बर्फ से ढके दुर्गम दर्रे, लगातार भूस्खलन, घने पहाड़ और अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे संवेदनशील इलाके - इन तमाम चुनौतियों के बीच सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) का ‘प्रोजेक्ट वर्तक’ पिछले छह दशक से पूर्वोत्तर भारत में रणनीतिक संपर्क की मजबूत रीढ़ बना हुआ है। सेना की आवाजाही से लेकर सीमांत गांवों तक जीवनरेखा पहुंचाने और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान टूटे संपर्क को दोबारा बहाल करने तक, इस परियोजना ने पूर्वोत्तर के कठिन इलाकों में विकास और सुरक्षा दोनों को नई मजबूती दी है। उल्लेखनीय है कि हाल ही में सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) ने अपना 66वां स्थापना दिवस मनाया था। इसी क्रम में उसकी सबसे पुरानी और अहम परियोजनाओं में शामिल ‘प्रोजेक्ट वर्तक’ की भूमिका भी एक बार फिर चर्चा में है, जिसने अरुणाचल प्रदेश के सामरिक क्षेत्रों में सड़क संपर्क मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
देश की पहली बीआरओ सड़क परियोजना
असम के तेजपुर स्थित मुख्यालय से संचालित ‘प्रोजेक्ट वर्तक’ की स्थापना 7 मई 1960 को ‘प्रोजेक्ट टस्कर’ के रूप में हुई थी। यह देश में सड़क निर्माण गतिविधियां शुरू करने वाली बीआरओ की पहली परियोजना थी। वर्ष 1963 में भारतीयकरण की प्रक्रिया के तहत इसका नाम बदलकर ‘प्रोजेक्ट वर्तक’ कर दिया गया। तब से यह परियोजना पूर्वोत्तर के सबसे कठिन और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में लगातार काम कर रही है।
तवांग तक संपर्क मजबूत करने में बड़ी भूमिका
परियोजना की सबसे बड़ी उपलब्धियों में भालुकपोंग-तेंगा-तवांग मार्ग का निर्माण और उन्नयन शामिल है। वर्ष 1964-65 में बोमडिला से सेला तक सड़क निर्माण और भालुकपोंग से रूपा तक सड़क सतह तैयार करने का काम बेहद कठिन परिस्थितियों में पूरा किया गया था। उस दौर में आधुनिक मशीनों और संसाधनों की कमी के बावजूद बीआरओ कर्मियों ने दुर्गम पहाड़ों को काटकर सड़कें तैयार कीं, जिसने आगे चलकर तवांग और सीमांत क्षेत्रों तक संपर्क को मजबूत आधार दिया।
प्रोजेक्ट वर्तक : प्रमुख तथ्य
- स्थापना : 7 मई 1960
- पुराना नाम : प्रोजेक्ट टस्कर
- वर्तमान नाम : 1963 से प्रोजेक्ट वर्तक
- मुख्यालय : तेजपुर, असम
- कुल सड़क नेटवर्क : 2066.90 किमी
- निर्माणाधीन सड़कें : 67
- जारी परियोजनाएं : 119
बर्फीले दर्रों में भी सालभर बनाए रखता है संपर्क
आज ‘प्रोजेक्ट वर्तक’ असम के सोनितपुर और अरुणाचल प्रदेश के पश्चिम कामेंग तथा तवांग जिलों में अंतरराष्ट्रीय सीमा तक फैले रणनीतिक सड़क नेटवर्क की जिम्मेदारी संभाल रहा है। परियोजना के अधीन उच्च हिमालयी और भारी बर्फबारी वाले क्षेत्र भी शामिल हैं। वोमिंगला, बुमला, यांग्त्से, नागुला, वाई जंक्शन, क्लेमटा, लुंगरो, मंकी पास और धौला जैसे सामरिक दर्रों और अग्रिम इलाकों में सालभर संपर्क बनाए रखना ‘प्रोजेक्ट वर्तक’ की सबसे चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारियों में शामिल है। भारी बर्फबारी के कारण कई मार्ग बंद हो जाने के बावजूद बीआरओ की टीमें लगातार बर्फ हटाने और सड़क बहाली में जुटी रहती हैं, ताकि सेना की आवाजाही और आवश्यक आपूर्ति प्रभावित न हो।
किन इलाकों में सबसे अहम भूमिका?
- तवांग सेक्टर तक संपर्क बनाए रखना
- बुमला और सेला जैसे दर्रों पर सड़कें
- भारी बर्फबारी में मार्ग बहाल करना
- सेना की रसद आपूर्ति सुनिश्चित करना
- सीमांत गांवों को जोड़ना
आपदा के समय राहत पहुंचाने में भी अहम भूमिका
सिर्फ सड़क निर्माण तक सीमित न रहकर ‘प्रोजेक्ट वर्तक’ ने आपदा प्रबंधन में भी अपनी अहम भूमिका साबित की है। पूर्वोत्तर में बाढ़, भूस्खलन और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान टूटे संपर्क को बहाल करने में बीआरओ की त्वरित कार्रवाई ने स्थानीय आबादी और सुरक्षा बलों को बड़ी राहत पहुंचाई है। कई बार सीमांत इलाकों में राहत सामग्री और जरूरी सेवाएं पहुंचाने का एकमात्र माध्यम यही सड़कें बनी हैं।
आपदा के समय भी बड़ी भूमिका
- भूस्खलन के बाद सड़क बहाली
- बाढ़ प्रभावित इलाकों में संपर्क बहाल
- राहत और बचाव दलों को रास्ता उपलब्ध
- सीमावर्ती गांवों तक मदद पहुंचाना
सीमांत विकास की मजबूत धुरी बना ‘प्रोजेक्ट वर्तक’
बीआरओ अधिकारियों का कहना है कि सीमांत इलाकों में मजबूत आधारभूत संरचना केवल रक्षा जरूरतों के लिए ही नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए भी बेहद जरूरी है। दुर्गम पहाड़ियों के बीच लगातार काम कर रहा ‘प्रोजेक्ट वर्तक’ आज पूर्वोत्तर में सुरक्षा, संपर्क और विकास का मजबूत आधार बन चुका है।