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चीन आसानी से नहीं मानने वाला, कूटनीतिक मोर्चे पर भारत आक्रामकता दिखाए : ब्रह्म चेलानी

Mon, 06 Jul 2020 02:13 AM IST
अवधेश कुमार अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
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गलवां घाटी में भारत-चीन के बीच हुई हिंसक झड़प - फोटो : Amar Ujala
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गलवां घाटी में चीन की चालबाजी का भारत ने हर स्तर पर जवाब देना शुरू कर दिया है। चीन को भारत की ओर से आर्थिक और कूटनीतिक मोर्चे पर जवाब देना होगा। यह मानना है राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में सलाहकार रहे प्रोफेसर ब्रह्म चेलानी का। उनका मानना है कि चीन आसानी से पीछे हटने वाला नहीं है। वह बातचीत के बहाने समय काटना चाहता है। लेह जाकर प्रधानमंत्री ने अपने पहले के बयान को सुधारा जिसका इस्तेमाल चीन करने लगा था।
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जवानों का मनोबल और सिर ऊंचा

प्रोफेसर चेलानी मानते हैं कि पीएम नरेंद्र मोदी ने लद्दाख दौरे से चीन के खिलाफ अपनी आक्रामकता को जाहिर किया। मोदी के इस दौरे ने युद्ध जैसी स्थिति का सामना कर रहे भारत के लिए सबका ध्यान खींचने में मदद की। मोदी ने अपने संबोधन से जवानों का मनोबल ऊंचा किया। मोदी ने विस्तारवाद का जिक्र किया।

लद्दाख जाकर मोदी ने गलती सुधारी

ब्रह्म चेलानी की राय है कि भले ही मोदी ने चीन का नाम नहीं लिया लेकिन चीन को साफ संदेश दे दिया। तभी चीन की प्रतिक्रिया भी सामने आई। लद्दाख दौरे से पहले प्रधानमंत्री ने सर्वदलीय बैठक में जो बयान दिया, उसका चीन ने दुष्प्रचार शुरू कर दिया। चीन की सरकारी मीडिया ने दुष्प्रचार किया कि मोदी टकराव नहीं चाहते। लद्दाख दौरे से इस दुष्प्रचार को भी विराम लगा और मोदी ने गलती भी सुधार ली।
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हर मोर्चे पर देना होगा जवाब

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के पूर्व सलाहकार का मानना है कि भारत को चीन का हर मोर्चे पर जवाब देना होगा, चाहे वह कूटनीतिक हो या आर्थिक। चीन के खिलाफ भारत को वैश्विक स्तर पर कूटनीतिक आक्रामकता दिखानी होगी। हांगकांग के मुद्दे पर भारत का बयान भी कमजोर रहा। चीन को भारत से व्यापार अधिशेष से सालाना करीब 60 अरब डॉलर मिलते हैं। भारत में उसका प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कम है। चीन ने निवेश नहीं किया लेकिन अपना माल ज्यादा खपाया। ऐसे में चीन को भारत की जरूरत है, न कि भारत को चीन की।

पश्चिमी देशों में केवल कूटनीतिक समर्थन

चेलानी ने कहा कि भारत पश्चिम देशों से कूटनीतिक समर्थन की उम्मीद तो कर सकता है लेकिन सैन्य समर्थन नहीं। भारत और अमेरिका सामरिक साझेदार है, न कि सैन्य समझदार। अमेरिका से भारत की सैन्य साझेदारी होती भी है तो इससे बहुत अंतर नहीं पड़ने वाला है। 2012 में जब चीन ने फिलीपीन से स्कारबोलो शोल छीना था तब अमेरिका ने कुछ नहीं किया जबकि दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग संबंधी समझौता है। चीन ने छल कपट से लद्दाख की यथास्थिति को बदल दिया है। भारत यथास्थिति के पक्ष में है। चीन को पीछे हटाने के लिए भारत को ऐसे उपाय करने ही होंगे जो उसकी आक्रामकता पर भारी पड़े।
 
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