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Budget: टैक्स रहित पेंशन, OPS बहाली और 8वें वेतन आयोग का गठन, सरकारी कर्मियों ने कही ‘मन की बात'

सार

Budget 2025: सेंट्रल ट्रेड यूनियन, जिनमें आईएनटीयूसी, एआईटीयूसी, एचएमएस, सीआईटीयू, टीयूसीसी, एसईडब्लूए, एआईसीसीटीयू, एलपीएफ और सेक्ट्रल व फेडरेशन की तरफ से पिछले दिनों वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखा गया है।
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बजट 2025 - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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संसद में केंद्रीय बजट पेश करने के लिए वित्त मंत्रालय तैयारियों में जुटा है। आर्थिक विशेषज्ञों से सुझाव लिए जा रहे हैं। केंद्रीय कर्मचारी संगठनों ने भी अपने 'मन की बात' सरकार तक पहुंचा दी है। सेंट्रल ट्रेड यूनियन, जिनमें आईएनटीयूसी, एआईटीयूसी, एचएमएस, सीआईटीयू, टीयूसीसी, एसईडब्लूए, एआईसीसीटीयू, एलपीएफ और सेक्ट्रल व फेडरेशन शामिल हैं, उनकी तरफ से पिछले दिनों वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखा गया है। इसमें लगभग दर्जनभर मांगें, शामिल की गई हैं। सरकार के समक्ष रखी गई मांगों में टैक्स रहित पेंशन, ओपीएस की बहाली और तुरंत प्रभाव से 8वें वेतन आयोग का गठन भी शामिल है। इतना ही नहीं, निजीकरण का विरोध, नियमित भर्ती और आवश्यक खाद्य पदार्थों, दवा व चिकित्सा बीमा पर जीएसटी की दरों में कटौती करना, सरकार से यह आग्रह भी किया गया है। 
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ट्रेड यूनियनों के एक सुझाव पर विचार नहीं 
कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि बजट-पूर्व विचार-विमर्श के लिए उनसे बात नहीं की जाती। हम यह कहने के लिए मजबूर हैं, पूर्व की सरकारों में बजट या किसी भी नीति को तैयार करते समय ट्रेड यूनियनों के एक भी सुझाव पर विचार नहीं किया गया था। भारतीय श्रम सम्मेलन (आईएलसी) बुलाए जाने को एक दशक होने जा रहा है। एनडीए सरकार के तहत आयोजित हुए एकमात्र आईएलसी की मुख्य सिफारिश पहले आईएलसी की सिफारिशों को लागू करना था। पूरी तरह से एकमत सिफारिशों को अनसुना कर दिया गया। कर्मचारियों के सुझावों और मांगों को नजरअंदाज किया जाता रहा। श्रम और रोजगार मंत्रालय द्वारा प्रकाशित अधिसूचना, ईपीएफ में चूक करने वाले नियोक्ताओं के खिलाफ लगाए गए जुर्माने की दरों में भारी कमी लाती है। यह ईपीएफओ के केंद्रीय न्यासी बोर्ड को अंधेरे में रखकर और यूनियनों से किसी भी तरह की सलाह-मशविरा किए बिना किया गया है। एक प्रतिशत लोगों के पास भारत की कुल संपत्ति का 40.5 प्रतिशत हिस्सा है, जबकि निचले पचास प्रतिशत भारतीयों की संपत्ति में हिस्सेदारी केवल तीन प्रतिशत है। इस तरह की बढ़ती असमानताएं और गहरी होती गरीबी सीधे तौर पर विकास व रोजगार पैदा करने वाले निवेश सृजन पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही है। उम्मीद है कि लोगों की क्रय शक्ति बढ़ाने के लिए आगामी केंद्रीय बजट में ठोस उपाय देखने को मिलेंगे। सीटीयू ने बजट के लिए सरकार के समक्ष कई ठोस सुझाव रखे हैं।  

