आवारा कुत्तों के बढ़ते खतरे और कोर्ट के आदेशों के पालन में ढिलाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। बुधवार को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकारें जमीनी काम करने के बजाय हवा में महल बना रही हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि सिर्फ हलफनामे और दावे काफी नहीं हैं, बल्कि ठोस कार्रवाई दिखनी चाहिए।
अमाइकस क्यूरी ने बताया कि कुछ राज्यों ने कदम जरूर उठाए हैं, लेकिन कुल मिलाकर स्थिति कमजोर है।
कई राज्यों की रिपोर्ट में ठोस और स्पष्ट जानकारी का अभाव है।
बिहार ने 34 एबीसी (एनिमल बर्थ कंट्रोल) सेंटर होने का दावा किया।
राज्य सरकार के अनुसार 20 हजार से अधिक कुत्तों की नसबंदी की गई।
रिपोर्ट में रोजाना नसबंदी की क्षमता का कोई स्पष्ट आंकड़ा नहीं दिया गया।
यह भी नहीं बताया गया कि यह नसबंदी कितने समय में की गई।
राज्य में कुल आवारा कुत्तों की संख्या के मुकाबले यह आंकड़ा बेहद कम है।
कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब आवारा कुत्तों की संख्या लाखों में है, तो इतनी सीमित नसबंदी से समस्या कैसे सुलझेगी।
कुत्तों के काटने के आंकड़े क्यों बने चिंता की वजह?
कोर्ट ने असम के आंकड़ों पर खास चिंता जताई। 2024 में वहां 1.66 लाख डॉग बाइट और 2025 में सिर्फ जनवरी में ही करीब 20,900 मामले सामने आए। अदालत ने इसे “चौंकाने वाला” बताया। पीठ ने कहा कि ज्यादातर राज्यों ने कुत्तों के काटने के सही आंकड़े तक पेश नहीं किए, जो प्रशासनिक लापरवाही दिखाता है।