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Buffalo Fight: असम में मोह जूज के खेल को मिली कानूनी छूट, पारंपरिक भैसों की लड़ाई अब पशु क्रूरता कानून से बाहर

Thu, 27 Nov 2025 07:43 PM IST
हिमांशु चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गुवाहाटी

सार

Animal Cruelty Law Assam: सम विधानसभा ने ‘मोह जूज’ यानी पारंपरिक भैंसों की लड़ाई को पशु क्रूरता कानून से बाहर कर दिया है। यह निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया। सरकार का कहना है कि यह आयोजन असम की संस्कृति और स्थानीय नस्लों के संरक्षण से जुड़ा है।
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भैंसा। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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असम विधानसभा ने राज्य की एक पुरानी बहस को निर्णायक मोड़ देते हुए पारंपरिक भैंसों की लड़ाई ‘मोह जूज’ को पशु क्रूरता कानून से बाहर कर दिया है। गुरुवार को विधानसभा ने सर्वसम्मति से संशोधन बिल पारित किया, जिसके बाद यह पारंपरिक आयोजन अब कानूनी रूप से जारी रह सकेगा। तमिलनाडु के जलीकट्टू की तरह अब असम भी अपनी सांस्कृतिक गतिविधि को संरक्षण देने की दिशा में आगे बढ़ गया है।

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‘पशु क्रूरता निवारण (असम संशोधन) विधेयक, 2025’ पारित करते हुए पशुपालन और पशु चिकित्सा मंत्री कृष्णेंदु पॉल ने कहा कि मूल कानून में कुछ पारंपरिक आयोजनों को छूट देने की जरूरत पहले से ही मान्य है। उन्होंने बताया कि ‘मोह जूज’ असम की सांस्कृतिक पहचान, नस्ल संरक्षण और सामाजिक परंपरा का अहम हिस्सा है। इसलिए इसे 1960 के कानून की क्रूरता की परिभाषा से बाहर करने का निर्णय लिया गया है।

जलीकट्टू और बैलगाड़ी दौड़ जैसी छूट
मंत्री ने कहा कि यह संशोधन तमिलनाडु में जलीकट्टू और महाराष्ट्र व कर्नाटक में बैलगाड़ी दौड़ को मिली कानूनी छूट की तर्ज पर किया गया है। सरकार चाहता है कि माघ बिहू जैसे पारंपरिक त्योहारों पर होने वाले आयोजनों को कानून बाधित न करे। इसके लिए राज्य सरकार उन तारीखों को भी अधिसूचित करेगी जिन पर ‘मोह जूज’ जैसे आयोजन बिना बाधा आयोजित किए जा सकेंगे।
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हाईकोर्ट के फैसले के बाद आया संशोधन
गुवाहाटी हाईकोर्ट ने दिसंबर 2023 में राज्य सरकार की एसओपी को रद्द कर दिया था, जिसके तहत भैंसों और बुलबुल पक्षियों की लड़ाई की अनुमति दी गई थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि यह एसओपी 2014 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है। इसी निर्णय के बाद सरकार को नया विधायी रास्ता अपनाना पड़ा ताकि सांस्कृतिक आयोजनों को कानूनी सुरक्षा मिल सके।

बुलबुल पक्षियों की लड़ाई भी चर्चा में
राज्य में माघ बिहू के दौरान हेयग्रीव माधव मंदिर (हाजो) में आयोजित होने वाली बुलबुल पक्षियों की लड़ाई भी इसी बहस का हिस्सा रही है। यह आयोजन पिछले नौ वर्ष बंद रहा था और 2023 की एसओपी के बाद ही फिर शुरू हुआ। इसी तरह मोरीगांव, शिवसागर और ऊपरी असम के कई इलाकों में भैंसों की लड़ाई आयोजित होती है, जिनमें मोरीगांव का अहातगुड़ी सबसे प्रसिद्ध है।
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सुरक्षा मानकों को मिलेगी प्राथमिकता
सरकार द्वारा लाई गई एसओपी का फोकस पशुओं की सुरक्षा पर था, जिसमें नशीले पदार्थों और धारदार उपकरणों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध शामिल था। अब संशोधन के बाद सरकार नई व्यवस्था के साथ पारंपरिक आयोजनों को सुरक्षित तरीके से संचालित करने की तैयारी कर रही है। विधानसभा में इस बिल पर किसी दल ने आपत्ति नहीं की और इसे सर्वसम्मति से पारित किया गया।

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