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आधी दुनिया की ताकत, फिर भी बिखरे हित: ब्रिक्स की बढ़ती ताकत, लेकिन क्या पश्चिमी दबदबे को सचमुच मिलेगी चुनौती?

Fri, 11 Sep 2026 09:20 PM IST
देवेश त्रिपाठी अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

ब्रिक्स का विस्तार वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में समूह की भूमिका को लगातार मजबूत कर रहा है। भारत, चीन, रूस समेत कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मौजूदगी ने इसे ऊर्जा, व्यापार और विकास के लिहाज से प्रभावशाली मंच बनाया है। स्थानीय मुद्राओं में कारोबार और वैकल्पिक वित्तीय संस्थाओं के जरिए सदस्य देश अमेरिकी प्रभुत्व पर निर्भरता घटाने की कोशिश कर रहे हैं।
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ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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दुनिया की करीब आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाला ब्रिक्स आज वैश्विक शक्ति-संतुलन में पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण दिखाई देता है। इसके विस्तार ने इसे ऊर्जा, व्यापार और विकास के क्षेत्र में बड़ा मंच बना दिया है। लेकिन क्या यह अमेरिकी नेतृत्व वाली पश्चिमी व्यवस्था का वास्तविक विकल्प बन चुका है? नई दिल्ली में हो रहे शिखर सम्मेलन के बीच यह सवाल इसलिए भी अहम है, क्योंकि ईरान युद्ध ने ब्रिक्स की आर्थिक ताकत के साथ-साथ उसके भीतर मौजूद राजनीतिक मतभेदों को भी उजागर कर दिया है।
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अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिक्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि वह पश्चिम की जगह ले पाएगा या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वह वैश्विक दक्षिण के देशों को पश्चिमी प्रभाव से बाहर अपने हितों के लिए ज्यादा जगह और विकल्प दे सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिक्स की कामयाबी को पश्चिमी संस्थाओं का विकल्प बनने से नहीं, बल्कि पश्चिम के लिए अपनी ताकत का इस्तेमाल करना कठिन बनाने से भी आंका जाना चाहिए।



क्या है ब्रिक्स की ताकत?
ब्रिक्स का आकार उसकी सबसे बड़ी ताकत है। समूह में भारत, चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के अलावा ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया शामिल हैं। इन देशों की संयुक्त आबादी दुनिया की करीब आधी आबादी है। क्रय शक्ति के आधार पर विश्व उत्पादन में इनकी हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत है। वैश्विक तेल उत्पादन का करीब 44 प्रतिशत और विश्व व्यापार का लगभग एक चौथाई भी इन्हीं देशों से आता है।लेकिन इतनी बड़ी आर्थिक ताकत का मतलब यह नहीं कि समूह उतनी ही मजबूती से एक साझा राजनीतिक शक्ति के रूप में काम कर रहा है। सदस्य देशों के आर्थिक हित, सुरक्षा प्राथमिकताएं और विदेश नीतियां अलग-अलग हैं। चीन और भारत जहां समूह की आर्थिक वृद्धि के प्रमुख आधार हैं, वहीं रूस, ईरान और पश्चिम एशिया के देशों की प्राथमिकताएं अलग हैं।यही वजह है कि ब्रिक्स को पारंपरिक राजनीतिक या सैन्य गठबंधन नहीं माना जा सकता। इसकी कोई साझा मुद्रा नहीं है, साझा शुल्क व्यवस्था नहीं है और सामूहिक रक्षा की बाध्यता भी नहीं है।
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डॉलर से दूरी की कोशिश अभी शुरुआती दौर में
ब्रिक्स के विस्तार के साथ अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की चर्चा भी तेज हुई है। सदस्य देश आपसी व्यापार में स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था पर जोर दे रहे हैं। चीन अपनी मुद्रा के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है और कुछ अन्य देश भी द्विपक्षीय कारोबार में डॉलर की जगह अपनी मुद्राओं को तरजीह दे रहे हैं।फिर भी डॉलर की पकड़ अभी बेहद मजबूत है। ब्रिक्स के अधिकांश देशों का अंतरराष्ट्रीय व्यापार किसी न किसी स्तर पर डॉलर से जुड़ा है और उनके विदेशी मुद्रा भंडार में भी अमेरिकी मुद्रा की बड़ी भूमिका है।इसलिए डॉलर का वर्चस्व खत्म करने की कोशिश को तत्काल बदलाव के रूप में देखना सही नहीं होगा। फिलहाल प्रक्रिया ज्यादा व्यावहारिक है,अलग-अलग देश अपने व्यापारिक रिश्तों में धीरे-धीरे डॉलर पर निर्भरता कम कर रहे हैं।

