भारत ने इंडोनेशिया के साथ ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की आपूर्ति को लेकर महत्वपूर्ण करार किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान हुए इस समझौते को भारत के रक्षा निर्यात और घरेलू रक्षा उद्योग के लिए बड़ा कदम माना जा रहा है। इस समझौते के तहत भारत इंडोनेशिया को ब्रह्मोस मिसाइल की अतिरिक्त बैटरियां उपलब्ध कराएगा। इसके अलावा इंडोनेशिया ने भारत में विकसित 'अस्त्र' एयर-टू-एयर मिसाइल खरीदने का भी फैसला किया है। इससे भारत की रक्षा तकनीक पर दुनिया का भरोसा और मजबूत होने की उम्मीद है।
ब्रह्मोस की आपूर्ति बढ़ने से भारत के रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा। मिसाइल, लॉन्चर, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और अन्य रक्षा उपकरणों के उत्पादन में तेजी आएगी। इससे रक्षा क्षेत्र से जुड़ी सार्वजनिक और निजी कंपनियों को नए ऑर्डर मिल सकते हैं। रक्षा निर्यात बढ़ने से विदेशी मुद्रा की आमद होगी और भारत की 'मेक इन इंडिया' तथा रक्षा आत्मनिर्भरता की नीति को भी मजबूती मिलेगी। इसके साथ ही रक्षा क्षेत्र में नई तकनीक, निवेश और रोजगार के अवसर बढ़ने की संभावना है। भारत का लक्ष्य आने वाले वर्षों में रक्षा निर्यात को लगातार बढ़ाने का है और ऐसे समझौते इस दिशा में अहम माने जा रहे हैं।
इंडोनेशिया ने भारत की 'अस्त्र' एयर-टू-एयर मिसाइल खरीदने का भी फैसला किया है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा विकसित यह 'बियॉन्ड विजुअल रेंज' मिसाइल है, जो दूर से ही दुश्मन के लड़ाकू विमानों को निशाना बना सकती है। इसके अलावा दोनों देशों ने महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला, स्टील क्षेत्र, चुनावी तकनीक और स्वास्थ्य क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत इंडोनेशिया को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण दवाओं की उपलब्धता बढ़ाने के साथ डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के प्रशिक्षण में भी सहयोग करेगा। इंडोनेशिया के राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री मोदी को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'बिंतांग आदिपूर्णा' से भी सम्मानित किया।
ब्रह्मोस नाम भारत और रूस की दो प्रसिद्ध नदियों के नामों को मिलाकर रखा गया है। इसमें भारत की ब्रह्मपुत्र नदी और रूस की मॉस्कवा (Moskva) नदी के नाम शामिल हैं। यह नाम दोनों देशों की रक्षा साझेदारी और संयुक्त विकास कार्यक्रम का प्रतीक माना जाता है।
ब्रह्मोस का विकास भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और रूस की एनपीओ मशीनोस्त्रोयेनिया (NPOM) ने संयुक्त रूप से किया है। इसके लिए दोनों देशों ने 1998 में एक अंतर-सरकारी समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद ब्रह्मोस एयरोस्पेस नाम की संयुक्त कंपनी बनाई गई, जिसने इस मिसाइल के डिजाइन, विकास, उत्पादन और विपणन की जिम्मेदारी संभाली।
ब्रह्मोस मिसाइल का पहला सफल परीक्षण 12 जून 2001 को किया गया था। इसका परीक्षण ओडिशा के चांदीपुर स्थित अंतरिम परीक्षण रेंज से किया गया था। इस सफल परीक्षण के बाद ब्रह्मोस को लगातार उन्नत किया गया और बाद में इसे भारतीय थल सेना, नौसेना और वायुसेना में शामिल किया गया।
भारत और रूस के बीच 1998 में हुए रक्षा समझौते के बाद ब्रह्मोस एयरोस्पेस की स्थापना की गई। इस संयुक्त उद्यम (जॉइंट वेंचर) का उद्देश्य दुनिया की पहली सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का विकास, उत्पादन और निर्यात करना था। आज यह कंपनी भारत की सबसे महत्वपूर्ण रक्षा उत्पादन कंपनियों में गिनी जाती है।
ब्रह्मोस-एनजी (नेक्स्ट जेनरेशन) ब्रह्मोस मिसाइल का नया और उन्नत संस्करण है। इसे मौजूदा ब्रह्मोस की तुलना में छोटा, हल्का, अधिक स्मार्ट और अधिक स्टील्थ (रडार से बचने वाला) बनाया जा रहा है। इसका आकार और वजन कम होने से इसे अधिक लड़ाकू विमानों, युद्धपोतों, जमीन आधारित लॉन्चर और पनडुब्बियों से आसानी से तैनात किया जा सकेगा। इसे भविष्य के युद्धक्षेत्र की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया जा रहा है।
दिए गए इनपुट के अनुसार ब्रह्मोस-एनजी की मारक क्षमता 290 किलोमीटर होगी और इसकी अधिकतम रफ्तार मैक 3.5 तक होगी। यह मौजूदा ब्रह्मोस की तुलना में हल्की होगी, लेकिन इसकी गति और मारक क्षमता इसे बेहद प्रभावी बनाएगी।
ब्रह्मोस-एनजी की सबसे बड़ी खासियत इसका हल्का और कॉम्पैक्ट डिजाइन है। इसका रडार क्रॉस सेक्शन (RCS) कम होगा, जिससे दुश्मन के रडार के लिए इसे पकड़ना और रोकना पहले से अधिक कठिन होगा। यह मल्टी-प्लेटफॉर्म और मल्टी-टारगेट मिसाइल होगी, जिसे जमीन, हवा, समुद्र और पनडुब्बी से दागा जा सकेगा। छोटे आकार के कारण इसे पनडुब्बी के टॉरपीडो ट्यूब से भी लॉन्च किया जा सकेगा। इसमें अगली पीढ़ी की स्टील्थ तकनीक और अधिक बहुउद्देशीय क्षमता होगी।
ब्रह्मोस-II, जिसे ब्रह्मोस मार्क-II भी कहा जाता है, ब्रह्मोस मिसाइल का प्रस्तावित हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल संस्करण है। इसे भारत और रूस संयुक्त रूप से विकसित कर रहे हैं। इसका उद्देश्य भारतीय नौसेना और अन्य सेनाओं की लंबी दूरी तक बेहद तेज और सटीक हमला करने की क्षमता को और मजबूत करना है।
दिए गए इनपुट के अनुसार ब्रह्मोस-II की अधिकतम गति मैक सात तक हो सकती है। यह मौजूदा सुपरसोनिक ब्रह्मोस की तुलना में कहीं अधिक तेज होगी। इतनी अधिक रफ्तार के कारण दुश्मन की मिसाइल रक्षा प्रणाली के लिए इसे रोकना और भी कठिन हो जाएगा।
ब्रह्मोस-II का विकास स्क्रैमजेट इंजन तकनीक पर किया जा रहा है। यह तकनीक रूस की 3M22 Tsirkon हाइपरसोनिक एंटी-शिप क्रूज मिसाइल से प्रेरित है। स्क्रैमजेट इंजन की मदद से मिसाइल हाइपरसोनिक गति हासिल कर सकेगी और जमीन, समुद्र तथा हवा जैसे कई प्लेटफॉर्म से लॉन्च की जा सकेगी।