विरासत कर के जरिए संसाधन जुटाए सरकार 
आवश्यक खाद्य पदार्थों और दवाओं पर जीएसटी का बोझ आम जनता पर डाला जा रहा है। इसकी बजाए सरकार को कॉर्पोरेट टैक्स और संपत्ति कर को बढ़ाना चाहिए। सरकार, विरासत टैक्स को लागू कर संसाधन जुटाने पर फोकस करे। दशकों से, कॉर्पोरेट कर दरों में अन्यायपूर्ण ढंग से कटौती की गई है। आम लोगों पर 'अप्रत्यक्ष कर' का बोझ बढ़ने से पूरी तरह एक 'प्रतिगामी कर' संरचना तैयार हो गई है। निष्पक्षता, समता और औचित्य के हित में इसे ठीक किया जाना चाहिए। अत्यधिक अमीरों पर अधिकतम सीमा के साथ एक प्रतिशत विरासत कर भी बजट प्राप्तियों में बड़ी राशि एकत्रित करने का जरिया बन सकता है। इस राशि का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सामाजिक क्षेत्रों को वित्तपोषित करने के लिए किया जा सकता है। इसके अलावा सरकार को तत्काल प्रभाव से आवश्यक खाद्य पदार्थों, दवा और चिकित्सा बीमा पर जीएसटी की दरों में कटौती करनी चाहिए।
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वेतन पर आयकर छूट की सीमा को बढ़ाया जाए 
वेतनभोगी वर्ग के लिए उनके वेतन पर आयकर छूट की सीमा को बढ़ाया जाए। ईपीएफओ और ईएसआई योगदान की सीमा और पात्रता में काफी वृद्धि की जानी चाहिए। ग्रेच्युटी गणना मानदंडों को संशोधित किया जाए। सेवानिवृत्ति पर सभी श्रमिकों/कर्मचारियों को उच्च ग्रेच्युटी भुगतान सुनिश्चित करने के लिए एक महीने की अवधि बढ़ाई जानी चाहिए। ग्रेच्युटी पर लगी सीमा हटाई जाए। पेंशन पर टैक्स नहीं लगना चाहिए। असंगठित श्रमिकों और कृषि श्रमिकों के लिए केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित 'सामाजिक सुरक्षा कोष' की स्थापना की जाए। इसमें डीए और अन्य चिकित्सा व शैक्षिक लाभ के लिए न्यूनतम 9000 रुपये प्रति माह पेंशन शामिल है। भारत को ओएसएच पर आईएलओ कन्वेंशन संख्या 187 और 155 को अनुमोदित करने की आवश्यकता है, जो अब कार्यस्थल पर अधिकारों के मौलिक सिद्धांतों में शामिल हैं। कन्वेंशन 181 का कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। मौजूदा योजनाओं के तहत मौद्रिक लाभ बढ़ाना होगा, क्योंकि वे अपर्याप्त हैं। जैसा कि जीएसटी लागू होने के समय वादा किया गया था, बीड़ी उपकर अधिनियम को निरस्त करने के कारण होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए समतुल्य निधि प्रदान की जानी चाहिए। असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों तक ईएसआई का विस्तार किया जाना चाहिए। किसान सम्मान योजना के अंतर्गत छोटे किसानों/कृषि श्रमिकों/बटाईदारों को भी शामिल किया जाना चाहिए। 

अग्निवीर, आयुधवीर व कोयलावीर वाले रोजगार बंद हों 
केंद्र सरकार के विभागों और पीएसयू में सभी मौजूदा रिक्तियों को तुरंत भरा जाना चाहिए। रोजगार सृजन पर लगी रोक हटायी जाए। ठेकेदारी और आउट सोर्सिंग की प्रथा को बंद करना होगा। इसकी जगह नियमित रोजगार सुनिश्चित करना होगा। समान काम के लिए समान वेतन सुनिश्चित हो। अग्निवीर, आयुधवीर, कोयलावीर और ऐसे दूसरे रोजगार को बंद कर दिया जाना चाहिए। सरकार को इनकी जगह पर उन सभी क्षेत्रों में नियमित रोजगार शुरू किया जाना चाहिए। कौशल भारत के नाम पर निजी नियोक्ताओं के लाभ के लिए सरकार द्वारा वित्त पोषित प्रशिक्षुता की योजना को पूरी तरह से निजी नियोक्ताओं के वैधानिक दायित्व से बदल दिया जाना चाहिए। इससे वे चरणबद्ध प्लेसमेंट के स्पष्ट प्रावधान के साथ संबंधित प्रतिष्ठानों में अपेक्षित संख्या में प्रशिक्षुओं को शामिल कर सकते हैं। नियमित रोजगार में कॉरपोरेट्स को दिए जा रहे सभी लाभ/रियायतें/छूट/कर-कटौती को एक कड़े जवाबदेही-निर्धारण तंत्र के साथ अतिरिक्त रोजगार सृजन के साथ जोड़ा जाना चाहिए। वैधानिक न्यूनतम मजदूरी के साथ 200 दिन का काम सुनिश्चित करने के मकसद से मनरेगा के लिए आवंटन बढ़ाया गया। 

