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BSF: मणिपुर में मैतेई, कुकी समुदायों के जातीय संघर्ष में जवानों की जांबाजी; शहीद हुए, मगर पोस्ट नहीं छोड़ी

जितेंद्र भारद्वाज
Updated Thu, 15 Aug 2024 05:55 PM IST
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BSF - फोटो : Amar Ujala

स्वतंत्रता दिवस पर सीमा सुरक्षा बल 'बीएसएफ' के ऐसे जांबाजों को वीरता पदक से सम्मानित किया गया है, जिन्होंने मणिपुर में मैतेई और कुकी समुदायों के जातीय संघर्ष में असाधारण साहस और समर्पण का परिचय दिया है। कर्तव्य निर्वहन के दौरान बीएसएफ के जांबाज घायल हुए, कुछ शहीद हो गए, लेकिन उन्होंने पोस्ट नहीं छोड़ी। हमलावरों का मुंहतोड़ जवाब दिया। अज्ञात बदमाशों ने मणिपुर के जिले काकचिंग के सेरू प्रैक्टिकल हाई स्कूल में बीएसएफ पोस्ट पर अंधाधुंध गोलीबारी कर दी। सिपाही (जीडी) रंजीत यादव, उस वक्त पोस्ट पर अकेले थे। उन्होंने एलएमजी मोर्चा नंबर 2 संभाल रखा था। वहां चारों तरफ से हुई भारी गोलाबारी के बावजूद उन्होंने मोर्चा नहीं छोड़ा। बहादुरी से जवाबी कार्रवाई की। अपने निजी हथियार से आठ राउंड गोलियां चलाईं। पोस्ट को सुरक्षित रखा। उन्हें गोली लगी थी, लेकिन वे अपने कर्तव्य निर्वहन से पीछे नहीं हटे। सिपाही रंजीत यादव शहीद हो गए। उन्हें मरणोपरांत वीरता पदक से सम्मानित किया गया है।





सिपाही रंजीत यादव, वीरता पदक (मरणोपरांत)

सिपाही जीडी रंजीत यादव का जन्म 20 मई 1987 को उत्तर 24 परगना, पश्चिम बंगाल में हुआ था। वे 14 अक्टूबर 2008 को बीएसएफ में कांस्टेबल (जीडी) भर्ती हुए थे। ट्रेनिंग के बाद उन्हें 163 बटालियन में तैनाती मिली थी। गत वर्ष 6 जून को, मणिपुर में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच जातीय संघर्ष चल रहा था। राज्य के कई हिस्सों में गोलीबारी की घटनाएं हो रही थी। अज्ञात बदमाशों ने सेरू प्रैक्टिकल हाई स्कूल, जिला काकचिंग में बीएसएफ पोस्ट पर अंधाधुंध गोलीबारी कर दी। उस वक्त सिपाही (जीडी) रंजीत यादव एलएमजी मोर्चा नंबर 2 पर दो बजे से पांच बजे तक ड्यूटी पर थे। भारी गोलाबारी के बावजूद उन्होंने बहादुरी से जवाबी कार्रवाई की। एक वक्त ऐसा भी आया, जब बदमाशों ने बीएसएफ पोस्ट को चारों तरफ से घेर लिया। यादव ने अपने निजी हथियार से आठ राउंड गोलियां चलाईं। उन्होंने बदमाशों को पोस्ट के करीब नहीं आने दिया। लिहाजा, बदमाशों की संख्या ज्यादा थी, इसलिए उन्होंने कई तरफ से पोस्ट पर फायरिंग कर दी। उनकी पीठ के ऊपरी हिस्से में गोली लगी। वे मोर्चे के अंदर गिर गए। उन्हें असम राइफल्स के एमआई रूम और फिर जीवन अस्पताल काकचिंग ले जाया गया। गहरा घाव होने के कारण उन्होंने दम तोड़ दिया। रंजीत यादव ने कर्तव्य की पंक्ति में अपना जीवन न्यौछावर करते हुए असाधारण साहस और निस्वार्थता का प्रदर्शन किया। उनकी बहादुरी और कर्तव्य के प्रति प्रतिबद्धता एक सीमा प्रहरी के उच्चतम आदर्शों का उदाहरण है। उनके वीरतापूर्ण कार्य के सम्मान में उन्हें मरणोपरांत वीरता पदक से सम्मानित किया गया।




सहायक कमांडेंट अशोक कुमार, वीरता पदक 

दूसरी घटना भी मणिपुर में हुई थी। सहायक कमांडेंट अशोक कुमार और सिपाही नरेंद्र कुमार ड्यूटी पर थे। वे 9 मई 1994 को बतौर सब इंस्पेक्टर, बीएसएफ में शामिल हुए थे। सिपाही नरेंद्र कुमार, 21 मई 2012 को बीएसएफ में सिपाही (जीडी) भर्ती हुए थे। 3 मई 2023 को, मणिपुर में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच एक जातीय संघर्ष छिड़ गया। एडहॉक एम एंड सी-आई बीएसएफ के तहत 'सी' कॉय, ईएक्स-122 बीएन को मोरेह, टेंग्नौपाल में तैनात किया गया था। 28 मई को सुबह 10 बजे हथियारबंद बदमाशों ने एलोरा होटल के पास बीएसएफ पिकेट पर हमला कर दिया। 

