बीएसएफ, जिसे 'इंडियास फर्स्ट लाइन ऑफ डिफेन्स) कहा जाता है, के कैडर अफसरों के लिए पदोन्नति का संकट गहराता जा रहा है। हालत ऐसी हो गई है कि बल में साढ़े तीन सौ से अधिक कमांडेंट ऐसे हैं, जिनकी आयु 50-55 साल के बीच है। गिने चुने ही कमांडेंट ऐसे होंगे, जिनकी आयु पचास साल के पार नहीं पहुंची है। बल के पूर्व अफसरों ने यह सवाल उठाया है कि उम्र के इस पड़ाव पर कमांडेंट स्तर के ये अधिकारी बॉर्डर पर किस तरह से ऑपरेशन को लीड करते होंगे। बीएसएफ में पदोन्नति का संकट, यह अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सहायक कमांडेंट के पद पर भर्ती हुआ व्यक्ति 14 साल में डीसी, 21 वर्ष में टूआईसी और इसके बाद सीओ बनने के लिए उसे 10 साल लग रहे हैं। अगर यही रफ्तार जारी रही तो अनेक कैडर अधिकारी बिना डीआईजी और आईजी बने ही रिटायर हो जाएंगे। बीएसएफ का पिछला कैडर रिव्यू 21 सितंबर 2016 को हुआ था। उसके बाद अभी तक कैडर रिव्यू नहीं हो सका। कैडर रिव्यू पर रिपोर्ट देने के लिए अब बीएसएफ डीजी ने 12 सदस्यीय एक कमेटी गठित की है। यह कमेटी 31 मार्च 2025 तक अपनी रिपोर्ट देगी।
बीएसएफ में ग्रुप ए (जीडी) के चौथे कैडर रिव्यू के लिए इसी माह एक कमेटी गठित की गई है। यह कमेटी कैडर रिव्यू को लेकर बीएसएफ डीजी को अपनी रिपोर्ट देगी। बीएसएफ में पदोन्नति को लेकर कैडर अफसरों में रोष क्यों हैं, पदोन्नति में किस वजह से देरी हो रही है, इसका दूरगामी परिणाम क्या होगा और फोर्स में पदोन्नति को लेकर जो ठहराव बना हुआ है, उसे कैसे दूर किया जा सकता है। इसके अलावा कैडर अफसरों को समय पर पदोन्नति न मिलने के कारण किस तरह के वित्तीय फायदों से वंचित रहना पड़ता है। बल में वीआरएस कम से कम कैसे हो, आदि बातें भी रिपोर्ट में शामिल रहेंगी।
इस कमेटी का चेयरमैन संजय सिंघल आईपीएस, एसडीजी (एचआर) को बनाया गया है। सदस्यों में मकरंद देउस्कर आईपीएस, आईजी (पर्स), दिनेश कुमार बूरा आईजी, उमेद सिंह डीआईजी, युवराज दुबे, कमांडेंट अमिताभ पवार, टूआईसी अनुभव कुमार, मणिशंकर झा, डिप्टी कमांडेंट रविंद्र बलूनी, भारत राज, सहायक कमांडेंट कुमार अभिषेक, रमन कुमार और इंस्पेक्टर जीडी अमूल कुमार शामिल हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बीएसएफ के पिछले कैडर रिव्यू को 21 सितंबर 2016 को मंजूरी दी थी। डीओपीटी के नियमानुसार, हर पांच वर्ष में कैडर रिव्यू होना जरुरी है, लेकिन बीएसएफ में यह कैडर रिव्यू अभी तक नहीं हो सकता है। डीओपीटी के नियमों के तहत यह कैडर रिव्यू 2021 में होना चाहिए था।
बीएसएफ में सीआरपीएफ की तरह ही पदोन्नति को लेकर कैडर अधिकारियों में रोष व्याप्त है। यूपीएससी से सीधी भर्ती के जरिए बीएसएफ में बतौर सहायक कमांडेंट के पद पर आने वाले अधिकारियों को मुश्किल से 14 साल में पहली पदोन्नति मिल रही है। अगली पदोन्नति यानी टूआईसी का पद 21 साल में मिलता है। कुछ लोगों को तो इससे भी ज्यादा समय लग रहा है।
कमांडेंट की बात करें तो इसके लिए औसत आयु 53 साल तक पहुंच रही है। सूत्रों के मुताबिक, अधिकांश कमांडेंट पचास वर्ष के पार पहुंच चुके हैं। जब 55 साल के कमांडेंट हैं तो वे डीआईजी कब बनेंगे। अगर बन गए तो कितने साल काम करेंगे। इस स्पीड से कैडर अधिकारियों के लिए आईजी और एडीजी बनने का सपना तो टूटा ही समझो।
