राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) के तहत सरकारी कंपनी भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) किसानों से एक निश्चित दाम पर चावल और अनाज खरीदती है। इसके बाद सरकारी एजेंसियां राशन व्यवस्था के तहत ये खाद्य पदार्थ देश की 1.3 अरब जनसंख्या के 67 फीसदी लोगों को बाजार मूल्य से तकरीबन 1/10वें दामों पर उपलब्ध कराती हैं। बजट में दी जाने वाली सब्सिडी का बड़ा हिस्सा किसानों को उनकी फसल का ऊंचा दाम देने और इसके बाद बेहद कम दाम पर जनता को खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराने में खर्च हो जाता है।
एफसीआई पर पहले से ही दबाव
सरकार की तरफ से बड़े पैमाने पर खाद्य सब्सिडी बजट दिए जाने के बावजूद एफसीआई के लिए यह कम साबित हो रही है। सरकारी अनाज खरीद करने वाली मुख्य एजेंसी को सरकार के कल्याण कार्यक्रम चलाए रखने के लिए अरबों डॉलर का उधार लेना पड़ रहा है। पिछले महीने देश के शीर्ष ऑडिटर नियंत्रक व महालेखा परीक्षक (कैग) ने बताया था कि एफसीआई का सरकार पर बकाया 6 साल में करीब चार गुना बढ़ा है।
वित्त वर्ष 2011-12 में एफसीआई को सरकार से 234 अरब रुपये लेने थे, जो मार्च, 2017 में बढ़कर 813 अरब रुपये हो गए थे। सरकारी बजट में मिलने वाली सब्सिडी कितनी अपर्याप्त है, इसका अंदाजा चालू वित्त वर्ष में मार्च, 2019 तक के लिए मिले 1.69 अरब रुपये में से सरकार नवंबर तक ही 1.46 अरब रुपये खर्च कर चुकी थी।