सहायक कमांडेंट, अशोक कुमार ने कंपनी कमांडर का कर्तव्य निभाते हुए मोर्चा संभाला। वे एरिया डोमिनेशन ड्यूटी पर थे। हमले की सूचना मिलते ही तुरंत मौके पर पहुंचे। अशोक कुमार ने सिपाही नरेंद्र कुमार सहित दूसरे जवानों को साथ लेकर बीएसएफ पिकेट को मजबूती प्रदान की। सिपाही नरेंद्र कुमार और चौधरी आशीष कुमार ने भीड़ के बीच हथियारबंद लोगों को देखा। वे लोग बीएसएफ पिकेट की तरफ बढ़ रहे थे। 


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सिपाही नरेंद्र कुमार, वीरता पदक (मरणोपरांत)

एसी अशोक कुमार ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए चेतावनी देते हुए गोली चलाई। उन्हें लग रहा था कि फायरिंग के बाद बदमाश पीछे हट जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। आधुनिक हथियारों से लैस बदमाशों ने जवाबी कार्रवाई में अंधाधुंध गोलीबारी कर दी। सिपाही नरेंद्र कुमार ने अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की परवाह किए बिना स्थिति का आकलन करने के लिए युद्धाभ्यास किया। इसी दौरान उनके सिर में गोली लगी। दर्जनों बदमाश, पिकेट के करीब आ चुके थे। अशोक कुमार ने बीएसएफ पार्टी को जवाबी कार्रवाई करने का आदेश दे दिया। दोनों तरफ से गोलीबारी होने लगी। कुछ ही देर में बदमाशों को खदेड़ दिया गया। अशोक कुमार की दाहिनी हथेली में चोट लगी थी। दोनों लोगों को असम राइफल अस्पताल ले जाया गया, लेकिन सिपाही नरेंद्र कुमार ने 29 मई को दम तोड़ दिया। उपचार के बाद अशोक कुमार को छुट्टी दे दी गई। नरेंद्र कुमार ने नागरिकों और साथी सैनिकों की रक्षा के लिए अपने जीवन का बलिदान देकर असाधारण साहस और समर्पण दिखाया। उनकी निडर बहादुरी के सम्मान में, अशोक कुमार एसी और दिवंगत सीटी नरेंद्र कुमार को वीरता (सेवारत/मरणोपरांत) पदक से सम्मानित किया गया है।




एसआई महेंद्र सिंह, वीरता पदक (मरणोपरांत) 

एसआई महेंद्र सिंह, का जन्म 15 जुलाई 1991 को गांव डुमरिया, राजस्थान में हुआ था। वे 29 जुलाई 2013 को बीएसएफ में सब इंस्पेक्टर के रूप में शामिल हुए। 10 नवंबर 2018 को बीएसएफ की 35वीं बटालियन के एसआई महेंद्र सिंह ने छत्तीसगढ़ में एरिया डोमिनेशन ऑपरेशन के दौरान एक टीम का नेतृत्व किया। उस वक्त छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव हो रहे थे। उन्होंने सुबह के वक्त गट्टाकल गांव के पास एक नाले में माओवादियों को देखा। इसके बाद उन्होंने घने जंगल में अपने साथियों की मदद से रणनीतिक मोर्चा तैयार किया। कुछ ही देर बाद नक्सलियों ने भारी गोलीबारी करनी शुरु कर दी। नक्सलियों ने केवल फायरिंग ही नहीं की, बल्कि कई आईईडी विस्फोट भी कर दिए। चारों तरफ से फायरिंग हो रही थी। एसआई महेंद्र सिंह ने फायरिंग का जवाब देते हुए नक्सलियों का मुकाबला किया। भीषण मुठभेड़ के दौरान, उन्हें गंभीर चोटें आईं। इसके बावजूद उन्होंने गोलीबारी जारी रखी। महेंद्र सिंह ने सफलतापूर्वक माओवादियों को ढेर कर दिया। अपनी टीम के सदस्यों की सुरक्षा सुनिश्चित की। उनके साहसी कार्यों ने जवानों को अधिक हताहत होने से रोका। उनका काफी खून बह चुका था, जिसके चलते वे शहीद हो गए। भारी बाधाओं के सामने एसआई महेंद्र सिंह की बहादुरी, नेतृत्व और निस्वार्थता साहस एवं वीरता के उच्चतम मानकों का उदाहरण है। उनके साहसिक प्रयासों ने माओवादियों को भागने पर मजबूर कर दिया।  वीरतापूर्ण कार्यों और सर्वोच्च बलिदान की मान्यता में, एसआई महेंद्र सिंह को वीरता पदक (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया है।


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