पिछले दिनों सीमा सुरक्षा बल के नौ कैडर अधिकारियों ने एक झटके में नौकरी छोड़ दी थी। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति 'वीआरएस' लेने वाले अफसरों में एक कमांडेंट, दो टूआईसी, एक डीसी और पांच सहायक कमांडेंट शामिल हैं। एक साथ नौ अफसरों का फोर्स को अलविदा कहना, न केवल बीएसएफ, अपितु दूसरे केंद्रीय बलों के अफसरों के बीच भी चर्चा का विषय बन गया था। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पिछले सप्ताह उक्त नौ अफसरों की वीआरएस स्वीकार कर ली। बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद कहते हैं, इसके पीछे कोई तो वजह रही है। ऐसे तो कोई अपनी जॉब को यूं बीच राह में नहीं छोड़ता। पदोन्नति में स्थिरता, वित्तीय स्थिति और बेहतर करियर का विकल्प, वीआरएस के पीछे कुछ ऐसे ही कारण रहे होंगे। वीआरएस लेने वालों में बीएसएफ के सहायक कमांडेंट पंकज कुमार राणा, सहायक कमांडेंट कमलेश मीणा, सहायक कमांडेंट परमा नंद, सैकेंड इन कमांड 'टूआईसी' विपिन कुमार, डिप्टी कमांडेंट भूपेश जोशी, कमांडेंट/सीएमओ डॉ. प्रवीण कुमार झा, सहायक कमांडेंट शिव मोहन सिंह, सहायक कमांडेंट अजय पाल सिंह और टूआईसी अभिमन्यु कुमार सिंह शामिल हैं।
पूर्व एडीजी एसके सूद बताते हैं, बीएसएफ में, खासतौर से जूनियर स्तर पर कैडर अधिकारियों में पदोन्नति को लेकर परेशानी देखी जा रही है। अगर समय पर पदोन्नति मिलती रहे तो कोई भी अफसर नौकरी छोड़ने की नहीं सोचता। किन्हीं कारणों से आर्थिक फायदों में पिछड़ना, यह भी एक वजह हो सकती है। सीआरपीएफ और बीएसएफ में तो डेढ़ दशक में पहली पदोन्नति मिल रही है। डीओपीटी ने 2008-09 के दौरान केंद्रीय सुरक्षा बलों में ओजीएएस यानी 'आर्गेनाइज्ड ग्रुप ए सर्विस' के तहत सेवा नियम बनाने के आदेश जारी किए थे। अभी तक सर्विस रूल नहीं बनाए गए हैं। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने के बावजूद कैडर अफसरों को कोई राहत नहीं दी। ऐसे में संभव है कि कैडर अफसरों को कोई दूसरा बेहतर विकल्प मिल रहा हो। नतीजा, वे 'बीएसएफ' को अलविदा कह देते हैं।
बीएसएफ के पूर्व आईजी भोला नाथ शर्मा बताते हैं, मौजूदा समय में तकरीबन हर रैंक पर ठहराव सा है। दूसरी ओर, कैडर अफसरों को वित्तीय फायदे भी पूरे नहीं मिलते। वे बल की नीतियों से संतुष्ट नहीं होते। कैडर अफसरों को एक ही रैंक में लंबे समय तक काम करना पड़ता है। जब उनकी शिकायत दूर नहीं होती तो वे दूसरा विकल्प खोजते हैं। कुछ बलों में पदोन्नति तेज गति से हो रही है, लेकिन बीएसएफ और सीआरपीएफ में यह रफ्तार बहुत धीमी है। ये दोनों बड़े बल हैं। बड़े बैच आने के कारण पदोन्नति ब्लॉक होती है। केंद्र सरकार इन बलों में तय समय पर पदोन्नति देने के बारे में गंभीरता से सोचे।
पूर्व अफसरों के मुताबिक, सीआरपीएफ के पहले महानिदेशक वीजी कनेत्कर ने कहा था, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में आईपीएस के लिए पद आरक्षित न हों। दूसरी तरफ, 1955 के फोर्स एक्ट में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। इतना ही नहीं, 1970 में तत्कालीन होम सेक्रेट्री लल्लन प्रसाद सिंह, जेएस, बीएसएफ व सीआरपीएफ के डीजी ने भी लिखा था कि केंद्रीय सुरक्षा बलों में आईपीएस के लिए पद आरक्षित न हों। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में कैडर अधिकारियों को ही नेतृत्व करने का मौका दिया जाए। ऐसे में वे पदोन्नति के जरिए इन बलों में आगे बढ़ते रहेंगे और टॉप तक पहुंच जाएंगे। पदोन्नति का संकट भी नहीं होगा।