एकीकृत पेंशन योजना ओपीएस की जगह नहीं ले सकती 
नई पेंशन योजना को खत्म किया जाना चाहिए। एकीकृत पेंशन योजना, पुरानी पेंशन योजना की जगह नहीं ले सकती। लाभ परिभाषित पुरानी पेंशन योजना को बहाल किया जाना चाहिए। ईपीएस-95 को डीए के साथ जोड़ते हुए 1000/- रुपये से बढ़ाकर 9000/- रुपये करें। इसके लिए बजटीय आवंटन होना चाहिए। 8वें वेतन आयोग का गठन तुरंत किया जाए। श्रम संहिताओं को निरस्त किया जाना चाहिए। 29 श्रम कानूनों को निरस्त करने वाले अधिनियमित सभी 4 श्रम संहिताओं को निरस्त किया जाए। इंडेक्सेशन के साथ प्रति माह कम से कम 26000 रुपये की न्यूनतम मजदूरी भारतीय श्रम सम्मेलन की सर्वसम्मति की सिफारिश के अनुरूप तय की जानी चाहिए। पीएसयू और सरकारी क्षेत्र का निजीकरण रोका जाना चाए। पीएसयू और इसके नवीनतम प्रारूप-राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन प्रक्रिया का निजीकरण तुरंत बंद हो। रेलवे में उत्पादन और सेवा में विभिन्न तरीकों से निजीकरण, रक्षा क्षेत्र में कंपनियों के गठन और उनके विलय आदि द्वारा निजीकरण प्रक्रिया, कोयला और खदानों में निजीकरण और कोयला/खदान ब्लॉकों/एमडीओ की नीलामी, बंदरगाह और गोदी में बड़े पैमाने पर निजीकरण , बिजली उत्पादन और पारेषण आदि में बेलगाम तरीके से काम चल रहा है। ये सब तुरंत बंद होना चाहिए। 

बिजली का निजीकरण बंद करे सरकार 
बीएसएनएल और आरआईएनएल की संपत्तियों को बेचने का कदम तुरंत रोका जाए। सरकार, आरआईएनएल (वाइजाग स्टील प्लांट) का निजीकरण बंद करें। एनएमडीसी लिमिटेड के संसाधनों से निर्मित नगरनार इस्पात संयंत्र को एनएमडीसी के पास ही रहना चाहिए। इसका निजीकरण नहीं किया जाना चाहिए। सभी सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों को मजबूत किया जाना चाहिए। खानों के निजीकरण के एमडीओ प्रारूप को तुरंत रोका जाए। विभिन्न माध्यमों से बिजली का निजीकरण बंद हो। स्मार्ट प्री-पेड बिजली मीटर योजना को खत्म किया जाए। डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण प्रणाली का निजीकरण रोका जाना चाहिए। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और सार्वजनिक खजाने की लूट व बीमा क्षेत्र के निजीकरण को रोका जाना चाहिए। प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना, जिसके लिए पिछले बजट में 63000 करोड़ रुपये का परिव्यय प्रदान किया गया है, केवल श्रम लागत पर सब्सिडी देने और नियमित कार्यबल के स्थान पर सस्ते अस्थायी/गैर-स्थायी श्रमिकों (इंटर्न के नाम पर) को लाने की योजना बनकर रह जाएगी। कौशल प्रशिक्षण की आड़ में नियोक्ताओं पर प्रशिक्षुओं को कर्मचारियों के रूप में शामिल करने की कोई बाध्यता नहीं है। एलआईसी-आईपीओ जैसे विभिन्न कदमों के माध्यम से एलआईसी और जीआईसी के निजीकरण को रोका जाए। आम लोगों और राष्ट्र के व्यापक हित के लिए हानिकारक बीमा क्षेत्र में 100% एफडीआई की अनुमति देने वाले विधेयक को वापस लिया जाए। 
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