पश्चिम के बाहर विकास का विकल्प
ब्रिक्स की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि उसका नया विकास बैंक है। इसकी वित्तीय क्षमता विश्व बैंक जैसी पुरानी संस्थाओं की तुलना में अभी छोटी है, लेकिन इसका राजनीतिक महत्व कम नहीं है। विकासशील देशों ने पहली बार पश्चिमी देशों की प्रत्यक्ष भागीदारी के बिना अपनी बहुपक्षीय विकास वित्त संस्था बनाई।चीन का निवेश और बेल्ट एंड रोड कार्यक्रम भी ब्रिक्स देशों तथा दूसरे विकासशील देशों के लिए पश्चिमी वित्तीय संस्थाओं से अलग रास्ते उपलब्ध करा रहे हैं। इससे विकासशील देशों के पास अब वित्त और निवेश के लिए ज्यादा विकल्प हैं।
यही वह क्षेत्र है जहां ब्रिक्स पश्चिमी व्यवस्था को सीधे चुनौती देने के बजाय उसके समानांतर एक अतिरिक्त रास्ता तैयार करता दिखाई देता है।

ईरान युद्ध से सामने आई दरार
ब्रिक्स की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी राजनीतिक एकता है। ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों ने इस समस्या को खुलकर सामने ला दिया है।मई में भारत में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में ईरान युद्ध पर साझा बयान जारी नहीं हो सका। ईरान चाहता था कि अमेरिकी और इजरायली कार्रवाई की स्पष्ट निंदा की जाए, जबकि संयुक्त अरब अमीरात इसके लिए तैयार नहीं था।यह घटनाक्रम बताता है कि ब्रिक्स के सदस्य एक मंच पर जरूर हैं, लेकिन किसी अंतरराष्ट्रीय संकट पर उनका रुख एक जैसा होना जरूरी नहीं। सदस्य देश अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हैं।यही कारण है कि ब्रिक्स में ऐसी व्यवस्था नहीं है जिसके तहत एक सदस्य के खिलाफ कार्रवाई होने पर बाकी सभी सदस्य उसके पक्ष में खड़े हो जाएं।

विस्तार बना ताकत भी, चुनौती भी
2024 के विस्तार से ब्रिक्स का प्रभाव बढ़ा है। सऊदी अरब, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे प्रमुख तेल उत्पादकों की मौजूदगी ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में समूह का महत्व बढ़ाया है। कई अन्य देश भी इसकी सदस्यता में रुचि दिखा रहे हैं।लेकिन ज्यादा सदस्य होने का अर्थ ज्यादा विविध हित भी हैं। इससे साझा नीति बनाना कठिन होता है। फिर भी सदस्यता के लिए बढ़ती दिलचस्पी यह संकेत देती है कि वैश्विक दक्षिण के कई देश ऐसी दुनिया चाहते हैं, जहां अंतरराष्ट्रीय फैसलों पर अमेरिका और यूरोप का प्रभाव अकेला निर्णायक न हो।

असली चुनौती पश्चिम को हटाना नहीं
ब्रिक्स के लिए शायद सबसे बड़ा लक्ष्य पश्चिमी व्यवस्था को खत्म करना नहीं, बल्कि देशों के सामने विकल्प बढ़ाना है। यह अभी संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष या सात देशों के समूह का स्थान लेने की स्थिति में नहीं है।लेकिन यह पश्चिमी संस्थाओं के बाहर व्यापार, निवेश, वित्त और कूटनीतिक सहयोग का रास्ता जरूर खोल रहा है।

इस लिहाज से ब्रिक्स की असली ताकत उसके आकार से कहीं ज्यादा उसकी विकल्प पैदा करने की क्षमता में है। अगर सदस्य देश अलग-अलग हितों के बावजूद इतना सहयोग कायम रख पाते हैं कि किसी एक शक्ति के लिए दूसरे देशों पर आर्थिक या राजनीतिक दबाव डालना महंगा हो जाए, तो यह अपने आप में वैश्विक शक्ति-संतुलन में बड़ा बदलाव होगा।नई दिल्ली का शिखर सम्मेलन इसी बदलाव की अगली परीक्षा है। ब्रिक्स शायद पश्चिम की जगह लेने नहीं आया है, लेकिन दुनिया को ऐसी दिशा में जरूर ले जा रहा है जहां पश्चिम के पास पहले जैसी आसानी से अपनी शर्तें मनवाने की ताकत न रहे।
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