहीं बढ़ सकी।
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मौजूदा चुनावों में बसपा के समर्थन में अपील कर चुके हैं बुखारी

बीते विधानसभा चुनावों में उन्होंने सपा को समर्थन का ऐलान किया और पार्टी को जीत भी मिल गई लेकिन बुखारी को अपने सियासी वजूद का अंदाजा उस समय हुआ जब सहारनपुर जिले की मुस्लिम बहुल बेहट सीट पर उनके दामाद उमर अली को बुरी तरह हार का मुंह देखना पड़ा, वो भी तब जब तमाम उम्‍मीदवारों के बीच वो अकेले मुस्लिम उम्‍मीदवार थे। 

इसके बाद बुखारी ने दामाद को एमएलसी बनाने के लिए मुलायम पर दबाव बनाया तो शुरूआती ना नुकुर के बाद मुलायम ने उनकी बात को तवज्जो दे दी। उमर अली एमएलसी बने तो बुखारी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं और जोर पकड़ने लगी उन्होंने दामाद को मंत्री बनाने के लिए मुलायम से उनकी पैरवी शुरू कर दी।

हालांकि इस बार उनकी दाल नहीं गली और अखिलेश के दबाव में मुलायम ने इससे इंकार कर दिया। इसके बाद से ही बुखारी और मुलायम में अदावत शुरू हो गई, हालांकि सपा मुखिया ने तो इस संबंध में कभी कुछ नहीं बोला लेकिन बुखारी ने सपा और मुलायम दोनों को कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 

सालभर में ही उनका सपा से मोहभंग हो गया और उन्होंने मुसलमानों से वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए सपा पर मुस्लिम विरोध में काम करने के आरोप मढ़ दिए। उन्होंने सपा राज में मुस्लिमों पर अत्याचार और मुजफ्फरनगर दंगे के मुद्दों को भी जमकर उछाल दिया। 

वो बात दीगर है कि उनके दामाद आज भी सपा के एमएलसी बने हुए हैं और सपा के टिकट पर ही एक बार फिर चुनावी मैदान में हैं। लेकिन बुखारी की निष्ठा अब बदल चुकी है और मौजूदा चुनावों में वो बसपा के झंडाबरदार बने हुए हैं।
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