पूर्व कैडर अधिकारियों के मुताबिक, 1959 में पहली बार आईपीएस अधिकारी, कमांडेंट बन कर केंद्रीय सुरक्षा बलों में आए थे। ये भी तब हुआ, जब आर्मी ने कहा कि हम अफसर नहीं देंगे। हमें अपनी जरूरतें पूरी करनी हैं। इसके बाद भारत सरकार ने निर्णय लिया कि इन बलों में अफसरों की भर्ती शुरू की जाए। डीएसपी के पद पर भर्ती प्रक्रिया पूरी होने के बाद 1960 में पहला बैच ट्रेनिंग के लिए एनपीए में पहुंचा। वहां पर आईपीएस के साथ कैडर अफसरों की ट्रेनिंग हुई।
1962 में लड़ाई छिड़ी तो इन बलों में इमरजेंसी कमीशंड ऑफिसर भेजे गए। लड़ाई खत्म होने के बाद वे भी वापस लौट गए। बाद के वर्षों में सीआरपीएफ और बीएसएफ ने खुद के चार सौ से अधिक अफसर तैयार कर लिए। डीजी बीएसएफ केएफ रुस्तम ने कहा था, केंद्रीय सुरक्षा बलों में आईपीएस अफसर के लिए पदों का आरक्षण न किया जाए। इसका 1955 के फोर्स एक्ट में भी प्रावधान नहीं है। हम अपने अफसर तैयार करेंगे, जो कुछ समय बाद फोर्स का नेतृत्व करेंगे। इसके बाद 1968 में सीआरपीएफ के पहले डीजी वीजी कनेत्कर ने कहा था, मुझे आईपीएस की जरूरत नहीं है।
तत्कालीन गृह सचिव एलपी सिंह ने भी दोनों बलों के डीजी की बात को सही माना। सिंह ने कहा, शुरू में बीस फीसदी अफसर आर्मी व आईपीएस कैडर से ले लो। थोड़े समय बाद डीआईजी, कमांडेंट और सहायक कमांडेंट के पद कैडर को सौंप दिए जाएं, लेकिन आईपीएस के लिए वैधानिक आरक्षण न किया जाए। 1970 में गृह मंत्रालय के डिप्टी डायरेक्टर 'संगठन' जेसी पांडे ने लिखा, इन बलों में आईपीएस के लिए पद फिक्स मत करो। इससे कैडर अफसरों के मौके प्रभावित होंगे।
सीआरपीएफ डीजी ने कहा, अब केवल वर्किंग फार्मूला ले लो, जो बाद में नई व्यवस्था के साथ परिवर्तित हो जाएगा। आईपीएस, आर्मी और स्टेट पुलिस, इन तीनों के अफसरों के लिए सुरक्षा बलों में डीआईजी, कमांडेंट और एसी के पद पर आरक्षण न हो। कैडर के पूर्व अफसरों के मुताबिक, उसके बाद फाइलें बदल गई। उसी साल यह आर्डर निकाला गया कि केंद्रीय बलों में डीजी के 100 फीसदी पद, 100 फीसदी आईजी, 75 फीसदी डीआईजी, 40 फीसदी सीओ और एसी के 10 फीसदी पद आईपीएस को दिए जाएं।
समय के साथ इस कोटे में बदलाव होते रहे। साल 1997 में पहली बार सीआरपीएफ कैडर अफसरों को आईजी के 33 फीसदी पद मिले। 2008 में आईजी के 50 फीसदी और डीआईजी के 80 फीसदी कैडर को मिल गए। 2009 में एडीजी के 33 फीसदी पद कैडर को दिए गए। 1970 से लेकर 2013 तक आईपीएस कैडर, इस मामले में कुछ नहीं बोला। कैडर अधिकारी, पदोन्नति के मोर्चे पर पिछड़ते चले गए। उन्हें मजबूरन कोर्ट में जाना पड़ा।
2015 में हाईकोर्ट से जीते और 2019 में सुप्रीम कोर्ट से जीत गए, लेकिन फिर भी नए सर्विस रूल नहीं बन सके। बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद केंद्र सरकार टालमटोल की नीति पर चल रही है। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के हजारों अफसर प्रमोशन एवं वित्तीय फायदों में हुए भेदभाव को लेकर परेशान हैं। जूनियर अफसरों को तो 15 वर्ष में पहली पदोन्नति नहीं मिल पा रही। जिस तरह से केंद्र सरकार की दूसरी संगठित सेवाओं में एक तय समय के बाद रैंक या फिर उसके समकक्ष वेतन मिलता है, वैसा सभी केंद्रीय सुरक्षा बलों के अधिकारियों को नहीं मिल पा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, बीएसएफ महानिदेशालय द्वारा कैडर अधिकारियों को यह भरोसा दिलाया जा रहा है कि 31 मई तक पदोन्नति के आदेश जारी हो जाएं। कैडर रिव्यू में 34 बैच तक टूआईसी, 26 बैच तक सीओ और 18 बैच तक डीआईजी, ऐसी पदोन्नति होने का दिलासा दिया जा रहा है। इस बाबत कैडर अफसरों का कहना है कि ये केवल सपना दिखाया जा रहा है। खैर देखते हैं कि इस पैटर्न पर पदोन्नति किसे और कब तक मिलती है।