भारत की अध्यक्षता में हो रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में संयुक्त साझा बयान जारी हुआ। ब्रिक्स के सदस्य देशों ने न केवल पहलगाम हमले की निंदा की, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ मिलकर ठस कदम उठाने की सहमति जताई। बड़ी सफलता समेटते हुए भारत ने चुपचाप कूटनीतिक गेंद सामरिक साझीदार देश अमेरिका के पाले में डाल दी है। ब्रिक्स की सफलता के पीछे संदेश छिपा है। यह अमेरिका के लिए है। सबसे बड़ा संदेश ईरान के राष्ट्रपित मसूद पेजेशकियान के हाथ में हाथ मिलाकर रहना रहा। यहां भारत ने एक तरह से अमेरिका को नहीं माना (अमेरिका ने देशों से ईरान से दूरी बनाने को कहा था) और संदेश में भारत ने यह कहने का साहस दिखाया कि हितैषी और शुभचिंतक देश दबाव की राजनीति और संबंध नहीं रखते।
फिलवक्त भारत का एक हाथ रूस के दाएं हाथ में हैं और दूसरा हाथ चीन से हाथ मिलाने के लिए बढ़ चुका है। एक पूर्व राजनयिक का कहना है कि भारत ने चीन को प्रतिद्वंदी नहीं, बल्कि मित्र, पड़ोसी और सहयोगी होने का संदेश दिया है। चीन की तरफ से इसी तरह की प्रतिक्रिया आने की उम्मीद है। सूत्र का कहना है यदि भारत-रूस-चीन न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर चले तो यह क्षेत्रीय, त्रिपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी सफलता होगी।
ब्रिक्स के कारण भारत ने रवैया बदला, बड़ी बात
पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं कि ब्रिक्स के कारण भारत ने अपना रवैया बदला। चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा और सुलझाने की जिद को व्यावहारिक रूप देने की पहल की। इसका श्रेय हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को भी देना चाहिए। यह गतिरोध टूटना जरूरी था। भारत और ब्रिक्स का मकसद किसी देश या समूह से झगड़ा करना नहीं है। इसका मकसद मिलकर काम करने वाले वातावरण का निर्माण करना है।
पहली बार ब्रिक्स के फोरम को ऐतिहासिक मजबूती मिली
ब्रिक्स का गठन 16 जून 2009 में हुआ था। यह भारत, रूस, चीन के त्रिपक्षीय फोरम का विस्तार था। तब इसमें ब्राजील की इंट्री हुई थी। सितंबर 2010 में इसमें दक्षिण अफ्रीका जुड़ा। आज ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, मिश्र, इथोपिया, इंडोनेशिया समेत 11 सक्रिय सदस्य देश हैं। आमंत्रित सदस्यों सहित 21 देशों का परिवार है। संगठन का विस्तार उत्तर-पश्चिम तक हो गया है। ब्रिक्स के फोरम से पहली बार खुलकर एकजुटता, संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के रिफार्म की बात हुई है। आपसी कारोबार, व्यापार तथा अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में आगे बढ़ने में सदस्यों ने रुचि दिखाई है। रूस के राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री मोदी और भारत को सच्चा साझीदार मित्र बताया। वहीं, चीन ने मतभेद भुलाकर दो कदम आगे बढ़ने की प्रतिबद्धता दिखाई।
चीन के साथ कितना मजबूत होगा विश्वास?
राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अभी तक अच्छा संदेश दिया है। ब्रिक्स के मंच पर अच्छी केमिस्ट्री दिखाई है। अब भारत के साथ द्विपक्षीय वार्ता अंतिम रूप ले रही है। इसके पूरे संकेत मिल रहे हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और उनके चीन के समकक्ष वांग यी के बीच में बनी सहमति को आधार बनाकर दोनों देश आगे बढ़ेंगे। दोनों देशों में मतभेद को भुलाकार आपसी सहयोग, कारोबार, साझा हित बढ़ाने पर सहमति बन सकती है। सिक्किम के मामले में भारत और चीन एक दूसरे से करीब-करीब सहमत हैं। सीधी उड़ान सेवा, कैलाश मानसरोवर यात्रा पर पहले ही सहमति बन चुकी है। ऐसे में चीन और भारत के बीच में आपसी भरोसे को मजबूत करने वाले कुछ विशेष कदम उठाए जा सकते हैं।
रूस ने ब्रिक्स के बहाने हासिल किया बड़ा लक्ष्य
विदेश मामलों के जानकार रंजीत कुमार का कहना है कि ब्रिक्स सफल रहा। रूस ने भी बड़े शिल्पी की भूमिका निभाई। ईरान, चीन के साथ भारत के रिश्तों में जान डालने में रूस का पर्दे के पीछे से बड़ा योगदान माना जा रहा है। इसका असर आने वाले समय में भारत-रूस के रक्षा समेत अन्य क्षेत्रों की सहमति और समझौते में देखने को मिल सकता है। तकनीकी हस्तांतरण के कुछ बड़े सौदे की भी उम्मीद की जा रही है। पूर्व विदेश सचिव शशांक भी रूस को अहमियत देते हैं। कहते हैं कि भारत-चीन के बीच में रिश्ते को संतुलित करने में रूस महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। सबसे बड़ी बात इसमें मध्य एशिया तक ब्रिक्स के फैलाव की है।